नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर उथल-पुथल मच गई है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला। इजराइल और लेबनान के बीच संघर्ष फिर से तेज होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम एक झटके में करीब 4 फीसदी तक बढ़ गए। इस तेजी ने दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और ईंधन की कीमतों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ते हैं या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब पहुंच सकती हैं। ऐसे में भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
कितने बढ़े कच्चे तेल के दाम?
अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 8 जून की सुबह करीब 8:30 बजे अमेरिकी क्रूड ऑयल (WTI) की कीमत 3.36 डॉलर यानी 3.72 फीसदी बढ़कर 92.90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। वहीं ब्रेंट क्रूड का भाव 3.50 डॉलर यानी 3.76 फीसदी की तेजी के साथ 96.59 डॉलर प्रति बैरल दर्ज किया गया।
तेल बाजार में यह उछाल ऐसे समय आया है जब निवेशक पहले से ही मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए थे। संघर्ष बढ़ने की खबर आते ही ट्रेडर्स ने भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका को कीमतों में शामिल करना शुरू कर दिया।
क्यों बढ़ रही हैं बाजार की चिंताएं?
तेल बाजार की सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संभालता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है।
ऊर्जा विश्लेषकों के मुताबिक यदि इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा आती है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि बाजार में तनाव बढ़ते ही तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, निवेशकों को आशंका है कि क्षेत्रीय संघर्ष लंबा खिंच सकता है। इससे तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है।
इजराइल-लेबनान संघर्ष ने बढ़ाई बेचैनी
रविवार को इजराइल ने लेबनान के कुछ इलाकों में नए हमले किए। इन हमलों को लेकर क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव और बढ़ गया। इसके बाद ईरान समर्थित गुटों की प्रतिक्रिया ने बाजार की चिंता को और गहरा कर दिया।
बताया जा रहा है कि बेरुत में हिज्बुल्लाह से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद तेहरान ने इजराइल की ओर मिसाइलें दागीं। इस घटनाक्रम ने निवेशकों को यह संकेत दिया कि स्थिति केवल सीमित संघर्ष तक नहीं रह सकती।
हालांकि अमेरिका लगातार तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान निकलता नहीं दिख रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत पर भी असर
ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकता है। ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि क्षेत्रीय स्थिरता किसी भी व्यापक समझौते के लिए महत्वपूर्ण शर्त होगी।
यदि बातचीत आगे नहीं बढ़ती है तो ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत मिलने की संभावना भी कम हो सकती है। इससे वैश्विक बाजार में अतिरिक्त तेल आपूर्ति आने की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है।
OPEC+ ने बढ़ाया उत्पादन, फिर भी नहीं घटी चिंता
इस बीच तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने लगातार चौथी बार उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया है। संगठन ने संकेत दिया है कि बाजार को संतुलित रखने के लिए अतिरिक्त उत्पादन जारी रखा जाएगा।
हालांकि बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उत्पादन बढ़ा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान जारी रहता है तो अतिरिक्त उत्पादन भी वैश्विक बाजार तक आसानी से नहीं पहुंच पाएगा।
कई OPEC+ सदस्य देश पहले से ही अपने निर्धारित उत्पादन लक्ष्य हासिल करने में संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में वास्तविक आपूर्ति और घोषित उत्पादन क्षमता के बीच अंतर बना हुआ है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में किसी भी बड़ी तेजी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो सरकार और तेल विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संशोधन की संभावना भी बढ़ सकती है।
इसके अलावा तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ता है। इससे महंगाई दर बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
शेयर बाजार और रुपये पर भी पड़ सकता है दबाव
ऊंचे तेल दाम भारतीय शेयर बाजार के लिए भी चिंता का विषय हैं। तेल आयात बिल बढ़ने से चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा बनाता है, जिससे महंगाई की समस्या और गंभीर हो सकती है।
इसी वजह से निवेशक अब केवल मध्य पूर्व की घटनाओं पर ही नहीं, बल्कि तेल बाजार की अगली चाल पर भी बारीकी से नजर रख रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
कमोडिटी विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह तेल बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि क्षेत्रीय तनाव कम होता है और समुद्री मार्ग सामान्य रूप से संचालित होते रहते हैं तो कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है। लेकिन यदि संघर्ष और बढ़ता है तो कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर बढ़ सकता है।
फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और निवेशकों का पूरा ध्यान मध्य पूर्व के घटनाक्रम, OPEC+ की नीतियों और वैश्विक तेल भंडार के आंकड़ों पर रहेगा।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए तो मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिला दिया है कि ऊर्जा बाजार भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति कितना संवेदनशील है। आने वाले दिनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक क्षेत्रीय हालात और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगी।


