देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिए हैं कि अगर मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो आने वाले महीनों में ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल के दाम ₹2 से ₹5 प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं।
BPCL के मानव संसाधन निदेशक (HR Director) राज कुमार दुबे ने हाल ही में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हुए कहा कि वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। तेल उत्पादक क्षेत्रों में तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं का असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन सकती है।
वैश्विक संकट ने बढ़ाई चिंता
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर बनी अनिश्चितता ने तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। दुनिया के समुद्री मार्गों से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ता है।
राज कुमार दुबे के अनुसार, कई क्षेत्रों में तेल और गैस से जुड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और उसकी मरम्मत में समय लग सकता है। यही कारण है कि बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहती है तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ेगी और उसका असर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
आखिर क्यों बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर उसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है।
जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में कंपनियों के सामने तीन रास्ते होते हैं—
- पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई जाएं।
- कंपनियां कुछ समय तक घाटा सहन करें।
- सरकार सब्सिडी या अन्य राहत उपायों के जरिए कंपनियों की मदद करे।
BPCL अधिकारी ने संकेत दिया कि लंबे समय तक कीमतों को कृत्रिम रूप से स्थिर रखना आसान नहीं होगा। यदि वैश्विक बाजार में दबाव बना रहता है तो किसी न किसी स्तर पर कीमतों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।
कितना महंगा हो सकता है पेट्रोल और डीजल?
हालांकि BPCL की ओर से कोई आधिकारिक अनुमान जारी नहीं किया गया है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹2 से ₹5 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी संभव है।
यह बढ़ोतरी देखने में भले छोटी लगे, लेकिन इसका असर करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। भारत में परिवहन व्यवस्था काफी हद तक सड़क मार्ग पर आधारित है, इसलिए ईंधन की कीमत बढ़ने का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता।
आम आदमी की जेब पर कितना पड़ेगा असर?
अगर पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो इसका प्रभाव लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देता है।
सबसे पहले ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है। ट्रकों और मालवाहक वाहनों की लागत बढ़ने से फल, सब्जियां, अनाज और अन्य रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। इसके अलावा ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं, कैब सेवाओं और बस किराए पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन महंगाई का सीधा संबंध खुदरा महंगाई दर से होता है। इसलिए पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने पर रिजर्व बैंक और सरकार दोनों की चिंता बढ़ जाती है।
भारत ने कैसे कम की आयात पर निर्भरता?
राज कुमार दुबे ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तेल आयात के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है। पहले देश सीमित देशों से तेल खरीदता था, लेकिन अब रूस, अफ्रीका, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया समेत कई क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद की जा रही है।
BPCL ने भी अपने सप्लाई स्रोतों की संख्या लगभग दोगुनी कर दी है। इसका फायदा यह हुआ है कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरी सप्लाई प्रभावित नहीं होती।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने की रणनीति ने पिछले कुछ वर्षों में भारत को काफी राहत दी है। इससे आयात लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
संकट के बावजूद क्यों बढ़ रही है ईंधन की मांग?
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश की तेज आर्थिक वृद्धि, बढ़ती औद्योगिक गतिविधियां और वाहनों की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोतरी है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। सड़क निर्माण, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में विस्तार के कारण ईंधन की खपत लगातार बढ़ रही है।
यही कारण है कि सरकार और तेल कंपनियां सप्लाई सुरक्षा को लेकर विशेष रणनीति पर काम कर रही हैं।
इथेनॉल ब्लेंडिंग ने कैसे बचाए अरबों डॉलर?
BPCL अधिकारी ने 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बताया। उनके अनुसार यदि यह कार्यक्रम लागू नहीं होता तो देश को काफी अधिक पेट्रोल आयात करना पड़ता।
इथेनॉल ब्लेंडिंग के कई फायदे हैं—
- पेट्रोल आयात की जरूरत कम होती है।
- विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
- किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में इथेनॉल आधारित ईंधन के उपयोग को और बढ़ाना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे तेल आयात बिल को कम करने में मदद मिलेगी।
ग्रीन एनर्जी पर तेजी से बढ़ रहा निवेश
राज कुमार दुबे ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।
देश में सौर ऊर्जा क्षमता 200 गीगावॉट से अधिक के स्तर तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा सरकार कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG), ग्रीन हाइड्रोजन और प्राकृतिक गैस जैसे विकल्पों पर भी जोर दे रही है।
भारत का लक्ष्य आने वाले वर्षों में तेल आयात पर निर्भरता को कम करना है ताकि वैश्विक संकटों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर सीमित रहे।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन एनर्जी में बढ़ता निवेश केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।
क्या सरकार टैक्स में राहत दे सकती है?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आती है तो सरकार के पास एक्साइज ड्यूटी या वैट में राहत देने का विकल्प मौजूद है। अतीत में भी केंद्र और कई राज्य सरकारें ऐसा कर चुकी हैं।
हालांकि टैक्स में कटौती करने से सरकारी राजस्व पर असर पड़ता है। इसलिए सरकार आमतौर पर तभी ऐसा कदम उठाती है जब कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी देखने को मिले।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सरकार राहत उपायों पर विचार कर सकती है।
आगे क्या?
फिलहाल भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईंधन आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना और बढ़ती लागत को नियंत्रित करना है। BPCL अधिकारी के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि यदि वैश्विक ऊर्जा संकट गहराता है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि भारत ने सप्लाई स्रोतों में विविधता, इथेनॉल ब्लेंडिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे कदमों के जरिए अपनी स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत की है। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया की स्थिति यह तय करेंगी कि भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल के मोर्चे पर राहत मिलेगी या महंगाई का एक और झटका झेलना पड़ेगा।
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