नई दिल्ली। देश में खाद्य तेलों की बढ़ती खपत और आयात पर निर्भरता के बीच कच्चे पाम तेल (Crude Palm Oil) पर आयात शुल्क बढ़ाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। तेलंगाना सरकार ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि कच्चे पाम तेल पर लगने वाले आयात शुल्क को बढ़ाया जाए ताकि घरेलू किसानों को बेहतर कीमत मिल सके और देश में पाम ऑयल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके।
तेलंगाना के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर इस मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में आयात शुल्क में कमी आने से विदेशी पाम ऑयल सस्ता हो गया है, जिससे भारतीय किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा।
आखिर क्यों बढ़ी आयात शुल्क बढ़ाने की मांग?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य देशों से आयात करता है। इनमें पाम ऑयल की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है क्योंकि यह अन्य खाद्य तेलों की तुलना में सस्ता पड़ता है। हालांकि, जब आयात शुल्क कम होता है तो विदेशी पाम ऑयल भारतीय बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध हो जाता है। इससे घरेलू स्तर पर उत्पादित पाम ऑयल की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है और किसानों को कम दाम मिलने लगते हैं। तेलंगाना सरकार का तर्क है कि यदि आयात शुल्क बढ़ाया जाता है तो विदेशी तेल महंगा होगा, जिससे घरेलू उत्पादकों को बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे और किसानों की आय बढ़ेगी।
44% ड्यूटी से 16.50% तक कैसे पहुंचा शुल्क?
राज्य सरकार ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि वर्ष 2018 में कच्चे पाम तेल पर प्रभावी आयात शुल्क लगभग 44 प्रतिशत था। उस समय किसानों को बेहतर कीमतें मिल रही थीं और पाम ऑयल की खेती तेजी से बढ़ रही थी। लेकिन बाद के वर्षों में खाद्य तेलों की महंगाई को नियंत्रित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने कई बार आयात शुल्क में कटौती की। परिणामस्वरूप वर्तमान प्रभावी शुल्क दर घटकर लगभग 16.50 प्रतिशत रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुल्क में कमी का फायदा उपभोक्ताओं को कम कीमत के रूप में जरूर मिला, लेकिन इसका असर किसानों की आय पर भी पड़ा है।
किसानों को क्या होगा फायदा?
कृषि मंत्री के अनुसार पाम ऑयल की खेती किसानों के लिए पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हो सकती है। पाम ऑयल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार पौधे लगाने के बाद लगभग 25 से 30 वर्षों तक उत्पादन मिलता रहता है। इससे किसानों को लंबे समय तक स्थिर आय का स्रोत प्राप्त होता है। तेलंगाना सरकार के अनुसार: किसानों को प्रति एकड़ ₹2 लाख से ₹3 लाख तक की वार्षिक आय मिल सकती है। ताजे फलों के गुच्छों (FFB) की मौजूदा कीमत लगभग ₹23,500 प्रति टन है। पाम ऑयल की उत्पादकता कई अन्य तिलहन फसलों से अधिक मानी जाती है। यदि आयात शुल्क बढ़ता है तो घरेलू बाजार में कीमतों को समर्थन मिल सकता है और किसानों को बेहतर रिटर्न प्राप्त हो सकता है।
भारत में पाम ऑयल उत्पादन बढ़ाने पर क्यों है जोर?
भारत हर साल खाद्य तेलों के आयात पर अरबों डॉलर खर्च करता है। सरकार लंबे समय से इस आयात निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रही है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन–ऑयल पाम (NMEO-OP) जैसी योजनाएं शुरू की गई हैं। इस मिशन का लक्ष्य देश में पाम ऑयल की खेती का विस्तार करना और घरेलू उत्पादन बढ़ाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत घरेलू स्तर पर पाम ऑयल उत्पादन बढ़ाने में सफल होता है तो खाद्य तेल आयात बिल कम होगा। किसानों की आय बढ़ेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन होगा। विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
तेलंगाना क्यों बना पाम ऑयल उत्पादन का केंद्र?
तेलंगाना ने पिछले कुछ वर्षों में पाम ऑयल खेती को तेजी से बढ़ावा दिया है। राज्य सरकार के अनुसार देश के कुल पाम ऑयल क्षेत्रफल में लगभग 36 प्रतिशत हिस्सेदारी तेलंगाना की है। राज्य सरकार का लक्ष्य 2026-27 तक अतिरिक्त 34,000 हेक्टेयर क्षेत्र को पाम ऑयल खेती के तहत लाना है। इसके लिए किसानों को पौधे, तकनीकी सहायता और प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यही वजह है कि राज्य सरकार पाम ऑयल किसानों के हितों की रक्षा के लिए आयात शुल्क बढ़ाने की मांग कर रही है।
क्या उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा असर?
आयात शुल्क बढ़ाने का एक दूसरा पहलू भी है। यदि विदेशी पाम ऑयल महंगा होता है तो खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में कुछ बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि सरकार को किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि शुल्क बहुत अधिक बढ़ाया जाता है तो खाद्य तेल महंगे हो सकते हैं, जबकि कम शुल्क किसानों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसी कारण केंद्र सरकार आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, घरेलू उत्पादन और महंगाई को ध्यान में रखकर आयात शुल्क तय करती है।
आगे क्या हो सकता है?
तेलंगाना सरकार की मांग ऐसे समय आई है जब देश खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। यदि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो पाम ऑयल किसानों को राहत मिल सकती है और घरेलू उत्पादन को नया प्रोत्साहन मिल सकता है। आने वाले महीनों में केंद्र सरकार का फैसला यह तय करेगा कि भारत आयातित खाद्य तेलों पर निर्भरता कम करने की दिशा में कितना बड़ा कदम उठाता है। फिलहाल किसानों और उद्योग जगत की नजर इस मांग पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।
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