Crude Oil Price Forecast: कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ समय से जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है। ईरान के साथ बढ़े तनाव के बीच इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। इस तेजी का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर भी पड़ रहा है। हालांकि, अब अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर ऐसा अनुमान जताया है, जिससे भारत समेत दुनियाभर के देशों को राहत मिल सकती है।
$40 तक आ सकता है कच्चा तेल
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अगर ईरान के साथ मौजूदा टकराव खत्म होता है, तो ग्लोबल ऑयल मार्केट में सप्लाई तेजी से बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, बेसेंट ने एक इंटरव्यू में कहा कि ईरान के साथ टकराव खत्म होने के बाद बाजार में बड़ी मात्रा में तेल उपलब्ध हो सकता है। उनका अनुमान है कि ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर या यहां तक कि 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अमेरिका के वित्त मंत्री का अनुमान है, कोई आधिकारिक मूल्य लक्ष्य नहीं। तेल की वास्तविक कीमत आगे भू-राजनीतिक घटनाक्रम, उत्पादन और वैश्विक मांग समेत कई कारकों पर निर्भर करेगी।
अभी 96 डॉलर के करीब है ब्रेंट क्रूड
ईरान के साथ बढ़े तनाव के कारण हाल में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। शुक्रवार को इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 96.28 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ।
संघर्ष बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब तक पहुंच गई थी। वहीं, इस सप्ताह ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जो जुलाई के बाद का ऊंचा स्तर बताया जा रहा है।
तेल की बढ़ती कीमतों ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के सामने महंगाई का खतरा भी बढ़ा दिया है। खासतौर पर उन देशों के लिए चिंता ज्यादा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करते हैं।
महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत पर पड़ सकता है। इसका असर धीरे-धीरे दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि तेल की तेजी के बीच दुनिया के कई हिस्सों में महंगाई को लेकर चिंता बढ़ी है। बॉन्ड यील्ड में भी हाल में उछाल देखने को मिला है।
बेसेंट ने कहा कि ब्याज दरों और तेल की कीमतों के बीच संबंध इस समय काफी मजबूत दिखाई दे रहा है। उनका मानना है कि अगर ईरान के साथ टकराव समाप्त होता है और तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तो इससे महंगाई और ब्याज दरों दोनों पर दबाव कम हो सकता है।
भारत को क्यों होगा सबसे ज्यादा फायदा?
कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट भारत के लिए काफी राहत भरी खबर साबित हो सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की आयात पर निर्भरता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में इंटरनेशनल मार्केट में तेल जितना महंगा होता है, भारत का इंपोर्ट बिल उतना ही बढ़ता है।
हाल में भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत भी 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थी। इससे देश के लिए कच्चे तेल का आयात महंगा हुआ है।
जुलाई में 41% बढ़ गया भारत का ऑयल इंपोर्ट बिल
महंगे कच्चे तेल का असर भारत के आयात बिल पर भी देखने को मिला है। जुलाई में देश का कच्चे तेल का आयात बिल 41 फीसदी बढ़कर 13.7 अरब डॉलर पहुंच गया।
अगर आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमत 40-50 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आती है, तो भारत को कई मोर्चों पर फायदा मिल सकता है।
भारत को मिल सकते हैं ये फायदे
- कच्चे तेल का आयात बिल घट सकता है।
- चालू खाते के घाटे पर दबाव कम हो सकता है।
- रुपये को सपोर्ट मिल सकता है।
- महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
- सरकार के वित्तीय प्रबंधन को राहत मिल सकती है।
- तेल की कम लागत से कंपनियों के मार्जिन में सुधार हो सकता है।
क्या पेट्रोल-डीजल भी सस्ता होगा?
अगर इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल लंबे समय तक 40-50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, कच्चे तेल की कीमत और घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम के बीच सीधा और तत्काल संबंध नहीं होता। टैक्स, रिफाइनिंग लागत, रुपये की विनिमय दर और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की कीमत निर्धारण नीति जैसे कई कारक घरेलू कीमतों को प्रभावित करते हैं।
इसलिए कच्चा तेल 40 डॉलर तक आने की स्थिति में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उसी अनुपात में गिरावट जरूरी नहीं है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल ईरान संकट पर
कच्चे तेल की कीमतों में आगे क्या रुख रहेगा, इसका बड़ा हिस्सा ईरान के साथ जारी टकराव और ग्लोबल सप्लाई की स्थिति पर निर्भर करेगा।
अगर तनाव जल्दी खत्म होता है और बाजार में ईरान समेत अन्य स्रोतों से तेल की सप्लाई बढ़ती है, तो कीमतों में तेज गिरावट संभव है। दूसरी तरफ, संघर्ष लंबा खिंचता है या तेल सप्लाई में और व्यवधान आता है, तो कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
ऐसे में $40 का अनुमान भारत के लिए बेहद राहत भरा जरूर है, लेकिन फिलहाल इसे संभावित परिदृश्य के तौर पर ही देखना चाहिए।


