नई दिल्ली: दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की महत्वाकांक्षी हाउसिंग परियोजना ‘टावरिंग हाइट्स, ईस्ट दिल्ली हब कड़कड़डूमा’ को उम्मीद के मुताबिक खरीदार नहीं मिल रहे हैं। यह स्थिति तब है जब इस परियोजना में दिल्ली की सबसे ऊंची आवासीय इमारत, मेट्रो कनेक्टिविटी और आधुनिक शहरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कम प्रतिक्रिया मिलने के कारण DDA को एक बार फिर आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ानी पड़ी है। अब इच्छुक खरीदार 30 जून तक आवेदन कर सकते हैं।
यह दूसरी बार है जब डीडीए ने बुकिंग की समय सीमा बढ़ाई है। इसके बावजूद परियोजना में उपलब्ध फ्लैट्स का बड़ा हिस्सा अब भी अनबुक्ड है। रियल एस्टेट बाजार के जानकारों का मानना है कि यह केवल एक परियोजना की चुनौती नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के आवासीय बाजार में बदलती खरीदार प्राथमिकताओं का भी संकेत है।
दिल्ली की पहली TOD परियोजना से थीं बड़ी उम्मीदें
कड़कड़डूमा स्थित ईस्ट दिल्ली हब राजधानी की पहली ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) परियोजना है। इस परियोजना को दिल्ली में भविष्य के शहरी विकास मॉडल के रूप में देखा जा रहा था। परियोजना का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी 155 मीटर ऊंची और 48 मंजिला आवासीय इमारत है, जिसे दिल्ली की सबसे ऊंची रिहायशी इमारत माना जा रहा है।
DDA के अनुसार यह परियोजना लगभग 30 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित की जा रही है। इसमें आवासीय इकाइयों के अलावा व्यावसायिक गतिविधियों, ऑफिस स्पेस और सार्वजनिक सुविधाओं को भी शामिल किया गया है ताकि लोगों को रहने, काम करने और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए एकीकृत वातावरण मिल सके।
मेट्रो स्टेशन के बेहद करीब होने के कारण इसे दिल्ली के सबसे बेहतर कनेक्टेड हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यही वजह थी कि लॉन्च के समय इस परियोजना से काफी उम्मीदें लगाई गई थीं।
आखिर खरीदार क्यों नहीं दिखा रहे दिलचस्पी?
परियोजना की आधुनिक सुविधाओं और लोकेशन के बावजूद खरीदारों की सीमित रुचि ने कई सवाल खड़े किए हैं। रियल एस्टेट विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
सबसे बड़ा कारण फ्लैट्स की कीमत मानी जा रही है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जिस बजट में DDA यह फ्लैट्स पेश कर रहा है, उसी दायरे में दिल्ली-एनसीआर के कई अन्य क्षेत्रों में निजी डेवलपर्स के बेहतर विकल्प उपलब्ध हैं। ऐसे में खरीदारों के पास तुलना के लिए कई विकल्प मौजूद हैं।
दूसरी बड़ी वजह परियोजना में सीमित कॉन्फिगरेशन का उपलब्ध होना है। वर्तमान चरण में मुख्य रूप से चुनिंदा 2BHK यूनिट्स उपलब्ध हैं। जबकि दिल्ली-एनसीआर में मध्यम और उच्च आय वर्ग के कई परिवार 3BHK या उससे बड़े घरों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पूर्वी दिल्ली की छवि भी बन रही चुनौती
रियल एस्टेट बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी दिल्ली की छवि भी इस परियोजना की बिक्री को प्रभावित कर रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कड़कड़डूमा, प्रीत विहार और आसपास के क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन कई खरीदार अभी भी दक्षिण और पश्चिम दिल्ली को अधिक प्रीमियम लोकेशन मानते हैं।
ऐसे में केवल आधुनिक इमारत या मेट्रो कनेक्टिविटी खरीदारों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। निवेशक भविष्य में संपत्ति मूल्य वृद्धि और इलाके की ब्रांड वैल्यू को भी ध्यान में रख रहे हैं।
प्रॉपर्टी निवेशक ओम प्रकाश यादव का कहना है कि परियोजना की कीमतें कई खरीदारों को महंगी लग रही हैं। उनका मानना है कि यदि मूल्य निर्धारण अधिक प्रतिस्पर्धी होता तो प्रतिक्रिया बेहतर मिल सकती थी।
वैश्विक अनिश्चितता का भी दिख रहा असर
रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण लोग बड़े निवेश निर्णयों को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हो गए हैं।
आवासीय संपत्ति खरीदना अधिकांश परिवारों के लिए जीवन का सबसे बड़ा वित्तीय निर्णय होता है। ऐसे माहौल में कई लोग फिलहाल इंतजार की रणनीति अपना रहे हैं। इसका असर केवल DDA की इस परियोजना पर नहीं बल्कि कई अन्य रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर भी देखने को मिल रहा है।
क्या है ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) स्कीम?
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट या TOD दिल्ली विकास प्राधिकरण की एक आधुनिक शहरी नियोजन नीति है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क के आसपास घनी और मिश्रित उपयोग वाली बस्तियों का विकास करना है।
इस मॉडल के तहत मेट्रो और RRTS स्टेशनों के लगभग 500 मीटर के दायरे में आवासीय, व्यावसायिक और कार्यालय परिसरों का विकास किया जाता है। इसका लक्ष्य लोगों की निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना और उन्हें बेहतर सार्वजनिक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है।
TOD मॉडल दुनिया के कई बड़े शहरों में सफल माना जाता है। दिल्ली में भी इसे भविष्य के शहरी विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
दिल्ली में किन क्षेत्रों को मिलेगा फायदा?
DDA ने मेट्रो कॉरिडोर के आसपास कुल 14 भूमि पार्सलों की पहचान की है, जहां भविष्य में TOD आधारित विकास किया जा सकता है। इनमें कड़कड़डूमा के अलावा पीरागढ़ी, द्वारका और रोहिणी जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।
पूर्वी दिल्ली में इस परियोजना से दिलशाद गार्डन, झिलमिल, प्रीत विहार और मंडावली-फजलपुर जैसे इलाकों को भी फायदा मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि TOD मॉडल सफल होता है तो इन क्षेत्रों में रियल एस्टेट गतिविधियां और बुनियादी ढांचे का विकास तेज हो सकता है।
DDA के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?
ईस्ट दिल्ली हब केवल एक हाउसिंग प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि DDA की TOD नीति की पहली बड़ी परीक्षा भी है। यदि यह परियोजना सफल होती है तो भविष्य में दिल्ली के अन्य हिस्सों में भी इसी मॉडल पर विकास को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि फिलहाल खरीदारों की धीमी प्रतिक्रिया ने DDA के सामने चुनौती जरूर खड़ी की है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आवेदन अवधि बढ़ाने और संभावित प्रचार अभियानों के बाद परियोजना को कितना लाभ मिलता है।
निष्कर्ष
कड़कड़डूमा स्थित DDA टावरिंग हाइट्स परियोजना यह दिखाती है कि आधुनिक सुविधाएं, ऊंची इमारतें और मेट्रो कनेक्टिविटी ही किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट की सफलता की गारंटी नहीं हैं। आज का खरीदार कीमत, लोकेशन, भविष्य की वैल्यू और आर्थिक माहौल जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला ले रहा है।
दिल्ली की सबसे ऊंची रिहायशी इमारत होने के बावजूद इस परियोजना को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलना रियल एस्टेट बाजार के बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है। आने वाले समय में DDA की यह परियोजना राजधानी में TOD मॉडल की सफलता या चुनौती दोनों का महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।


