भारत की करेंसी रुपया (Indian Rupee) लगातार दबाव में बना हुआ है। बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया एक बार फिर टूट गया और इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान रुपया 33 पैसे गिरकर 96.90 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह पहली बार है जब भारतीय करेंसी ₹97 प्रति डॉलर के बेहद करीब पहुंची है।
बीते कुछ महीनों से रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही थी, लेकिन अब हालात ज्यादा गंभीर दिखाई देने लगे हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने भारतीय मुद्रा पर भारी दबाव डाल दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में रुपया और कमजोर हो सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेश यात्रा और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है।
97 रुपये के करीब पहुंचा डॉलर, रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया
20 मई को इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया 96.86 प्रति डॉलर पर खुला। शुरुआती कारोबार में ही यह फिसलकर 96.90 तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। यानी सिर्फ एक दिन में भारतीय मुद्रा में 33 पैसे की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
मुद्रा बाजार के जानकारों के मुताबिक फिलहाल बाजार में डॉलर की मांग काफी बढ़ गई है, जबकि रुपये की सप्लाई बढ़ने से इसकी कीमत कमजोर पड़ रही है।
एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में शामिल हुआ रुपया
साल 2026 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया 7% से ज्यादा टूट चुका है। यही वजह है कि यह इस समय उभरती हुई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की सबसे कमजोर करेंसियों में गिना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर होने और वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने से भारतीय करेंसी लगातार दबाव में बनी हुई है। सिर्फ इस सप्ताह की बात करें तो रुपया करीब 0.7% गिर चुका है। लगातार कई दिनों की गिरावट ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
आखिर क्यों टूट रहा है रुपया?
रुपये में गिरावट के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है, बल्कि कई बड़े वैश्विक और घरेलू फैक्टर एक साथ काम कर रहे हैं।
1. कच्चे तेल की कीमतों में आग
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। मिडिल ईस्ट संकट के कारण तेल बाजार में सप्लाई को लेकर डर बना हुआ है। तेल कंपनियों को ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपया कमजोर हो रहा है।
2. अमेरिका की बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड तेजी
अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 4.5% के ऊपर पहुंच गई है, जबकि 30 साल की यील्ड 5.1% के पार निकल गई है। यह करीब 19 साल का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
जब अमेरिकी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न मिलता है तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका की तरफ शिफ्ट करने लगते हैं। इसी वजह से भारतीय बाजार से डॉलर बाहर जा रहा है और रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
3. विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली
फरवरी से अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से 22 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की है।
जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। इससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर हो जाता है।
4. मिडिल ईस्ट संकट का बड़ा असर
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी तनाव ने पूरी दुनिया के बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। हालांकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत में प्रगति की बात कही है, लेकिन अब तक कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है।
युद्ध या तनाव की स्थिति में निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ भागते हैं और डॉलर को सबसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है। इससे डॉलर मजबूत हो रहा है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
रुपये की कमजोरी सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहती। इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
पेट्रोल-डीजल हो सकते हैं महंगे
भारत तेल आयात करता है। डॉलर महंगा होने से तेल खरीदने की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल महंगे
भारत बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल पार्ट्स और चिप्स आयात करता है। रुपया कमजोर होने से इनकी कीमतें बढ़ सकती हैं।
विदेश यात्रा और पढ़ाई होगी महंगी
जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या विदेश घूमने की योजना बना रहे हैं, उन्हें ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं क्योंकि डॉलर महंगा हो गया है।
महंगाई बढ़ने का खतरा
रुपये की कमजोरी से आयातित सामान महंगा हो जाता है। इससे देश में महंगाई बढ़ सकती है। खासकर खाद्य तेल, गैस, केमिकल और औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
क्या RBI दखल दे सकता है?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अक्सर रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव होने पर बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक दबाव लगातार बना रहा तो RBI के लिए रुपये को लंबे समय तक संभालना आसान नहीं होगा। RBI फिलहाल विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके बाजार में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर: ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर से ऊपर बना रहता है, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची रहती है, और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है, तो रुपया जल्द ही 97 प्रति डॉलर का स्तर भी पार कर सकता है। हालांकि यदि मिडिल ईस्ट तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तो भारतीय मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है।
निष्कर्ष
भारतीय रुपया इस समय कई वैश्विक दबावों के बीच फंसा हुआ है। तेल की महंगाई, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेश निकासी और मिडिल ईस्ट संकट ने मिलकर रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। आने वाले दिनों में डॉलर और रुपया दोनों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी, क्योंकि इसका असर सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी की जेब और देश की महंगाई पर भी साफ दिखाई देगा।
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