पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर अब भारत की सरकारी तेल कंपनियों पर भारी पड़ने लगा है।
सूत्रों के अनुसार देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियां यानी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों को स्थिर रखने के लिए भारी वित्तीय दबाव झेल रही हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ये कंपनियां रोजाना ₹1600-1700 करोड़ तक की अंडर-रिकवरी का बोझ उठा रही हैं। पिछले 10 हफ्तों में यह कुल घाटा ₹1 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
आखिर क्या है अंडर-रिकवरी?
अंडर-रिकवरी का मतलब उस अंतर से है जो तेल कंपनियों की वास्तविक लागत और ग्राहकों को बेचे जाने वाले दाम के बीच होता है।
यानी अगर कच्चा तेल महंगा हो जाए, परिवहन लागत बढ़ जाए और रिफाइनिंग खर्च बढ़ जाए, लेकिन कंपनियां ग्राहकों को पुराने दाम पर ही पेट्रोल-डीजल बेचती रहें, तो जो नुकसान होता है उसे अंडर-रिकवरी कहा जाता है।
क्यों बढ़ा कंपनियों पर दबाव?
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया संकट की वजह से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ समय में कच्चे तेल की कीमतों में 50% तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
हालांकि भारत में पेट्रोल, डीजल और घरेलू LPG की कीमतों में उतनी तेजी नहीं दिखाई गई। इसी वजह से सरकारी तेल कंपनियों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
अभी कितने हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
फिलहाल देश में पेट्रोल करीब ₹94.77 प्रति लीटर और डीजल करीब ₹87.67 प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार ये कीमतें लंबे समय से लगभग स्थिर बनी हुई हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर तेजी से पड़ता है।
LPG पर भी बढ़ रहा बोझ
मार्च में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत में ₹60 की बढ़ोतरी की गई थी।
इसके बावजूद रिपोर्ट्स के अनुसार LPG की बिक्री अब भी वास्तविक लागत से कम कीमत पर हो रही है। यानी LPG से भी कंपनियों पर वित्तीय दबाव बना हुआ है।
कंपनियों को लेना पड़ सकता है कर्ज
विशेषज्ञों के अनुसार तेल कंपनियां अपनी कमाई का इस्तेमाल कच्चा तेल खरीदने, रिफाइनरी संचालन, पाइपलाइन विस्तार और फ्यूल नेटवर्क बढ़ाने जैसे कामों में करती हैं।
लेकिन लगातार बढ़ती अंडर-रिकवरी की वजह से कंपनियों को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है ताकि ईंधन सप्लाई प्रभावित न हो।
सरकार के सामने क्या चुनौती?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई और वित्तीय दबाव के बीच संतुलन बनाए रखने की बन चुकी है।
अगर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जाते हैं, तो आम लोगों पर महंगाई का असर बढ़ सकता है। लेकिन अगर कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित रखी जाती हैं, तो तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव और बढ़ सकता है।
किन परियोजनाओं पर पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों के अनुसार अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो रिफाइनरी विस्तार, पाइपलाइन प्रोजेक्ट, रणनीतिक तेल भंडार, ग्रीन फ्यूल प्रोजेक्ट और ऊर्जा परिवर्तन योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
सरकार को भी हो रहा नुकसान
ऊर्जा संकट का असर कम करने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है।
रिपोर्ट्स के अनुसार पेट्रोल पर अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3 प्रति लीटर कर दी गई, जबकि डीजल पर ₹10 प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक इस फैसले से सरकार को हर महीने करीब ₹14,000 करोड़ के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
क्या आगे बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, पश्चिम एशिया संकट लंबा चला और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित रही, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि अंतिम फैसला काफी हद तक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तेल कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर सीधे महंगाई, परिवहन लागत, उद्योग और घरेलू बजट पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यही वजह है कि सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल उपभोक्ताओं को अचानक बड़े झटके से बचाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा। अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं होता, तो आने वाले महीनों में सरकार और तेल कंपनियों दोनों के सामने दबाव और बढ़ सकता है।
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