नई दिल्ली। भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से मई का महीना कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले देशों की सूची में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस के बाद अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जबकि लंबे समय से यह स्थान संभालने वाला सऊदी अरब तीसरे नंबर पर खिसक गया है।
कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म Kpler के ताजा आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत ने UAE से औसतन 5.40 लाख बैरल प्रतिदिन (BPD) कच्चे तेल का आयात किया। यह मात्रा अप्रैल की तुलना में थोड़ी कम जरूर रही, लेकिन मार्च के मुकाबले इसमें 166 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है।
रूस अब भी नंबर-1 सप्लायर
भारत के लिए रूस सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। मई में रूस से आयात बढ़कर लगभग 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो अप्रैल के मुकाबले करीब 23 प्रतिशत अधिक है।
रूस से सस्ते दाम पर उपलब्ध होने वाले कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को आकर्षित किया है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और मूल्य सीमा व्यवस्था के बावजूद भारतीय कंपनियां रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रही हैं, जिससे देश का आयात बिल नियंत्रित रखने में मदद मिल रही है।
UAE ने कैसे हासिल किया दूसरा स्थान?
ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार इसके पीछे सबसे बड़ी वजह सप्लाई रूट और लॉजिस्टिक्स हैं। पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के बीच UAE ने वैकल्पिक निर्यात मार्गों का प्रभावी उपयोग किया है।
UAE का फुजैरा टर्मिनल और सऊदी अरब की यानबू पाइपलाइन जैसे मार्ग ऐसे विकल्प हैं जो होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करते हैं। यही कारण है कि भारतीय रिफाइनरियों ने हाल के महीनों में UAE से आयात बढ़ाया।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो भारत के लिए UAE और भी महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बन सकता है।
सऊदी अरब तीसरे स्थान पर क्यों पहुंचा?
मई में सऊदी अरब से भारत का कच्चा तेल आयात घटकर लगभग 3.98 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह पिछले महीनों की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सप्लाई रूट की चुनौतियां, मूल्य निर्धारण और भारतीय रिफाइनरियों की खरीद रणनीति में बदलाव इसके प्रमुख कारण रहे हैं। इसके अलावा रूस और UAE से उपलब्ध प्रतिस्पर्धी कीमतों वाले तेल ने भी सऊदी अरब की हिस्सेदारी को प्रभावित किया है।
भारत का कुल तेल आयात भी बढ़ा
Kpler के आंकड़ों के मुताबिक मई में भारत का कुल कच्चा तेल आयात लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। यह अप्रैल के मुकाबले करीब 11 प्रतिशत और पिछले वर्ष की तुलना में 4 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाता है।
भारत में बढ़ती ईंधन मांग, औद्योगिक गतिविधियों में तेजी और बिजली उत्पादन की आवश्यकताओं ने तेल खपत को बढ़ावा दिया है। देश की अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ ऊर्जा जरूरतें भी लगातार बढ़ रही हैं।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
UAE का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर बनना भारत के लिए कई मायनों में फायदेमंद माना जा रहा है—
- आयात स्रोतों में विविधता बढ़ेगी।
- सप्लाई बाधित होने का जोखिम कम होगा।
- रिफाइनरियों को बेहतर मूल्य विकल्प मिलेंगे।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
- पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है।
क्या आगे भी बना रहेगा UAE का दबदबा?
ऊर्जा बाजार में स्थिति तेजी से बदलती रहती है। यदि रूस से रियायती तेल की उपलब्धता बनी रहती है तो वह भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बना रह सकता है। वहीं UAE अपनी उत्पादन क्षमता और निर्यात नेटवर्क के दम पर सऊदी अरब को चुनौती देता रह सकता है।
हालांकि अंतिम तस्वीर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, OPEC+ की उत्पादन नीति, पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और भारतीय रिफाइनरियों की खरीद रणनीति पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष
मई 2026 के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर है, लेकिन UAE ने सऊदी अरब को पीछे छोड़कर दूसरा स्थान हासिल कर लिया है। भारत के लिए यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आयात लागत और भविष्य की रणनीति से भी जुड़ा हुआ है।


