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Reading: ₹500 का नोट छापने में सिर्फ ₹2.29 खर्च! फिर RBI को क्यों खर्च करने पड़ते हैं ₹4,875 करोड़?
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₹500 का नोट छापने में सिर्फ ₹2.29 खर्च! फिर RBI को क्यों खर्च करने पड़ते हैं ₹4,875 करोड़?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 4:42 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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11 Min Read
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नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब में रखा 500 रुपये का नोट छापने में आखिर कितना खर्च आता होगा? अधिकांश लोगों को लगता है कि इतने बड़े मूल्य के नोट को तैयार करने में काफी खर्च होता होगा। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट से सामने आई जानकारी कई लोगों को हैरान कर सकती है।

Contents
Highlights23.5% घटा नोटों की छपाई का खर्चआखिर 500 रुपये का नोट इतना सस्ता कैसे छप जाता है?फिर RBI को हजारों करोड़ रुपये क्यों खर्च करने पड़ते हैं?देश में सबसे ज्यादा चलन में है 500 रुपये का नोटडिजिटल भुगतान बढ़ा, फिर भी कैश की मांग क्यों बढ़ रही है?नोटबंदी के बाद क्या बदली तस्वीर?क्रेडिट-टू-जीडीपी अनुपात भी रिकॉर्ड स्तर परई-रुपया अभी तक नहीं बना लोगों की पहली पसंद2026-27 में RBI किन बातों पर करेगा फोकस?निष्कर्ष

Highlights

  • 500 रुपये का एक नया नोट छापने की लागत सिर्फ ₹2.29 बताई गई है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 में नोटों की छपाई पर RBI का खर्च 23.5% घटकर ₹4,875.2 करोड़ रह गया।
  • देश में चलन में मौजूद कुल मुद्रा का मूल्य बढ़कर ₹41.23 लाख करोड़ पहुंच गया है।
  • 500 रुपये का नोट अब भी सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नोट बना हुआ है।
  • डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद कैश की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है।

रिपोर्टों के अनुसार, 500 रुपये का एक नया नोट छापने की लागत केवल 2 रुपये 29 पैसे है। यानी जिस नोट की कीमत 500 रुपये है, उसे तैयार करने में उसकी वास्तविक वैल्यू का एक बहुत छोटा हिस्सा ही खर्च होता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि RBI को मुद्रा प्रबंधन पर कम खर्च करना पड़ता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भी केंद्रीय बैंक ने नोटों की छपाई और मुद्रा प्रबंधन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि पिछले वित्त वर्ष की तुलना में नोटों की छपाई पर होने वाला खर्च 23.5 प्रतिशत कम हो गया है। इसके बावजूद देश में चलन में मौजूद कुल मुद्रा का मूल्य रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह दिखाता है कि भारत में डिजिटल भुगतान की तेज वृद्धि के बावजूद नकदी का महत्व अभी भी बरकरार है।

23.5% घटा नोटों की छपाई का खर्च

RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में करेंसी नोटों की छपाई पर कुल खर्च 4,875.2 करोड़ रुपये रहा। इससे पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह खर्च 6,372.8 करोड़ रुपये था। इस तरह एक साल में मुद्रा छपाई पर होने वाला खर्च लगभग 1,500 करोड़ रुपये कम हो गया। RBI के अनुसार इसका प्रमुख कारण नोटों की छपाई के लिए कम ऑर्डर जारी किया जाना रहा। यानी इस दौरान अपेक्षाकृत कम संख्या में नए नोटों की जरूरत पड़ी। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि देश में नकदी का उपयोग घट गया है। वास्तव में चलन में मौजूद मुद्रा का कुल मूल्य बढ़ा है। इससे संकेत मिलता है कि उच्च मूल्य वर्ग के नोटों का उपयोग बढ़ा है और नकदी की मांग बनी हुई है।

आखिर 500 रुपये का नोट इतना सस्ता कैसे छप जाता है?

बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं कि जब एक नोट की कीमत 500 रुपये है तो उसे केवल 2.29 रुपये में कैसे तैयार किया जा सकता है? दरअसल किसी नोट की फेस वैल्यू और उसकी प्रिंटिंग लागत दो अलग-अलग चीजें हैं। नोट की कीमत सरकार और केंद्रीय बैंक की गारंटी पर आधारित होती है, जबकि प्रिंटिंग लागत में केवल उसे तैयार करने का खर्च शामिल होता है। एक नोट को तैयार करने में विशेष सुरक्षा कागज, सुरक्षा धागा, वाटरमार्क, विशेष स्याही, माइक्रो प्रिंटिंग, मशीनरी और गुणवत्ता परीक्षण जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। आधुनिक तकनीक के कारण बड़ी मात्रा में नोटों का उत्पादन अपेक्षाकृत कम लागत पर किया जा सकता है। यही वजह है कि 500 रुपये का नोट छापने में कुछ रुपये ही खर्च होते हैं जबकि उसकी वैल्यू 500 रुपये होती है।

फिर RBI को हजारों करोड़ रुपये क्यों खर्च करने पड़ते हैं?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। यदि एक नोट की लागत केवल ₹2.29 है तो RBI का कुल खर्च हजारों करोड़ रुपये क्यों रहता है? असल में मुद्रा प्रबंधन केवल नोट छापने तक सीमित नहीं है। इसके अलावा कई अन्य खर्च भी होते हैं। नए नोटों की छपाई, नोटों का सुरक्षित परिवहन, करेंसी चेस्ट का संचालन, खराब और पुराने नोटों की छंटाई, फटे और अनुपयोगी नोटों का नष्ट करना, सुरक्षा व्यवस्था, नकदी प्रबंधन के लिए तकनीकी अवसंरचना. इन सभी कार्यों पर होने वाला खर्च मिलाकर कुल लागत हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है।

देश में सबसे ज्यादा चलन में है 500 रुपये का नोट

RBI के आंकड़े बताते हैं कि 500 रुपये का नोट आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। मार्च 2026 के अंत तक चलन में मौजूद कुल मुद्रा मूल्य का 85.5 प्रतिशत हिस्सा केवल 500 रुपये के नोटों का था। इसकी कुल वैल्यू लगभग 35.27 लाख करोड़ रुपये बैठती है। संख्या के हिसाब से देखें तो देश में 705.48 करोड़ 500 रुपये के नोट चलन में मौजूद हैं। कुल नोटों की संख्या में इनकी हिस्सेदारी 41.2 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि नोटबंदी के लगभग दस साल बाद भी 500 रुपये का नोट सबसे अधिक लोकप्रिय और व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला नोट बना हुआ है।

डिजिटल भुगतान बढ़ा, फिर भी कैश की मांग क्यों बढ़ रही है?

पिछले कुछ वर्षों में भारत में UPI और डिजिटल भुगतान ने अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है। रोजाना करोड़ों लोग मोबाइल के जरिए भुगतान कर रहे हैं। इसके बावजूद नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। RBI के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक करेंसी-टू-जीडीपी अनुपात बढ़कर 12.1 प्रतिशत हो गया। मार्च 2025 में यह 11.7 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल और विविध अर्थव्यवस्था वाले देश में नकदी की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारों और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नकदी का व्यापक उपयोग जारी है। इसके अलावा आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी और उपभोक्ता खर्च में वृद्धि भी नकदी की मांग बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

नोटबंदी के बाद क्या बदली तस्वीर?

नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। उस समय यह उम्मीद जताई गई थी कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के साथ नकदी पर निर्भरता कम होगी। हालांकि पिछले दस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल भुगतान और नकदी दोनों समानांतर रूप से बढ़े हैं। नोटबंदी के बाद मार्च 2021 में करेंसी-टू-जीडीपी अनुपात 14.4 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। हालांकि वर्तमान स्तर इससे कम है, लेकिन फिर भी यह दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी की अहमियत खत्म नहीं हुई है।

क्रेडिट-टू-जीडीपी अनुपात भी रिकॉर्ड स्तर पर

RBI की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। मार्च 2026 के अंत तक क्रेडिट-टू-जीडीपी अनुपात बढ़कर 61.8 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। एक साल पहले यह अनुपात 57.4 प्रतिशत था। इससे संकेत मिलता है कि बैंकिंग सिस्टम द्वारा दिए जा रहे कर्ज में तेजी से वृद्धि हो रही है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में निवेश और उपभोग की गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।

ई-रुपया अभी तक नहीं बना लोगों की पहली पसंद

RBI का सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) प्रोजेक्ट यानी ई-रुपया अभी तक आम लोगों के बीच अपेक्षित लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाया है। 31 मार्च 2026 तक सर्कुलेशन में मौजूद ई-रुपये की कुल वैल्यू घटकर 771.7 करोड़ रुपये रह गई। एक साल पहले यह आंकड़ा 1,016.5 करोड़ रुपये था। यानी एक साल में इसमें 24.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि UPI की व्यापक स्वीकार्यता और उपयोग में आसानी के कारण ई-रुपये को अभी तक वह स्थान नहीं मिल पाया है जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

2026-27 में RBI किन बातों पर करेगा फोकस?

आगामी वित्त वर्ष के लिए RBI ने मुद्रा प्रबंधन से जुड़ी कई प्राथमिकताएं तय की हैं। इनमें शामिल हैं नोटों में नए और उन्नत सुरक्षा फीचर जोड़ना। नोटों की गुणवत्ता और टिकाऊपन बढ़ाना। मुद्रा प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार करना। दो नए इश्यू ऑफिस शुरू करना। नोट उत्पादन में स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना। नकली नोटों के खिलाफ सुरक्षा को मजबूत करना।

निष्कर्ष

500 रुपये का नोट भले ही केवल ₹2.29 में छपता हो, लेकिन भारतीय मुद्रा व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए RBI को हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। दिलचस्प बात यह है कि डिजिटल भुगतान के तेजी से बढ़ने के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। RBI की ताजा रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था में 500 रुपये का नोट अब भी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आने वाले वर्षों में डिजिटल भुगतान और नकदी दोनों साथ-साथ बढ़ते दिखाई दे सकते हैं, जबकि RBI सुरक्षा और तकनीकी सुधारों पर अपना फोकस बनाए रखेगा।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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