नई दिल्ली। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। सिर्फ इसी महीने ईंधन की कीमतों में करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर तक की वृद्धि हो चुकी है। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक सवाल फिर जोर पकड़ने लगा है—क्या सरकारी तेल कंपनियां (OMCs) पश्चिम एशिया संकट के बीच रिकॉर्ड मुनाफा कमाकर जनता पर बोझ डाल रही हैं?
Highlights
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इस महीने चार बार बढ़ोतरी
- FY26 में OMCs का संयुक्त मुनाफा ₹77,821 करोड़
- असली दबाव Q1 FY27 के नतीजों में दिख सकता है
- सरकार को एक्साइज ड्यूटी कटौती से ₹1 लाख करोड़ का नुकसान
- तेल कंपनियों का वास्तविक मार्जिन केवल 3-4%
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल मिलाकर ₹77,821 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया है। पहली नजर में यह आंकड़ा बहुत बड़ा दिखता है, लेकिन जब इसके पीछे के गणित को समझते हैं, तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है।
आखिर क्यों बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा है। ईरान, इजराइल और आसपास के क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी भी तेजी सीधे भारतीय तेल कंपनियों की लागत बढ़ा देती है। यही कारण है कि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि भारत में कीमतों में बढ़ोतरी अभी भी कई पड़ोसी देशों की तुलना में कम रही है। जहां कुछ देशों में ईंधन की कीमतें 20% से 67% तक बढ़ीं, वहीं भारत में यह वृद्धि करीब 8-9% के आसपास रही।
सरकार ने भी उठाया बड़ा बोझ
केंद्र सरकार पहले ही पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में लगभग 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर चुकी थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार, इस फैसले से सरकार को करीब ₹1 लाख करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। यानी पूरी राहत सिर्फ तेल कंपनियों के भरोसे नहीं दी गई, बल्कि सरकार ने भी टैक्स कम करके कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की।
क्या सच में OMCs “विंडफॉल प्रॉफिट” कमा रही हैं?
यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है। ₹77,821 करोड़ का मुनाफा सुनने में जरूर बहुत बड़ा लगता है, लेकिन इसे कुल कारोबार (Turnover) के मुकाबले समझना जरूरी है। तीनों बड़ी सरकारी तेल कंपनियों का कुल कारोबार करीब ₹20 लाख करोड़ के आसपास है। इस हिसाब से उनका नेट मार्जिन केवल 3% से 4% बैठता है। कमोडिटी बिजनेस, खासकर रिफाइनिंग और फ्यूल मार्केटिंग इंडस्ट्री में यह बिल्कुल सामान्य माना जाता है।
उदाहरण से समझिए
इंडियन ऑयल का अकेले का कारोबार करीब ₹10 लाख करोड़ के आसपास है। जबकि उसका मुनाफा लगभग ₹20,000-30,000 करोड़ के बीच रहता है। यानी मार्जिन करीब 3% ही निकलता है। अगर इतनी बड़ी कंपनियां सिर्फ 0.5% या 1% मार्जिन पर काम करें, तो उनके लिए नए रिफाइनरी प्रोजेक्ट, पाइपलाइन नेटवर्क और ग्रीन एनर्जी निवेश करना लगभग असंभव हो जाएगा।
अभी दिख रहा मुनाफा पुराने सस्ते तेल की वजह से है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FY26 के नतीजों में जो मुनाफा दिख रहा है, वह पूरी तरह मौजूदा महंगे कच्चे तेल का असर नहीं दिखाता। भारतीय तेल कंपनियां आमतौर पर 50-60 दिनों का क्रूड ऑयल स्टॉक रखती हैं। यह स्टॉक उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें काफी कम थीं। इसका मतलब है कि कंपनियों ने FY26 के अधिकतर हिस्से में पुराने और अपेक्षाकृत सस्ते तेल को प्रोसेस किया। इसलिए मौजूदा संकट का पूरा दबाव अभी उनके बैलेंस शीट में दिखाई नहीं दे रहा।
असली टेस्ट अब Q1 FY27 में होगा
मार्च के आखिर और अप्रैल से जो महंगा कच्चा तेल सिस्टम में आया है, उसका असर वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में दिख सकता है। यह नतीजे अगस्त 2026 में सामने आएंगे। अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो OMCs की मार्केटिंग मार्जिन पर भारी दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में या तो कंपनियों का मुनाफा घटेगा या फिर सरकार को दोबारा टैक्स कटौती अथवा सब्सिडी जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
तेल कंपनियों का पैसा आखिर जाता कहां है?
कई लोग मानते हैं कि तेल कंपनियां सिर्फ मुनाफा कमाकर बैठ जाती हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।
1. सरकार को टैक्स और डिविडेंड
सालाना मुनाफे का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट टैक्स और डिविडेंड के रूप में सरकार के पास जाता है। यही पैसा सड़कों, रेलवे, मेट्रो, हाईवे और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में इस्तेमाल होता है।
2. इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार
रिफाइनरी क्षमता बढ़ाना, पाइपलाइन नेटवर्क बनाना और पेट्रोल पंप नेटवर्क का विस्तार बेहद पूंजी-गहन काम है। कंपनियों को इसके लिए हजारों करोड़ रुपये निवेश करने पड़ते हैं।
3. ग्रीन एनर्जी निवेश
आज OMCs सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं हैं। वे ग्रीन हाइड्रोजन, EV चार्जिंग, बायोफ्यूल और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भी बड़े निवेश कर रही हैं।
4. सब्सिडी का बोझ
FY25 में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कंपनियों ने लगभग ₹40,434 करोड़ का बोझ खुद उठाया था। यानी कई बार कंपनियों को सामाजिक जिम्मेदारी के तहत घाटा भी सहना पड़ता है।
जनता की नाराजगी क्यों बढ़ती है?
जब भी पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और उसी दौरान कंपनियों का बड़ा मुनाफा सामने आता है, तो आम लोगों को लगता है कि उनसे ज्यादा वसूली की जा रही है। लेकिन तेल कारोबार की वास्तविकता काफी जटिल है। इसमें अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतें, डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स संरचना, इन्वेंट्री कॉस्ट, रिफाइनिंग मार्जिन, सरकारी नीतियां सभी का बड़ा रोल होता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले महीनों में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी:
1. कच्चे तेल की कीमतें
अगर मिडिल ईस्ट तनाव बढ़ता है और तेल 110 डॉलर के ऊपर जाता है, तो भारत में ईंधन और महंगा हो सकता है।
2. सरकार की टैक्स नीति
सरकार चुनावी और महंगाई दबाव को देखते हुए एक्साइज ड्यूटी में फिर कटौती कर सकती है।
3. OMCs की Q1 FY27 कमाई
अगस्त 2026 में आने वाले नतीजे बताएंगे कि मौजूदा संकट का असली असर कंपनियों पर कितना पड़ा।
निष्कर्ष
₹77,821 करोड़ का मुनाफा सुनने में जरूर बहुत बड़ा लगता है, लेकिन इसे पूरे कारोबार और उद्योग की प्रकृति के संदर्भ में देखना जरूरी है। सरकारी तेल कंपनियां भारी टर्नओवर वाले कम मार्जिन बिजनेस में काम करती हैं। मौजूदा मुनाफे का बड़ा हिस्सा पुराने सस्ते स्टॉक की वजह से आया है, जबकि महंगे कच्चे तेल का वास्तविक दबाव अभी सामने आना बाकी है। यानी फिलहाल यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि तेल कंपनियां “अंधा पैसा” कमा रही हैं। आने वाली तिमाहियां तय करेंगी कि पश्चिम एशिया संकट का असली वित्तीय असर कितना गंभीर होता है।
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