भारत में अगर बचपन की सबसे मजबूत यादों की बात हो, तो नटराज और अप्सरा पेंसिल का नाम शायद ही कोई भूल पाए। स्कूल बैग में रखी लाल-काली धारियों वाली नटराज पेंसिल, ड्रॉइंग कॉपी में इस्तेमाल होने वाली अप्सरा पेंसिल और परीक्षा के दिनों में बार-बार घिसने वाले शार्पनर… ये सिर्फ स्टेशनरी प्रोडक्ट्स नहीं थे, बल्कि करोड़ों भारतीयों के बचपन का हिस्सा थे। आज भी देश के अधिकांश स्कूलों में बच्चों की पहली लिखाई अक्सर इन्हीं पेंसिलों से शुरू होती है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन मशहूर पेंसिलों के पीछे एक ऐसी भारतीय कंपनी की कहानी है, जिसने 68 साल पहले बेहद छोटे स्तर से शुरुआत की थी और आज भारतीय स्टेशनरी बाजार पर दबदबा बना रखा है। Hindustan Pencils की शुरुआत 1958 में तीन दोस्तों ने मिलकर की थी। आज यह कंपनी हर रोज 85 लाख से ज्यादा पेंसिल बनाती है और भारत के पेंसिल बाजार के करीब 60 फीसदी हिस्से पर कब्जा रखती है।
तीन दोस्तों ने रखी थी नींव
हिंदुस्तान पेंसिल्स की शुरुआत साल 1958 में हुई थी। कंपनी की नींव बी.जे. संघवी, रामनाथ मेहरा और मनसुखानी ने मिलकर रखी थी। बी.जे. संघवी को लोग प्यार से बाबूभाई भी कहते थे। उस दौर में भारत में क्वालिटी स्टेशनरी का बाजार काफी छोटा था और विदेशी कंपनियों का दबदबा माना जाता था। लेकिन इन तीन दोस्तों ने भारतीय बाजार की जरूरत को समझा और सस्ती, मजबूत और भरोसेमंद पेंसिल बनाने का फैसला किया।
कंपनी शुरू करने से पहले ये लोग जर्मनी गए, जहां उन्होंने पेंसिल निर्माण की तकनीक और उत्पादन प्रक्रिया को करीब से समझा। उस समय जर्मनी को दुनिया के सबसे बड़े और उन्नत पेंसिल निर्माण केंद्रों में गिना जाता था। वहीं से सीखी गई तकनीक और अनुभव को भारत लाकर उन्होंने अपनी फैक्ट्री की शुरुआत की।
उस दौर में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक छोटी भारतीय स्टेशनरी कंपनी आने वाले दशकों में देश की सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता बन जाएगी।
नटराज पेंसिल कैसे बनी घर-घर की पहचान?
हिंदुस्तान पेंसिल्स ने सबसे पहले नटराज ब्रांड लॉन्च किया। लाल और काली धारियों वाली नटराज 621 HB पेंसिल धीरे-धीरे भारतीय स्कूलों की पहचान बन गई। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी मजबूत लकड़ी, स्मूद लिखाई और कम कीमत थी।
1970 के दशक तक नटराज देश के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंच चुकी थी। उस समय भारत में शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा था और स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसका फायदा कंपनी को भी मिला।
विशेषज्ञों के मुताबिक हिंदुस्तान पेंसिल्स ने शुरुआत से ही mass market strategy अपनाई। कंपनी ने ऐसा प्रोडक्ट बनाया जिसे middle-class और lower-middle-class परिवार भी आसानी से खरीद सकें। यही वजह रही कि नटराज सिर्फ एक पेंसिल नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन गई।
अप्सरा ने कैसे बनाई अलग पहचान?
नटराज की सफलता के बाद कंपनी ने 1970 में अप्सरा ब्रांड लॉन्च किया। शुरुआत में इसे drawing pencils और premium stationery segment को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था।
जहां नटराज को मजबूत और किफायती ब्रांड के रूप में पेश किया गया, वहीं अप्सरा को बेहतर writing experience और premium quality के साथ बाजार में उतारा गया। यह कंपनी की dual-brand strategy का हिस्सा था।
बाद में अप्सरा सिर्फ drawing pencils तक सीमित नहीं रही। इसके तहत:
- erasers
- sharpeners
- wax crayons
- oil pastels
- geometry boxes
- scales
- और water colours
जैसे कई प्रोडक्ट लॉन्च किए गए। इस रणनीति ने कंपनी को अलग-अलग तरह के ग्राहकों तक पहुंचने में मदद की। एक तरफ नटराज mass market में लोकप्रिय रही, वहीं अप्सरा comparatively premium segment में मजबूत होती गई।
भारत की सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता कंपनी
आज हिंदुस्तान पेंसिल्स भारत की सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता कंपनी मानी जाती है। कंपनी हर दिन:
- 85 लाख से ज्यादा पेंसिल
- 17 लाख शार्पनर
- 27 लाख इरेजर
- 3 लाख स्केल
- और 10 लाख पेन
का उत्पादन करती है। यह आंकड़ा सिर्फ भारतीय स्टेशनरी उद्योग की विशालता नहीं दिखाता बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि आज भी traditional stationery products की मांग खत्म नहीं हुई है। डिजिटल एजुकेशन और टैबलेट्स के दौर में भी स्कूलों में पेंसिल और स्टेशनरी की जरूरत लगातार बनी हुई है। खासकर प्राथमिक शिक्षा में पेंसिल की मांग अब भी बेहद मजबूत मानी जाती है।
50 से ज्यादा देशों में पहुंचा भारतीय ब्रांड
हिंदुस्तान पेंसिल्स सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। कंपनी के प्रोडक्ट्स 50 से ज्यादा देशों में निर्यात किए जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक भारतीय स्टेशनरी उद्योग का export market लगातार बढ़ रहा है। अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के कई देशों में भारतीय स्टेशनरी प्रोडक्ट्स की मजबूत मांग है क्योंकि वे comparatively affordable और durable माने जाते हैं। नटराज और अप्सरा जैसे ब्रांड्स ने इसी segment में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।
Marketing strategy ने भी दिलाई बड़ी सफलता
कंपनी की marketing strategy को भी इसकी सफलता की बड़ी वजह माना जाता है।
नटराज की टैगलाइन:
“फिर से चैंपियन”
ने छात्रों और parents के बीच मजबूत emotional connect बनाया। वहीं अप्सरा की टैगलाइन:
“Five Marks Extra”
ने premium और performance-oriented image तैयार की। ब्रांडिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि हिंदुस्तान पेंसिल्स ने Indian consumer psychology को बहुत अच्छे तरीके से समझा। कंपनी ने अपने products को सिर्फ stationery नहीं बल्कि पढ़ाई और सफलता से जोड़कर पेश किया।
आज किसके हाथ में है कंपनी की कमान?
समय के साथ बाबूभाई संघवी ने कंपनी की कमान संभाली और हिंदुस्तान पेंसिल्स को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज कंपनी का संचालन हरेंद्र संघवी और कीर्ति संघवी कर रहे हैं, जो मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा अगली पीढ़ी के सदस्य भी कंपनी के अलग-अलग विभागों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
हालांकि हाल के वर्षों में स्टेशनरी बाजार में competition बढ़ा है और digital learning के विस्तार ने भी नई चुनौतियां पैदा की हैं। इसके बावजूद कंपनी लगातार अपने product portfolio को diversify करने पर काम कर रही है।
बदलते दौर में भी क्यों कायम है नटराज-अप्सरा का दबदबा?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदुस्तान पेंसिल्स की सबसे बड़ी ताकत इसकी brand recall है। भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनकी बचपन की यादें नटराज और अप्सरा से जुड़ी हुई हैं।
इसके अलावा:
- मजबूत distribution network
- affordable pricing
- consistent quality
- और decades-old trust
ने कंपनी को बाजार में मजबूत बनाए रखा है। आज भी छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक स्टेशनरी दुकानों में नटराज और अप्सरा की मौजूदगी आसानी से दिखाई देती है।
भारतीय स्टेशनरी बाजार कितना बड़ा है?
भारत का स्टेशनरी बाजार तेजी से बढ़ रहा है। शिक्षा क्षेत्र के विस्तार, स्कूल enrollment बढ़ने और creative learning products की मांग के कारण इस industry में लगातार growth देखी जा रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक:
- art supplies
- colouring products
- premium stationery
- और school accessories
का बाजार आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ सकता है। ऐसे में हिंदुस्तान पेंसिल्स जैसी कंपनियां traditional products के साथ-साथ नए segments पर भी फोकस कर रही हैं।
सिर्फ पेंसिल नहीं, करोड़ों लोगों की यादों का हिस्सा
नटराज और अप्सरा की सफलता सिर्फ business growth की कहानी नहीं है। यह उस दौर की भी कहानी है जब भारतीय brands ने विदेशी कंपनियों को चुनौती देकर अपने दम पर पहचान बनाई।
आज भी जब कोई बच्चा पहली बार लिखना सीखता है या drawing book में रंग भरता है, तो कहीं न कहीं नटराज और अप्सरा जैसे ब्रांड उस अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यही वजह है कि 68 साल बाद भी इन ब्रांड्स की लोकप्रियता बरकरार है।
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