ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन पर भी साफ दिखाई देने लगा है। चीन ने पहले ही बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का स्टॉक जमा कर लिया था, इसलिए वहां फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद चीन की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव में दिखाई दे रही है। निवेश घट रहा है, फैक्ट्री उत्पादन धीमा पड़ रहा है, रिटेल बिक्री कमजोर है और कारों से लेकर सोना-चांदी तक की मांग में गिरावट दर्ज की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन की आर्थिक सुस्ती लंबे समय तक जारी रहती है, तो इसका असर केवल एशिया ही नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। क्योंकि चीन दुनिया की सप्लाई चेन, मैन्युफैक्चरिंग और कमोडिटी बाजार का सबसे बड़ा खिलाड़ी है।
चीन की इकॉनमी में आखिर क्या हो रहा है?
चीन ने ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ही भारी मात्रा में कच्चे तेल की खरीदारी कर ली थी। इस कारण वहां ऊर्जा संकट जैसी स्थिति फिलहाल नहीं बनी। लेकिन असली समस्या तेल की उपलब्धता नहीं बल्कि घरेलू मांग में कमजोरी और निवेश में गिरावट है।
चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 के पहले चार महीनों में फिक्स्ड एसेट इन्वेस्टमेंट में 1.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि कंपनियां और डेवलपर्स नए प्रोजेक्ट्स में निवेश करने से बच रहे हैं।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह रियल एस्टेट सेक्टर माना जा रहा है। प्रॉपर्टी डेवलपमेंट निवेश में जनवरी से अप्रैल के दौरान 13.7 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है। इससे पहले जनवरी-मार्च अवधि में यह गिरावट 11.2 फीसदी थी। यानी चीन का प्रॉपर्टी संकट लगातार गहराता जा रहा है।
क्यों अहम है चीन का प्रॉपर्टी सेक्टर?
चीन की अर्थव्यवस्था में रियल एस्टेट सेक्टर का योगदान बेहद बड़ा माना जाता है। निर्माण, स्टील, सीमेंट, घरेलू उपकरण, बैंकिंग और रोजगार जैसे कई सेक्टर इससे जुड़े हैं। पिछले कुछ वर्षों में बड़े-बड़े चीनी डेवलपर्स कर्ज संकट में फंस गए थे। इसके बाद घरों की बिक्री घटी और लोगों का भरोसा कमजोर हुआ।
अब स्थिति यह है कि लोग नए घर खरीदने से बच रहे हैं जबकि डेवलपर्स नए प्रोजेक्ट लॉन्च नहीं कर रहे। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था में दिखाई देने लगा है।
इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में भी सुस्ती
चीन लंबे समय से दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब माना जाता है। लेकिन अप्रैल में देश का इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन केवल 4.1 फीसदी बढ़ा, जो 2023 के मध्य के बाद सबसे कमजोर ग्रोथ मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप और अमेरिका में मांग कमजोर होने के कारण चीन के निर्यात पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा कई ग्लोबल कंपनियां “China Plus One” रणनीति के तहत भारत, वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों में उत्पादन बढ़ा रही हैं। इससे भी चीन की फैक्ट्री गतिविधियों पर असर पड़ा है।
रिटेल बिक्री में आई बड़ी गिरावट
चीन की घरेलू मांग भी कमजोर होती दिख रही है। अप्रैल में रिटेल सेल ग्रोथ केवल 0.2 फीसदी रही। यह आंकड़ा दिसंबर 2022 के बाद सबसे कमजोर माना जा रहा है, जब कोरोना प्रतिबंध हटाए गए थे।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि चीन में लोग खर्च करने से बच रहे हैं। रोजगार को लेकर अनिश्चितता और प्रॉपर्टी बाजार में कमजोरी के कारण उपभोक्ताओं का भरोसा कमजोर पड़ा है। लोग बचत बढ़ा रहे हैं और गैर-जरूरी खर्च घटा रहे हैं।
कारों की बिक्री क्यों घटी?
चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो बाजार है। लेकिन अप्रैल में वहां कारों की बिक्री में सालाना आधार पर करीब 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। यह 2022 के बाद सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।
इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं: लोगों की खरीद क्षमता पर दबाव, प्रॉपर्टी बाजार में कमजोरी, रोजगार को लेकर चिंता, ईवी सेक्टर में कीमतों की जंग, बैंक लोन की सख्त शर्तें
कार बिक्री में गिरावट किसी भी देश की आर्थिक कमजोरी का बड़ा संकेत मानी जाती है क्योंकि वाहन खरीद आमतौर पर उपभोक्ता विश्वास से जुड़ी होती है।
सोना-चांदी और जूलरी की मांग भी कमजोर
चीन में सोने, चांदी और जूलरी की बिक्री में भी 21 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। आमतौर पर आर्थिक अनिश्चितता के समय सोने की मांग बढ़ती है, लेकिन चीन में घरेलू उपभोक्ता खर्च इतना कमजोर है कि लग्जरी और जूलरी खरीद भी प्रभावित हो रही है।
इसका असर वैश्विक बुलियन बाजार पर भी पड़ सकता है क्योंकि चीन दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड कंज्यूमर देशों में शामिल है।
क्या ईरान युद्ध ने बढ़ाई मुश्किलें?
विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान युद्ध ने चीन की मौजूदा आर्थिक समस्याओं को और बढ़ा दिया है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से: ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हुई, शिपिंग लागत बढ़ी, व्यापारिक अनिश्चितता बढ़ी, निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ हालांकि चीन के पास पर्याप्त तेल भंडार है, लेकिन वैश्विक आर्थिक माहौल खराब होने से उसके निर्यात और निवेश दोनों पर दबाव बढ़ा है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर चीन की अर्थव्यवस्था कमजोर रहती है, तो भारत पर इसका दोहरा असर पड़ सकता है।
फायदा
ग्लोबल कंपनियां भारत की ओर शिफ्ट हो सकती हैं, “China Plus One” रणनीति को गति मिल सकती है, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फायदा हो सकता है
नुकसान
वैश्विक मांग कमजोर पड़ सकती है, कमोडिटी बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है, निर्यात पर असर पड़ सकता है
ग्लोबल इकॉनमी के लिए खतरे की घंटी?
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसलिए वहां की कमजोरी को केवल स्थानीय समस्या नहीं माना जा सकता। IMF और विश्व बैंक पहले ही वैश्विक विकास दर को लेकर चिंता जता चुके हैं। ऐसे में अगर चीन की मांग और निवेश लंबे समय तक कमजोर रहते हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया की ग्रोथ पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में चीन सरकार को बड़े आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज और ब्याज दरों में कटौती जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं ताकि अर्थव्यवस्था को सहारा दिया जा सके।
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