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Carbon Black: EV इंडस्ट्री के इस ‘गुमनाम हीरो’ ने बदल दी भारत की किस्मत, रूस-चीन भी रह गए पीछे

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/28 at 7:34 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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नई दिल्ली: इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) इंडस्ट्री की चर्चा होते ही सबसे पहले लिथियम, कोबाल्ट, निकेल या सेमीकंडक्टर्स जैसे नाम सामने आते हैं। लेकिन इसी सप्लाई चेन में एक ऐसा मटेरियल भी है, जिसने चुपचाप दुनिया की इंडस्ट्रियल इकॉनमी में अपनी मजबूत जगह बना ली है। यह मटेरियल है — कार्बन ब्लैक (Carbon Black)।

Contents
Highlightsआखिर क्या होता है कार्बन ब्लैक?ईवी इंडस्ट्री में क्यों जरूरी हो गया कार्बन ब्लैक?कैसे बदल गई भारत की स्थिति?रूस-यूक्रेन युद्ध बना बड़ा टर्निंग पॉइंटचीन को भी क्यों हुआ नुकसान?1. पर्यावरणीय नियम2. China+1 रणनीतिभारत कितनी तेजी से बढ़ रहा है?क्वालिटी ही सबसे बड़ा हथियारभारत के लिए क्यों अहम है यह सेक्टर?1. EV सप्लाई चेन में मजबूत पकड़2. निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा आय3. रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग4. चीन पर निर्भरता कमआगे क्या है चुनौती?निष्कर्ष

Highlights

  • ईवी बैटरी, टायर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में तेजी से बढ़ रही है कार्बन ब्लैक की मांग
  • भारत 2022 में नेट इंपोर्टर से नेट एक्सपोर्टर बन गया
  • यूरोप में रूस की जगह भारत बना बड़ा सप्लायर
  • चीन+1 रणनीति और रूस पर प्रतिबंध से भारत को मिला बड़ा मौका
  • स्पेशलिटी कार्बन ब्लैक अब हाई-वैल्यू इंडस्ट्रियल मटेरियल बन चुका है

पहले इसे सिर्फ टायर इंडस्ट्री से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब यही कार्बन ब्लैक ईवी बैटरी, हाई-परफॉर्मेंस टायर्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और कंडक्टिव प्लास्टिक्स का अहम हिस्सा बन चुका है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस सेक्टर में भारत ने इतनी तेजी से पकड़ बनाई है कि रूस और चीन जैसे देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। दरअसल, वैश्विक सप्लाई चेन में आए बदलावों ने भारत के लिए ऐसा मौका पैदा किया, जिसे भारतीय कंपनियों ने तेजी से भुनाया। अब भारत केवल घरेलू जरूरतें पूरी नहीं कर रहा, बल्कि यूरोप समेत कई बड़े बाजारों में कार्बन ब्लैक का बड़ा सप्लायर बन चुका है।

आखिर क्या होता है कार्बन ब्लैक?

कार्बन ब्लैक एक बेहद महीन काला पाउडर होता है, जिसे मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों या भारी तेलों के अधूरे दहन से तैयार किया जाता है। पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल रबर और टायरों को मजबूत बनाने में होता था। लेकिन तकनीक के विकास के साथ इसका नया रूप सामने आया — स्पेशलिटी कार्बन ब्लैक (Specialty Carbon Black)। यह साधारण कार्बन ब्लैक से कहीं ज्यादा एडवांस्ड होता है और हाई-टेक इंडस्ट्री में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी मदद से बिजली का प्रवाह बेहतर होता है, बैटरी की दक्षता बढ़ती है इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स ज्यादा स्थिर बनते हैं, प्लास्टिक और पॉलिमर को कंडक्टिव बनाया जाता है यही वजह है कि EV क्रांति के साथ इसकी मांग तेजी से बढ़ी है।

ईवी इंडस्ट्री में क्यों जरूरी हो गया कार्बन ब्लैक?

इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी में स्पेशलिटी कार्बन ब्लैक एक कंडक्टिव एडिटिव की तरह काम करता है। इसका काम बैटरी के अंदर इलेक्ट्रॉन्स के फ्लो को तेज और स्थिर बनाना होता है। अगर बैटरी में सही स्तर का कंडक्टिव मटेरियल न हो तो चार्जिंग स्पीड प्रभावित हो सकती है, बैटरी की क्षमता घट सकती है, गर्मी ज्यादा पैदा हो सकती है, बैटरी लाइफ कम हो सकती है.

यही कारण है कि लिथियम-आयन बैटरियों में इसकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। इसके अलावा EV टायर्स में भी इसकी मांग बढ़ी है। दरअसल, इलेक्ट्रिक वाहन पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में 20-30% ज्यादा भारी होते हैं क्योंकि उनमें बड़ी बैटरी लगी होती है। साथ ही EV तुरंत टॉर्क पैदा करते हैं, जिससे टायरों पर ज्यादा दबाव पड़ता है। इस अतिरिक्त दबाव को झेलने के लिए टायरों में ज्यादा मजबूत और हाई-क्वालिटी कार्बन ब्लैक का इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे बदल गई भारत की स्थिति?

कुछ साल पहले तक भारत कार्बन ब्लैक का नेट इंपोर्टर था। यानी देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता था। लेकिन 2022 के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

रूस-यूक्रेन युद्ध बना बड़ा टर्निंग पॉइंट

साल 2022 से पहले रूस यूरोप को कार्बन ब्लैक सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश था। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय संघ (EU) ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों के चलते यूरोप को नए सप्लायर की जरूरत पड़ी। यही मौका भारत के लिए गेमचेंजर साबित हुआ। भारतीय कंपनियों ने तेजी से यूरोप को सप्लाई बढ़ाई और कुछ ही समय में बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।

चीन को भी क्यों हुआ नुकसान?

कार्बन ब्लैक उत्पादन में चीन की क्षमता काफी बड़ी है। लेकिन वहां दो बड़ी समस्याएं सामने आईं:

1. पर्यावरणीय नियम

कार्बन ब्लैक उत्पादन में भारी मात्रा में ऊर्जा और कोयले का इस्तेमाल होता है। चीन ने हाल के वर्षों में प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन पर सख्ती बढ़ाई है। इससे कई प्लांट प्रभावित हुए।

2. China+1 रणनीति

अमेरिका और यूरोप की कंपनियां अब सप्लाई चेन को केवल चीन पर निर्भर नहीं रखना चाहतीं। इसी रणनीति को China+1 कहा जाता है।

इसका फायदा भारत, वियतनाम और कुछ अन्य एशियाई देशों को मिला। भारत ने इस मौके का सबसे ज्यादा लाभ उठाया।

भारत कितनी तेजी से बढ़ रहा है?

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट और ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal के विश्लेषण के मुताबिक भारत का कार्बन ब्लैक निर्यात लगभग 20% CAGR की दर से बढ़ रहा है। यह चीन की लगभग 4% ग्रोथ से करीब 5 गुना तेज है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत महज तीन साल के भीतर यूरोपीय संघ के लिए सबसे बड़ा कार्बन ब्लैक सप्लायर बन गया। यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सेक्टर केवल कम लागत पर नहीं, बल्कि तकनीकी गुणवत्ता और भरोसे पर चलता है।

क्वालिटी ही सबसे बड़ा हथियार

स्पेशलिटी कार्बन ब्लैक बनाना आसान काम नहीं है। इसमें बेहद सटीक तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण की जरूरत होती है। बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां किसी नए सप्लायर को मंजूरी देने से पहले कई तिमाहियों तक उसके प्रोडक्ट का परीक्षण करती हैं। अगर क्वालिटी में मामूली भी अंतर हो जाए तो बैटरी की क्षमता प्रभावित हो सकती है, इलेक्ट्रॉनिक्स में खराबी आ सकती है, टायर की परफॉर्मेंस घट सकती है. यही वजह है कि एक बार किसी सप्लायर को मंजूरी मिलने के बाद कंपनियां जल्दी सप्लायर नहीं बदलतीं। भारत के लिए यह सबसे बड़ा फायदा बनता जा रहा है क्योंकि भारतीय कंपनियां अब केवल सस्ता उत्पादन नहीं, बल्कि स्थिर गुणवत्ता भी दे रही हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है यह सेक्टर?

कार्बन ब्लैक इंडस्ट्री भारत के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण बनती जा रही है।

1. EV सप्लाई चेन में मजबूत पकड़

भारत केवल EV खरीदने वाला बाजार नहीं रहना चाहता, बल्कि पूरी सप्लाई चेन में अहम खिलाड़ी बनना चाहता है।

2. निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा आय

यूरोप और अन्य बाजारों में बढ़ती मांग भारत के निर्यात को मजबूत कर रही है।

3. रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग

इस सेक्टर में नए प्लांट, तकनीक और निवेश से रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

4. चीन पर निर्भरता कम

वैश्विक कंपनियां अब वैकल्पिक सप्लायर तलाश रही हैं और भारत इस भूमिका में तेजी से उभर रहा है।

आगे क्या है चुनौती?

हालांकि भारत की स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। पर्यावरणीय नियम भविष्य में सख्त हो सकते हैं कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव असर डाल सकता है, हाई-एंड स्पेशलिटी सेगमेंट में लगातार तकनीकी निवेश जरूरी होगा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कीमतों का दबाव बना रहेगा. इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि EV और ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) के दौर में स्पेशलिटी कार्बन ब्लैक की मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ सकती है।

निष्कर्ष

कार्बन ब्लैक कभी एक साधारण औद्योगिक केमिकल माना जाता था, लेकिन EV क्रांति ने इसकी अहमियत पूरी तरह बदल दी है। अब यह बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-परफॉर्मेंस टायर्स की रीढ़ बन चुका है। रूस पर प्रतिबंध, चीन+1 रणनीति और बढ़ती वैश्विक मांग के बीच भारत ने इस सेक्टर में जो बढ़त बनाई है, वह केवल निर्यात का आंकड़ा नहीं बल्कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का बड़ा संकेत है। अगर भारतीय कंपनियां गुणवत्ता और तकनीक पर इसी तरह फोकस बनाए रखती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत EV सप्लाई चेन का और भी बड़ा वैश्विक केंद्र बन सकता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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