नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा विदेशी कपास पर लगने वाले 11 प्रतिशत आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने के फैसले का असर अब घरेलू बाजार में साफ दिखाई देने लगा है। जहां एक तरफ टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योग इस फैसले का स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय कपास उत्पादकों और किसानों के बीच चिंता बढ़ गई है। आयात शुल्क हटने के बाद विदेशी कपास भारतीय मिलों के लिए सस्ता हो गया है, जिसके चलते घरेलू कपास की मांग और कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अल्पकालिक रूप से कपड़ा उद्योग के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन यदि घरेलू कीमतों में लगातार गिरावट बनी रहती है तो इसका सीधा असर लाखों कपास किसानों की आय पर पड़ सकता है।
कपास की कीमतों में आई गिरावट
आयात शुल्क हटने के बाद सबसे बड़ा असर घरेलू कपास की कीमतों पर दिखाई दिया है। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने नई फसल की कपास की बिक्री कीमत में 700 रुपये प्रति गांठ की कटौती की है। बाजार सूत्रों के अनुसार इस कटौती के बावजूद मांग कमजोर बनी हुई है और खरीदारी मुख्य रूप से मिल मालिकों तक सीमित है।
मंडी कारोबारियों का कहना है कि कई स्पिनिंग मिलें अब विदेशी कपास के सौदे करने लगी हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कपास की लागत भारतीय कपास की तुलना में कम पड़ रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि घरेलू बाजार में खरीदारों की संख्या कम हुई और कीमतों पर दबाव बढ़ गया।
आखिर सरकार ने क्यों हटाई इंपोर्ट ड्यूटी?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादकों में शामिल है, लेकिन पिछले कुछ समय से टेक्सटाइल उद्योग लगातार सरकार से आयात शुल्क हटाने की मांग कर रहा था। उद्योग का तर्क था कि घरेलू बाजार में कपास महंगा होने के कारण उत्पादन लागत बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भारतीय निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इसी दबाव को देखते हुए सरकार ने 1 जून से 31 अक्टूबर तक विदेशी कपास पर लगने वाले 11 प्रतिशत आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने का फैसला लिया। सरकार का कहना है कि यह कदम नई खरीफ फसल आने तक उद्योग को राहत देने के लिए उठाया गया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्या चल रहा है?
वैश्विक कपास बाजार में भी पिछले कुछ महीनों के दौरान काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) पर कपास वायदा कीमतें हाल ही में लगभग 77.44 सेंट प्रति पाउंड के स्तर पर पहुंचीं। इससे पहले मई महीने में कीमतें 88 सेंट प्रति पाउंड तक चली गई थीं।
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी आने और आयात शुल्क हटने के संयुक्त प्रभाव से भारतीय मिलों को विदेशी कपास खरीदना अधिक आकर्षक लग रहा है। अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से आने वाला कपास कई मामलों में भारतीय बाजार की तुलना में सस्ता पड़ रहा है।
भारतीय किसानों पर क्या होगा असर?
कपास उत्पादक किसानों के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। यदि घरेलू मांग कमजोर बनी रहती है तो किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने में कठिनाई हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में करोड़ों किसान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कपास उत्पादन से जुड़े हुए हैं।
किसानों का तर्क है कि जब उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, तब कीमतों में गिरावट उनकी आय को प्रभावित करेगी। डीजल, उर्वरक और मजदूरी खर्च पहले से ही ऊंचे स्तर पर हैं। ऐसे में कपास के भाव कम होने से किसानों का लाभ घट सकता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि आयात शुल्क हटाने का फैसला सीमित अवधि के लिए है और नई फसल आने के बाद स्थिति की समीक्षा की जाएगी।
टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योग को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत का टेक्सटाइल उद्योग देश के सबसे बड़े रोजगार देने वाले क्षेत्रों में शामिल है। विभिन्न उद्योग संगठनों के अनुसार इस क्षेत्र से लगभग 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
उद्योग लंबे समय से कच्चे माल की ऊंची लागत की शिकायत कर रहा था। कपास सस्ता होने से स्पिनिंग मिलों, फैब्रिक निर्माताओं और गारमेंट कंपनियों की लागत घट सकती है। इससे भारतीय कंपनियों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और निर्यात को भी समर्थन मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे माल की लागत कम रहती है तो तैयार कपड़ों की कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले महीनों में घरेलू कपास बाजार की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय कीमतों और नई खरीफ फसल की स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक बाजार में कीमतें और नरम होती हैं तो भारतीय किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी लौटती है तो घरेलू कीमतों को सहारा मिल सकता है।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती उद्योग और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। फिलहाल कपड़ा उद्योग राहत महसूस कर रहा है, लेकिन किसानों की चिंताओं को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा।
निष्कर्ष
विदेशी कपास पर आयात शुल्क हटाने का फैसला भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है। घरेलू कीमतों में गिरावट और मांग में कमी से किसानों की आय प्रभावित हो सकती है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाती है।


