US Diesel Price: अमेरिका में डीजल की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। शुक्रवार को देश में डीजल की औसत कीमत बढ़कर 5.85 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई। ईंधन की कीमतों में इस तेज उछाल का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रांसपोर्टेशन, खेती, लॉजिस्टिक्स और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की सप्लाई में आई बाधाओं ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर दबाव बढ़ा दिया है। अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमत इसी संकट का एक बड़ा संकेत मानी जा रही है।
डीजल महंगा होने से क्यों बढ़ेगी परेशानी?
डीजल अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण ईंधन है। इसका इस्तेमाल केवल ट्रकों में ही नहीं, बल्कि कृषि मशीनरी, मालगाड़ियों, कार्गो जहाजों, बसों और दूसरे भारी परिवहन साधनों में भी होता है।
यही वजह है कि डीजल की कीमत बढ़ने पर कंपनियों की ऑपरेटिंग लागत बढ़ जाती है। इसके बाद कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं।
इसका असर ऑनलाइन डिलीवरी, पार्सल और दूसरे लॉजिस्टिक्स चार्ज के रूप में दिखाई दे सकता है। वहीं, दुकानों में बिकने वाले सामान की कीमतों पर भी धीरे-धीरे इसका प्रभाव पड़ सकता है।
खाने-पीने की चीजों पर सबसे पहले पड़ सकता है असर
डीजल की कीमत बढ़ने का सबसे बड़ा असर उन उत्पादों पर पड़ सकता है जिन्हें लगातार एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना पड़ता है।
फल, सब्जियां, मीट, सीफूड और दूसरे जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थ इसकी प्रमुख श्रेणी में आते हैं। इन सामानों को खेत या उत्पादन केंद्र से स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और फिर सुपरमार्केट तक पहुंचाने के लिए बड़ी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की जरूरत होती है।
खेती में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनें भी डीजल से चलती हैं। इसलिए ईंधन की कीमत बढ़ने का असर उत्पादन लागत से लेकर अंतिम बिक्री कीमत तक दिखाई दे सकता है।
जानकारों के मुताबिक, अगर डीजल की कीमत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
पेट्रोल भी हुआ महंगा
अमेरिका में केवल डीजल ही महंगा नहीं हुआ है। पेट्रोल की औसत कीमत भी बढ़ रही है, हालांकि डीजल की तुलना में इसकी रफ्तार कम है।
AAA के मुताबिक, अमेरिका में रेगुलर गैसोलीन की औसत कीमत करीब 4.15 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई है। पिछले साल इसी अवधि में यह लगभग 3.20 डॉलर प्रति गैलन थी।
यानी एक साल में पेट्रोल की कीमत में भी बड़ा अंतर आया है।
ईरान संघर्ष से पहले कितना था डीजल का दाम?
AAA के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने से पहले अमेरिका में डीजल की औसत कीमत करीब 3.76 डॉलर प्रति गैलन थी।
इसके बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई और डीजल के दाम भी बढ़ने लगे। मिडिल ईस्ट में सप्लाई बाधित होने और उत्पादन में कटौती की आशंकाओं ने बाजार में चिंता बढ़ा दी।
होर्मुज स्ट्रेट भी इस पूरे संकट में बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के तेल कारोबार के लिए यह एक अहम समुद्री मार्ग है। यहां शिपिंग और सप्लाई में किसी भी तरह की बाधा से ग्लोबल ऑयल मार्केट पर सीधा असर पड़ सकता है।
ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर के पार
कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी भी अमेरिका में ईंधन महंगा होने की प्रमुख वजह है।
शुक्रवार को इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था। संघर्ष शुरू होने से पहले यह करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था।
कच्चा तेल पेट्रोल और डीजल दोनों के उत्पादन का प्रमुख आधार है। इसलिए क्रूड महंगा होने पर कुछ समय के अंतराल के बाद इसका असर रिफाइंड फ्यूल की कीमतों पर भी दिखाई देता है।
2022 में भी अमेरिका ने देखी थी ऐसी महंगाई
अमेरिका में डीजल की कीमतों में इससे पहले भी बड़ा उछाल देखने को मिला था।
जून 2022 में डीजल की औसत कीमत करीब 5.82 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध और रूस पर लगाए गए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ग्लोबल एनर्जी मार्केट में भारी उथल-पुथल हुई थी।
हालांकि, महंगाई के हिसाब से पुराने आंकड़ों को देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। 2008 में डीजल की करीब 4.74 डॉलर प्रति गैलन कीमत आज के डॉलर मूल्य के हिसाब से लगभग 7.20 डॉलर के बराबर बैठती है।
इसी तरह 2022 का करीब 5.82 डॉलर का स्तर आज के हिसाब से लगभग 6.56 डॉलर के बराबर माना जा सकता है।
फिर भी मौजूदा तेजी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि ईंधन की कीमतें सीधे तौर पर कारोबार और उपभोक्ताओं दोनों के खर्च को प्रभावित करती हैं।
Amazon से लेकर डिलीवरी कंपनियों तक बढ़ी लागत
ईंधन महंगा होने का असर लॉजिस्टिक्स कंपनियों पर भी पड़ रहा है।
अप्रैल में Amazon ने कुछ थर्ड-पार्टी सेलर्स पर 3.5% का अस्थायी फ्यूल और लॉजिस्टिक्स सरचार्ज लगाया था। इसके अलावा UPS, FedEx और United States Postal Service जैसी कंपनियों ने भी युद्ध के दौरान कुछ शिपमेंट पर अतिरिक्त शुल्क लागू किए।
इससे संकेत मिलता है कि बढ़ती ईंधन लागत धीरे-धीरे सप्लाई चेन के अलग-अलग हिस्सों में पहुंच रही है।
ट्रकिंग टेक्नोलॉजी कंपनी Semicab के सीईओ और फाउंडर अजेश कपूर के मुताबिक, ट्रांसपोर्टेशन इंडस्ट्री डीजल की बढ़ती कीमतों के साथ कुछ हद तक खुद को एडजस्ट कर सकती है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है।
डीजल महंगा हुआ तो सामान भी महंगा हो सकता है
डीजल की कीमत और रोजमर्रा की चीजों की कीमत के बीच सीधा संबंध है।
किसी उत्पाद को बनाने के बाद उसे गोदाम, डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर, दुकान और ग्राहक तक पहुंचाने में कई चरण होते हैं। इनमें ट्रक, ट्रेन, जहाज और दूसरे परिवहन साधनों का इस्तेमाल होता है।
अगर हर चरण में ईंधन की लागत बढ़ती है तो अंततः इसका कुछ हिस्सा उत्पाद की कीमत में शामिल हो सकता है।
इसका मतलब है कि डीजल की मौजूदा तेजी का असर तुरंत हर सामान पर दिखाई न दे, लेकिन अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं का खर्च बढ़ सकता है।
अमेरिका के बाहर भी बढ़ सकती है मुश्किल
मौजूदा ऊर्जा संकट का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने की आशंका नहीं है।
एशिया और अफ्रीका के कई देश मिडिल ईस्ट से होने वाले ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं। ऐसे में लंबे समय तक तेल और रिफाइंड फ्यूल की कीमत ऊंची रहने पर इन अर्थव्यवस्थाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है।
एनर्जी एनालिस्ट नील एटकिंसन के मुताबिक, रिफाइंड ऑयल प्रोडक्ट्स की सप्लाई सीमित होने के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। उनके अनुसार, समस्या सिर्फ ऊंची कीमतों की नहीं है, बल्कि फिजिकल स्टॉक में कमी भी चिंता बढ़ा रही है।
आगे क्या होगा?
अमेरिका में डीजल की कीमत का 5.85 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंचना ग्लोबल एनर्जी मार्केट में बढ़ते तनाव का संकेत है। अगर मिडिल ईस्ट में संघर्ष लंबा चलता है और तेल की सप्लाई बाधित रहती है, तो कच्चे तेल से लेकर पेट्रोल और डीजल तक की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
इसका असर धीरे-धीरे ट्रांसपोर्टेशन, लॉजिस्टिक्स, खेती, खाद्य पदार्थों और दूसरी रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
यानी अमेरिका में बढ़ता डीजल सिर्फ पेट्रोल पंप की समस्या नहीं है। यह पूरी सप्लाई चेन के लिए चुनौती बन सकता है और लंबे समय तक महंगा ईंधन रहने पर इसका असर दुनिया के दूसरे देशों तक भी पहुंच सकता है।


