मुंबई: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में लगातार दो सप्ताह से जारी गिरावट का सिलसिला आखिरकार थम गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा शुक्रवार को जारी साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार 29 मई 2026 को समाप्त सप्ताह के दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 938 मिलियन डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही कुल विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 682.321 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब भारतीय रिजर्व बैंक रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रहा है। इसी अवधि में RBI ने खुले बाजार में लगभग 5 अरब डॉलर की स्वैपिंग भी की थी। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होना भारतीय अर्थव्यवस्था और बाहरी क्षेत्र की मजबूती का संकेत माना जा रहा है।
विदेशी मुद्रा भंडार में क्यों आई बढ़ोतरी?
RBI के आंकड़ों के अनुसार एक सप्ताह पहले यानी 22 मई को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में 7.511 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बाद बाजार विशेषज्ञों को आशंका थी कि भंडार पर दबाव जारी रह सकता है। हालांकि 29 मई को समाप्त सप्ताह में स्थिति सुधरी और रिजर्व में 938 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह रिजर्व सरकार और केंद्रीय बैंक को बाहरी झटकों, आयात भुगतान, विदेशी कर्ज दायित्वों और मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
हालांकि मौजूदा स्तर अभी भी 27 फरवरी 2026 को दर्ज किए गए 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर से काफी नीचे है, लेकिन हालिया सुधार को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
FCA में 3.1 अरब डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी
विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार का सबसे बड़ा कारण विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets-FCA) में हुई मजबूत वृद्धि रही।
RBI के अनुसार 29 मई को समाप्त सप्ताह में FCA में 3.116 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद यह बढ़कर 546.148 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इससे पहले सप्ताह में FCA में 2.872 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई थी।
FCA विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। इसमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन और अन्य प्रमुख मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां शामिल होती हैं। डॉलर के मुकाबले इन मुद्राओं की विनिमय दरों में बदलाव का असर भी FCA के मूल्यांकन पर पड़ता है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार पिछले सप्ताह वैश्विक मुद्रा बाजार में कुछ प्रमुख मुद्राओं में मजबूती देखने को मिली, जिसका सकारात्मक असर भारत की विदेशी मुद्रा आस्तियों के मूल्यांकन पर पड़ा।
गोल्ड रिजर्व की वैल्यू में आई गिरावट
जहां FCA में बढ़ोतरी हुई, वहीं सोने के भंडार के मूल्य में गिरावट देखने को मिली।
RBI के आंकड़ों के अनुसार समीक्षा सप्ताह में गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 2.186 अरब डॉलर घटकर 112.600 अरब डॉलर रह गई। इसकी प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मूल्यांकन में बदलाव मानी जा रही है।
रिजर्व बैंक के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक भारत के पास 880.52 टन सोना था। यह देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7 प्रतिशत हिस्सा है।
पिछले कुछ वर्षों में RBI ने लगातार सोने की खरीद बढ़ाई है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक विविध और सुरक्षित बनाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में सोना केंद्रीय बैंकों के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति बना हुआ है।
SDR में कोई बदलाव नहीं
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा आवंटित स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
RBI के अनुसार 29 मई को समाप्त सप्ताह में SDR भंडार में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह 18.747 अरब डॉलर पर स्थिर बना रहा। इससे एक सप्ताह पहले इसमें 49 मिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी।
SDR को IMF द्वारा सदस्य देशों को आवंटित एक अंतरराष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति माना जाता है। इसका उपयोग वैश्विक भुगतान संतुलन को मजबूत करने और सदस्य देशों को अतिरिक्त तरलता उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है।
IMF रिजर्व पोजिशन में मामूली कमी
समीक्षा सप्ताह के दौरान IMF के पास रखे भारत के रिजर्व पोजिशन में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई।
आंकड़ों के अनुसार IMF रिजर्व पोजिशन 8 मिलियन डॉलर घटकर 4.826 अरब डॉलर रह गया। पिछले सप्ताह इसमें 33 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई थी।
हालांकि यह गिरावट बहुत मामूली है और कुल विदेशी मुद्रा भंडार पर इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा।
रुपये की मजबूती के लिए RBI की रणनीति
हाल के महीनों में डॉलर इंडेक्स, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव देखा गया है। ऐसे माहौल में RBI रुपये को अत्यधिक उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार RBI द्वारा किए गए लगभग 5 अरब डॉलर के स्वैप ऑपरेशन का उद्देश्य बाजार में पर्याप्त डॉलर तरलता बनाए रखना और रुपये की विनिमय दर को स्थिर रखना था।
यही कारण है कि भले ही केंद्रीय बैंक ने बाजार में डॉलर उपलब्ध कराए, फिर भी विदेशी मुद्रा भंडार में कुल मिलाकर वृद्धि दर्ज की गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या है इसका महत्व?
विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
सबसे पहले, मजबूत रिजर्व देश को आयात भुगतान और बाहरी ऋण दायित्वों को पूरा करने में सुरक्षा प्रदान करता है। दूसरा, इससे वैश्विक निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद मिलती है। तीसरा, मजबूत रिजर्व RBI को मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने की अधिक क्षमता देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता नहीं बढ़ती है और विदेशी निवेश प्रवाह जारी रहता है तो आने वाले महीनों में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर से 700 अरब डॉलर के स्तर की ओर बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
लगातार दो सप्ताह की गिरावट के बाद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 938 मिलियन डॉलर की वृद्धि राहत देने वाली खबर है। विदेशी मुद्रा आस्तियों में 3.116 अरब डॉलर की मजबूत बढ़ोतरी ने गोल्ड रिजर्व में आई गिरावट के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर दिया। RBI की सक्रिय मुद्रा प्रबंधन रणनीति और मजबूत बाहरी क्षेत्र भारत की आर्थिक स्थिरता को समर्थन दे रहे हैं। आने वाले हफ्तों में विदेशी निवेश प्रवाह, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां विदेशी मुद्रा भंडार की दिशा तय करेंगी।


