भारतीय रुपया अब सिर्फ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ही दबाव में नहीं है, बल्कि चीन की मुद्रा युआन के सामने भी लगातार कमजोर होता जा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-अमेरिका टकराव, महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भारतीय मुद्रा पर जबरदस्त दबाव बना दिया है। इसका सीधा फायदा चीन को मिल रहा है, जबकि भारत के लिए यह महंगाई, बढ़ते आयात बिल और रिकॉर्ड ट्रेड डेफिसिट का कारण बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार जनवरी 2026 से अब तक भारतीय रुपया चीनी युआन के मुकाबले करीब 8 फीसदी तक टूट चुका है। पहले जहां 1 युआन खरीदने के लिए भारतीय आयातकों को लगभग 12.8 से 13 रुपये खर्च करने पड़ते थे, वहीं अब यह लागत बढ़कर 14 से 14.2 रुपये तक पहुंच गई है। इसका सीधा असर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर इक्विपमेंट और मोबाइल उद्योग पर पड़ रहा है, क्योंकि ये सेक्टर काफी हद तक चीन से आयातित सामान पर निर्भर हैं।
क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?
भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ने के पीछे कई बड़े आर्थिक कारण हैं। सबसे पहला कारण भारत और चीन के बीच लगातार बढ़ता व्यापार घाटा है। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने चीन से करीब 115 से 120 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि चीन को भारतीय निर्यात केवल 14.5 अरब डॉलर के आसपास रहा। इसका मतलब है कि भारत को चीन को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ रही है। दूसरी तरफ, जहां भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दबाव में है, वहीं चीनी युआन ने इस साल अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई है। वैश्विक बाजार में चीन की निर्यात क्षमता और सरकारी समर्थन के कारण युआन डॉलर के मुकाबले 2 से 3 फीसदी तक मजबूत बना हुआ है। इससे दोनों मुद्राओं के बीच का अंतर और तेजी से बढ़ा है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे हालातों ने कच्चे तेल की कीमतों को भी उछाल दिया है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया और कमजोर होता है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली ने भी भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाया है। इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये की कमजोरी और तेज हो गई।
भारत पर कितना बढ़ा बोझ?
युआन के मुकाबले रुपये में आई गिरावट का असर अब सीधे भारतीय कंपनियों और आम उपभोक्ताओं पर दिखने लगा है। चीन से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स, मोबाइल कंपोनेंट्स, सोलर पैनल, मशीनरी और केमिकल्स की कीमतें 8 से 10 फीसदी तक महंगी हो चुकी हैं। अगर भारत के 120 अरब डॉलर के आयात को आधार मानें, तो सिर्फ युआन के मुकाबले रुपये में आई करीब 7 फीसदी कमजोरी के कारण भारत पर लगभग 8.4 अरब डॉलर यानी करीब 80,700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ चुका है। इसका असर आने वाले महीनों में महंगाई के रूप में दिख सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं और युआन मजबूत होता रहा, तो भारत में मोबाइल, टीवी, लैपटॉप, सोलर इक्विपमेंट, ऑटो पार्ट्स और दवा उद्योग की लागत तेजी से बढ़ सकती है।
चीन को कैसे हो रहा फायदा?
भारत जैसे बड़े बाजार में चीन पहले से ही मजबूत स्थिति में है। रुपया कमजोर होने के बाद अब चीनी कंपनियों को भारतीय बाजार से ज्यादा कमाई हो रही है। भारतीय आयातकों को समान मात्रा का सामान खरीदने के लिए अब ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे चीन का निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों मजबूत होते हैं। चीन लंबे समय से अपनी सप्लाई चेन, मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात सेक्टर को मजबूत करने में जुटा है। वहीं भारत अभी भी इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी सेक्टर में चीन पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है।
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और मशीनरी उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी पार्ट्स और कच्चा माल चीन से आता है। यही कारण है कि भारत चाहकर भी चीन से आयात तुरंत कम नहीं कर सकता।
किन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा असर?
रुपये की कमजोरी का असर सबसे ज्यादा उन उद्योगों पर पड़ सकता है जो चीन से बड़े पैमाने पर आयात करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर
मोबाइल फोन, टीवी, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर कंपोनेंट चीन से आते हैं। इससे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
सोलर इंडस्ट्री
भारत का सोलर सेक्टर अभी भी चीन पर काफी निर्भर है। सोलर पैनल और सेल की लागत बढ़ने से ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं।
ऑटो सेक्टर
ऑटो पार्ट्स और बैटरी कंपोनेंट्स की कीमत बढ़ने से गाड़ियों की लागत पर असर पड़ सकता है।
फार्मा और केमिकल सेक्टर
भारत कई जरूरी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) चीन से आयात करता है। इससे दवाओं की लागत भी प्रभावित हो सकती है।
RBI और सरकार का क्या है प्लान?
रुपये पर बढ़ते दबाव को देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और केंद्र सरकार कई रणनीतिक कदमों पर काम कर रहे हैं। सरकार विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के लिए एनआरआई डिपॉजिट नियमों को आसान बनाने की तैयारी कर रही है। इससे डॉलर का इनफ्लो बढ़ सकता है। इसके अलावा भारतीय बॉन्ड मार्केट में विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नए सुधारों पर भी काम चल रहा है। सरकार और RBI दोनों स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं ताकि डॉलर और युआन पर निर्भरता कम की जा सके। भारत कुछ देशों के साथ रुपये में व्यापार बढ़ाने की कोशिश भी कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू उत्पादन को तेजी से मजबूत करता है, तभी चीन पर निर्भरता कम हो पाएगी।
आगे क्या हो सकता है?
अगर पश्चिम एशिया का तनाव और बढ़ता है, कच्चा तेल 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव आने वाले महीनों में और बढ़ सकता है। हालांकि RBI के पास अभी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन लगातार बढ़ता ट्रेड डेफिसिट और चीन पर आयात निर्भरता भारत के लिए लंबी अवधि की बड़ी चुनौती बनती जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब सिर्फ मुद्रा बचाने पर नहीं, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग मजबूत करने, चीन पर निर्भरता घटाने और निर्यात बढ़ाने पर ज्यादा फोकस करना होगा। वरना कमजोर रुपया आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक दबाव दोनों को और बढ़ा सकता है।
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