ईरान युद्ध ने बढ़ाई वैश्विक महंगाई की चिंता, फर्टिलाइजर संकट से चावल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर की ओर
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी ईरान युद्ध अब केवल सैन्य और भू-राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया भर के करोड़ों लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। तीन महीने से अधिक समय से जारी इस संघर्ष ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर दिया है, जिसके कारण तेल, गैस और उर्वरकों (फर्टिलाइजर्स) की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। इसका सीधा असर खाद्य वस्तुओं पर पड़ रहा है और सबसे ज्यादा चिंता चावल की कीमतों को लेकर जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध जल्द समाप्त नहीं हुआ और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) तथा लाल सागर के व्यापारिक मार्गों में बाधा बनी रही, तो आने वाले महीनों में वैश्विक खाद्य महंगाई और गंभीर रूप ले सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ेगा जहां चावल लोगों का मुख्य भोजन है।
क्यों बढ़ गई दुनिया की चिंता?
अमेरिका ने आरोप लगाया है कि ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट के बड़े हिस्से में माइन बिछा दी हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। वहीं ईरान की ओर से बाब-अल-मंदेब जलमार्ग को बंद करने की धमकी ने भी वैश्विक व्यापार जगत की चिंता बढ़ा दी है।
ये दोनों समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक रास्तों में शामिल हैं। इनके प्रभावित होने से तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की सप्लाई बाधित हो रही है। परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में इनकी कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
फर्टिलाइजर 50% महंगा, अब चावल पर असर
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद कई एशियाई देशों में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कीमतों में करीब 50 फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई है। थाईलैंड, फिलीपींस और कंबोडिया जैसे देशों में किसानों की लागत तेजी से बढ़ी है।
धान की खेती उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भर होती है। ऐसे में जब फर्टिलाइजर महंगे होते हैं तो खेती की लागत बढ़ जाती है, जिसका असर अंततः चावल की कीमतों पर दिखाई देता है।
विश्लेषकों के अनुसार मई महीने में एशियाई बेंचमार्क थाई व्हाइट राइस की कीमत में लगभग 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अप्रैल से अब तक इसमें करीब 26 फीसदी की तेजी आ चुकी है और इसकी कीमत 480 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है।
इसी तरह शिकागो राइस फ्यूचर्स में भी पिछले महीने लगभग 15 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो बाजार में बढ़ती चिंता को दर्शाती है।
दुनिया की आधी आबादी का मुख्य भोजन है चावल
चावल केवल एक खाद्य वस्तु नहीं बल्कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा का आधार माना जाता है। अनुमान के अनुसार दुनिया में लगभग 3.5 से 4 अरब लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चावल पर निर्भर हैं।
एशिया के अधिकांश देशों में चावल दैनिक भोजन का मुख्य हिस्सा है। इसके अलावा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में भी इसकी खपत लगातार बढ़ रही है।
यदि चावल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है तो इसका असर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर सबसे अधिक पड़ेगा। कई गरीब देशों में खाद्य संकट और भुखमरी का खतरा भी बढ़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। हर साल भारत लगभग 21 से 22 मिलियन टन चावल वैश्विक बाजार में भेजता है। भारत के बाद थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और अमेरिका प्रमुख निर्यातक देशों में शामिल हैं।
हालांकि भारत के पास फिलहाल पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है, लेकिन उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से कृषि क्षेत्र की लागत बढ़ सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार फर्टिलाइजर लेकर भारत आने वाले करीब 17 जहाज फारस की खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए हैं।
खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। ऐसे में सरकार वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रही है ताकि किसानों को किसी प्रकार की कमी का सामना न करना पड़े।
अमेरिका को भी उठाने पड़ रहे असाधारण कदम
फर्टिलाइजर संकट का असर केवल एशिया तक सीमित नहीं है। अमेरिका जैसे विकसित देश को भी वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने वेनेजुएला से तेल और गैस के साथ-साथ यूरिया तथा फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के आयात के लिए नए लाइसेंस जारी किए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ चुकी है।
क्या दोबारा आ सकता है 2008 जैसा खाद्य संकट?
विशेषज्ञ मौजूदा हालात की तुलना 2008 के वैश्विक खाद्य संकट से कर रहे हैं। उस समय भी ऊर्जा कीमतों में उछाल, आपूर्ति संकट और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती मांग ने दुनिया भर में महंगाई को बढ़ा दिया था।
आज भी स्थिति कुछ हद तक वैसी ही दिखाई दे रही है। तेल महंगा हो रहा है, उर्वरकों की कीमतें बढ़ रही हैं और वैश्विक सप्लाई चेन दबाव में है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
किन देशों पर सबसे ज्यादा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्नलिखित देशों पर सबसे ज्यादा दबाव बन सकता है:
- फिलीपींस
- इंडोनेशिया
- बांग्लादेश
- नाइजीरिया
- सेनेगल
- घाना
- कई पश्चिम अफ्रीकी देश
इन देशों में बड़ी आबादी चावल पर निर्भर है और खाद्य आयात पर भी काफी हद तक निर्भरता रहती है।
आगे क्या होगा?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में स्थिति काफी हद तक मध्य पूर्व के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि समुद्री व्यापारिक मार्ग सामान्य हो जाते हैं तो उर्वरकों और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है।
लेकिन यदि युद्ध और लंबा चलता है तो वैश्विक खाद्य महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है। इसका असर केवल चावल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि गेहूं, मक्का, खाद्य तेल और अन्य कृषि उत्पादों पर भी दिखाई दे सकता है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और आम लोगों की जेब तक पहुंच चुका है। फर्टिलाइजर की कीमतों में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी और चावल के दामों में 26 फीसदी उछाल इस बात का संकेत है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो दुनिया के कई देशों में खाद्य महंगाई और भुखमरी की चुनौती और गंभीर हो सकती है। दुनिया की करीब आधी आबादी जिस चावल पर निर्भर है, उसकी बढ़ती कीमतें आने वाले समय में वैश्विक चिंता का सबसे बड़ा कारण बन सकती हैं।


