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LTCG माफ.. निवेशक जो चाहते थे RBI और सरकार ने वो सबकुछ दिया, अब ‘2’ राहत और चाहिए; ये सरकार के बस में नहीं

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/05 at 8:13 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार ने पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई कदम उठाए हैं जिनकी मांग विदेशी निवेशक लंबे समय से कर रहे थे। सरकारी बॉन्ड में निवेश को आसान बनाने से लेकर टैक्स से जुड़ी बाधाओं को दूर करने तक, लगभग हर वह फैसला लिया गया जिसे बाजार सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहा था। इसके बावजूद शेयर बाजार में वैसी तेजी देखने को नहीं मिली जिसकी उम्मीद निवेशक कर रहे थे।

Contents
HighLightsविदेशी निवेशकों को क्या-क्या राहत मिली?आखिर क्यों नहीं आई बाजार में बड़ी तेजी?क्या विदेशी निवेशक फिर से भारत लौटेंगे?कच्चा तेल क्यों बना सबसे बड़ा खतरा?अल नीनो और मानसून की चिंताRBI और सरकार ने अपना काम कर दिया, अब नजर इन दो फैक्टर्स परRelated Live Rates

HighLights

  • आरबीआई और केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों को टैक्स में बड़ी राहत दी।
  • सरकारी बॉन्ड में निवेश पर LTCG और विदहोल्डिंग टैक्स की समस्या दूर की गई।
  • कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अल नीनो का खतरा बाजार की सबसे बड़ी चिंता बने हुए हैं।
  • RBI के कदमों के बावजूद शेयर बाजार में उम्मीद के मुताबिक तेजी नहीं आई।

आरबीआई की मौद्रिक नीति के बाद उम्मीद की जा रही थी कि निफ्टी और सेंसेक्स नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ेंगे। 5 जून को निफ्टी 50 ने कारोबार के दौरान 23,516 का स्तर जरूर छुआ, लेकिन दिन के अंत तक यह फिसलकर करीब 23,366 अंक पर बंद हुआ। यह संकेत देता है कि बाजार की चिंता अब केवल ब्याज दरों, टैक्स या लिक्विडिटी तक सीमित नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और आरबीआई ने अपने नियंत्रण वाले लगभग सभी मोर्चों पर राहत दे दी है। अब बाजार की नजर उन दो बड़े कारकों पर है जिन पर न तो सरकार का सीधा नियंत्रण है और न ही आरबीआई का। ये दो कारक हैं—कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अल नीनो के कारण कमजोर मानसून की आशंका।

विदेशी निवेशकों को क्या-क्या राहत मिली?

सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) को आकर्षित करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें सबसे बड़ी घोषणा सरकारी प्रतिभूतियों (G-Sec) में निवेश पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCG) से जुड़ी राहत है।

इसके अलावा लंबे समय से विवाद का विषय बने विदहोल्डिंग टैक्स से जुड़ी परेशानियों को भी दूर करने का प्रयास किया गया है। आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय सरकारी बॉन्ड खरीदने की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से कई नियामकीय बदलाव किए हैं। सामान्य निवेश मार्ग के तहत व्यक्तिगत प्रतिभूतियों पर लागू कुछ सीमाओं को हटाया गया है ताकि विदेशी निवेशकों को अधिक लचीलापन मिल सके।

आम तौर पर ऐसे कदमों का असर शेयर और बॉन्ड बाजार दोनों में सकारात्मक रूप से दिखाई देता है। विदेशी निवेश बढ़ने से रुपये को मजबूती मिलती है, बॉन्ड यील्ड स्थिर रहती है और इक्विटी बाजार में भी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है।

आखिर क्यों नहीं आई बाजार में बड़ी तेजी?

बाजार की प्रतिक्रिया यह बताती है कि निवेशक फिलहाल टैक्स राहत या नीतिगत सुधारों से ज्यादा वैश्विक जोखिमों को महत्व दे रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था इस समय मांग की कमी से नहीं बल्कि लागत संबंधी दबावों से जूझ रही है।

ऊर्जा लागत बढ़ने का असर लगभग हर सेक्टर पर पड़ता है। पेट्रोल, डीजल, परिवहन, विनिर्माण और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों की लागत बढ़ने लगती है। इसका असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है और अंततः निवेशकों का उत्साह कम हो जाता है।

बाजार यह नहीं चाहता कि बढ़ती ऊर्जा कीमतें आर्थिक विकास की रफ्तार को प्रभावित करें। इसके अलावा यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है तो भारत का आयात बिल भी बढ़ेगा, जिससे चालू खाते के घाटे और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।

यही वजह है कि निवेशक फिलहाल सरकार की राहतों से ज्यादा कच्चे तेल के वैश्विक रुख पर नजर बनाए हुए हैं।

क्या विदेशी निवेशक फिर से भारत लौटेंगे?

यह सवाल फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है। सरकार और आरबीआई की घोषणाओं के बाद उम्मीद थी कि विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड बाजार में बड़े पैमाने पर वापसी करेंगे। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि मामला इतना आसान नहीं है।

भारतीय सरकारी बॉन्ड पर यील्ड लगभग 6.2% से 6.3% के बीच है। दूसरी ओर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड लगभग 4.5% के आसपास रिटर्न दे रहे हैं। पहली नजर में भारत अधिक आकर्षक दिखाई देता है, लेकिन विदेशी निवेशकों को मुद्रा जोखिम से बचने के लिए हेजिंग भी करनी पड़ती है।

विशेषज्ञों के अनुसार हेजिंग की लागत लगभग 3% से 3.5% तक पहुंच सकती है। इस लागत को जोड़ने के बाद भारतीय बॉन्ड में निवेश का अतिरिक्त लाभ काफी कम हो जाता है। यही कारण है कि केवल टैक्स राहत मिलने से विदेशी निवेशकों का बड़ा प्रवाह तुरंत शुरू हो जाएगा, ऐसा मानना जल्दबाजी हो सकती है।

सरकार ने निवेश को आसान जरूर बनाया है, लेकिन निवेशक अभी भी जोखिम और रिटर्न के संतुलन को ध्यान में रखकर फैसले ले रहे हैं।

कच्चा तेल क्यों बना सबसे बड़ा खतरा?

भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

आरबीआई गवर्नर ने भी हालिया टिप्पणी में संकेत दिया कि भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत, अप्रैल की मौद्रिक नीति रिपोर्ट में लगाए गए अनुमान से काफी अधिक रही है। उस समय तेल की औसत कीमत लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल मानी गई थी।

अब कई अर्थशास्त्री 95 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक की कीमत को आधार मानकर अपने अनुमान तैयार कर रहे हैं। कुछ महीनों में भारतीय बास्केट क्रूड की औसत कीमत 100 डॉलर से ऊपर भी रही है।

यदि यह रुझान जारी रहता है तो महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। तेल महंगा होने का असर परिवहन, लॉजिस्टिक्स, खाद्य वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादन की लागत पर भी पड़ता है। यही वजह है कि निवेशक तेल की कीमतों को लेकर सतर्क बने हुए हैं।

अल नीनो और मानसून की चिंता

बाजार की दूसरी बड़ी चिंता अल नीनो है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो की स्थिति बनने पर भारत में मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। भारत जैसी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण है।

यदि बारिश कम होती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर खाद्यान्न आपूर्ति पर पड़ता है और खाद्य महंगाई बढ़ने लगती है। टमाटर, प्याज, दालें, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है।

खाद्य महंगाई बढ़ने पर आरबीआई के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना और मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि बाजार मानसून के शुरुआती संकेतों पर भी बारीकी से नजर रख रहा है।

RBI और सरकार ने अपना काम कर दिया, अब नजर इन दो फैक्टर्स पर

बाजार की मौजूदा स्थिति का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि आरबीआई और सरकार ने अपने नियंत्रण वाले अधिकांश मोर्चों पर कदम उठा दिए हैं। टैक्स राहत, बॉन्ड निवेश में आसानी, लिक्विडिटी सपोर्ट और नीतिगत स्थिरता जैसे उपाय किए जा चुके हैं।

अब निवेशकों की नजर दो ऐसे कारकों पर है जिन पर नीति निर्माताओं का सीधा नियंत्रण नहीं है—पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और दूसरा मानसून का प्रदर्शन।

यदि आने वाले महीनों में तेल की कीमतों में नरमी आती है और मानसून सामान्य रहता है तो भारतीय शेयर बाजार को नई तेजी मिल सकती है। लेकिन यदि तेल महंगा बना रहता है और अल नीनो के कारण खाद्य महंगाई बढ़ती है तो बाजार पर दबाव जारी रह सकता है।

फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि टैक्स राहत और नीतिगत समर्थन के बावजूद बाजार का अगला रुख अब वैश्विक कमोडिटी कीमतों और मौसम की स्थिति तय करेगी।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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