भारत की मुद्रा बाजार में सोमवार को बड़ा झटका देखने को मिला। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 54 पैसे टूटकर 96.35 प्रति डॉलर के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया पहली बार 96 के स्तर से नीचे फिसल गया था। लगातार दो कारोबारी सत्रों में रिकॉर्ड गिरावट ने सरकार, उद्योग और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
रुपये में यह कमजोरी ऐसे समय आई है जब सरकार ने सोने-चांदी के आयात पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए हैं और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी बाजार पर नजर बनाए हुए है। इसके बावजूद रुपया संभल नहीं पा रहा। सवाल यह है कि आखिर भारतीय मुद्रा पर इतना दबाव क्यों है और आने वाले दिनों में इसका असर कहां-कहां दिखाई देगा?
दिनभर में कहां से कहां पहुंचा रुपया
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में सोमवार सुबह रुपया 96.19 प्रति डॉलर पर खुला। शुरुआती कारोबार से ही इसमें कमजोरी दिखाई दी और दिन के दौरान यह 96.39 तक टूट गया। अंत में रुपया 96.35 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है।
पिछले कुछ दिनों से डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। शुक्रवार को भी रुपया 95.81 के स्तर पर बंद हुआ था। यानी सिर्फ दो कारोबारी सत्रों में भारतीय मुद्रा में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
आखिर क्यों टूट रहा है रुपया?
विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट के पीछे सिर्फ एक नहीं बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारण काम कर रहे हैं।
1. कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक तेजी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत सोमवार को 109 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई संकट की आशंका ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है।
| तेल कीमत | असर |
|---|---|
| $70-$80 प्रति बैरल | सामान्य दबाव |
| $90-$100 प्रति बैरल | आयात लागत बढ़ती |
| $110 के करीब | रुपये पर गंभीर दबाव |
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर तेल 110 डॉलर से ऊपर स्थिर रहता है तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है।
2. अमेरिका-ईरान तनाव ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने वैश्विक निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर धकेला है। जब दुनिया में भू-राजनीतिक संकट बढ़ता है तो निवेशक अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड में पैसा लगाते हैं।
इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरते देशों की मुद्राएं कमजोर पड़ती हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
मजबूत डॉलर इंडेक्स बना बड़ी परेशानी
दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत मापने वाला डॉलर इंडेक्स 99 के ऊपर बना हुआ है। यह दिखाता है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग अभी भी मजबूत है।
3. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी
अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल यानी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।
मिराए एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट अनुज चौधरी के मुताबिक,
“मजबूत डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी के कारण रुपये में कमजोर रुख बना रह सकता है। वैश्विक तनाव और एफआईआई निकासी भी रुपये पर दबाव डाल सकती है।”
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि RBI का संभावित हस्तक्षेप रुपये को कुछ समर्थन दे सकता है।
4. सोने-चांदी पर अंकुश भी क्यों नहीं आया काम?
सरकार और RBI ने सोने-चांदी के आयात को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं क्योंकि भारत में बड़े पैमाने पर कीमती धातुओं का आयात होता है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और चालू खाता घाटा प्रभावित होता है।
लेकिन इस बार हालात अलग हैं।
वजहें:
- कच्चे तेल का आयात बिल कहीं ज्यादा बड़ा है
- वैश्विक संकट के कारण डॉलर की मांग बढ़ी हुई है
- निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर खरीद रहे हैं
- विदेशी बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है
यानी सोने-चांदी पर अंकुश लगाने के बावजूद तेल और वैश्विक तनाव से बनने वाला दबाव ज्यादा भारी पड़ रहा है।
RBI क्या कर सकता है?
भारतीय रिजर्व बैंक आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में डॉलर बेचकर रुपये को समर्थन देता है। RBI के पास अभी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है।
RBI के अनुसार, 8 मई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 696.98 अरब डॉलर पहुंच गया। यह दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में शामिल है।
| सप्ताह | विदेशी मुद्रा भंडार |
|---|---|
| पिछला सप्ताह | 690.69 अरब डॉलर |
| ताजा सप्ताह | 696.98 अरब डॉलर |
विशेषज्ञों का मानना है कि RBI जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोका जा सके।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
रुपये की कमजोरी सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
1. पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है
कच्चा तेल महंगा और रुपया कमजोर होने से तेल कंपनियों की लागत बढ़ती है।
2. महंगाई बढ़ सकती है
इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, मशीनरी और कई आयातित सामान महंगे हो सकते हैं।
3. विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी
डॉलर महंगा होने से विदेश में पढ़ाई और यात्रा की लागत बढ़ती है।
4. कंपनियों पर दबाव
जिन कंपनियों पर विदेशी कर्ज ज्यादा है, उनकी लागत बढ़ सकती है।
शेयर बाजार पर क्या असर दिख सकता है?
हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) शुक्रवार को 1,329 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे, लेकिन अगर रुपये में कमजोरी लगातार जारी रहती है तो विदेशी निवेशकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
विशेष रूप से एविएशन, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां, पेंट कंपनियां, आयात आधारित उद्योग इन सेक्टरों पर ज्यादा दबाव देखने को मिल सकता है।
क्या 97 के स्तर तक पहुंच सकता है रुपया?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चा तेल 110 डॉलर के ऊपर बना रहता है, पश्चिम एशिया तनाव बढ़ता है डॉलर इंडेक्स मजबूत रहता है तो रुपया 96.60 से आगे भी कमजोर हो सकता है। हालांकि RBI की सक्रियता और विदेशी मुद्रा भंडार कुछ राहत दे सकते हैं।
निष्कर्ष
भारतीय रुपये में आई यह ऐतिहासिक गिरावट सिर्फ एक दिन की कमजोरी नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक तनाव, तेल संकट और मजबूत डॉलर का संयुक्त असर है। सरकार और RBI के पास स्थिति संभालने के विकल्प जरूर हैं, लेकिन जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया की स्थिति यह तय करेगी कि रुपया संभलेगा या और नीचे जाएगा।
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