नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर सोमवार को दुनिया भर के शेयर बाजारों में देखने को मिला। एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली के बीच भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में आ गया। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 800 अंक से अधिक टूट गया, जबकि निफ्टी 50 इंडेक्स 250 अंक से ज्यादा फिसल गया। निवेशकों के बीच बढ़ी चिंता का असर लगभग सभी सेक्टरों पर दिखाई दिया और बाजार लाल निशान में कारोबार करता नजर आया।
सुबह करीब 9:20 बजे बीएसई सेंसेक्स 784.77 अंक यानी 1.06 फीसदी गिरकर 73,458.57 अंक पर पहुंच गया। वहीं निफ्टी 50 इंडेक्स 234.80 अंक यानी करीब 1 फीसदी टूटकर 23,131.90 अंक पर कारोबार करता दिखा। बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल माना जा रहा है।
क्यों टूटा शेयर बाजार?
वैश्विक बाजारों में निवेशकों की धारणा इस समय काफी कमजोर हो गई है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बना रहे हैं और सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ रुख कर रहे हैं। इसी वजह से शेयर बाजारों में बिकवाली का दबाव बढ़ गया है।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 4 फीसदी तक तेजी देखी गई। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने से देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाते के घाटे को लेकर भी चिंताएं बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि विदेशी निवेशकों और घरेलू निवेशकों दोनों ने सतर्क रुख अपनाया।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तब तेल बाजार सबसे पहले प्रभावित होता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट मुनाफे पर भी पड़ सकता है।
सेंसेक्स के ज्यादातर शेयर लाल निशान में
शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 28 गिरावट के साथ खुले। यह दर्शाता है कि बिकवाली किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं रही बल्कि पूरे बाजार में देखने को मिली।
सबसे ज्यादा गिरावट एयरलाइन कंपनी इंडिगो के शेयर में दर्ज की गई। इसके अलावा बजाज फाइनेंस, एशियन पेंट्स, टाटा स्टील, महिंद्रा एंड महिंद्रा, एनटीपीसी, टीसीएस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और लार्सन एंड टुब्रो जैसे दिग्गज शेयर भी दबाव में रहे।
हालांकि बाजार की कमजोरी के बीच कुछ रक्षात्मक सेक्टरों ने मजबूती दिखाई। टेक महिंद्रा और सन फार्मा के शेयर बढ़त के साथ खुले। यह संकेत देता है कि निवेशक फिलहाल उन सेक्टरों में निवेश कर रहे हैं जो वैश्विक अनिश्चितताओं के दौरान अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं।
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी भारी बिकवाली
बाजार में गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही। व्यापक बाजार यानी ब्रॉडर मार्केट में भी दबाव देखने को मिला।
निफ्टी मिडकैप इंडेक्स करीब 1.51 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स लगभग 1.52 फीसदी गिर गया। आमतौर पर जब बाजार में डर का माहौल बनता है तो निवेशक सबसे पहले मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों से पैसा निकालते हैं क्योंकि इनमें उतार-चढ़ाव अधिक होता है।
इस वजह से छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों के शेयरों में भी व्यापक बिकवाली देखने को मिली।
कौन से सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित?
सेक्टोरल इंडेक्स पर नजर डालें तो रियल एस्टेट और मेटल शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई।
निफ्टी रियल्टी इंडेक्स पर दबाव इसलिए देखा गया क्योंकि बढ़ती अनिश्चितता के दौर में निवेशक रियल एस्टेट सेक्टर को लेकर सतर्क हो जाते हैं। दूसरी ओर मेटल कंपनियों के शेयर वैश्विक आर्थिक गतिविधियों और कमोडिटी कीमतों से जुड़े होते हैं, इसलिए इनमें भी बिकवाली देखने को मिली।
इसके विपरीत फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। बाजार में संकट के समय इन सेक्टरों को डिफेंसिव माना जाता है क्योंकि इनकी मांग आर्थिक उतार-चढ़ाव से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होती।
कच्चे तेल की कीमतों का भारत पर क्या असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
महंगा तेल सरकार के आयात बिल को बढ़ाता है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। साथ ही पेट्रोल, डीजल और परिवहन लागत बढ़ने का खतरा रहता है, जिसका असर महंगाई पर पड़ सकता है।
यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों और ब्याज दरों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि शेयर बाजार तेल कीमतों में तेजी को लेकर संवेदनशील प्रतिक्रिया देता है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण आने वाली गिरावट अक्सर अल्पकालिक होती है। ऐसे समय में घबराकर निवेश बेचने के बजाय निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियों में गिरावट खरीदारी का अवसर भी बन सकती है। हालांकि अत्यधिक जोखिम लेने से बचना चाहिए और निवेशकों को वैश्विक घटनाक्रम पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखना जरूरी है ताकि किसी एक सेक्टर में बड़ी गिरावट का असर कुल निवेश पर कम पड़े।
आगे बाजार की नजर किन बातों पर रहेगी?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर रहेगी। यदि तनाव और बढ़ता है तो बाजार में अस्थिरता जारी रह सकती है। वहीं हालात सामान्य होने पर बाजार में रिकवरी भी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय बाजार के मूलभूत संकेतकों और वैश्विक परिस्थितियों का आकलन करते हुए निवेश रणनीति बनाएं।


