भारत का रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ा है, लेकिन हथियारों के ग्लोबल एक्सपोर्ट में देश अभी काफी पीछे है। सरकार ने 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये सालाना डिफेंस एक्सपोर्ट का लक्ष्य रखा है। सवाल यह है कि क्या भारत इस लक्ष्य के साथ दुनिया के बड़े हथियार निर्यातकों की कतार में अपनी जगह बना पाएगा?
नई दिल्ली: दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों और तेजी से हो रहे सैन्य आधुनिकीकरण ने डिफेंस इंडस्ट्री के लिए बड़े अवसर पैदा किए हैं। कई देश अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने के लिए रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं। इसका सीधा फायदा हथियार, मिसाइल, ड्रोन, एयरक्राफ्ट, रडार और दूसरे सैन्य उपकरण बनाने वाली कंपनियों को मिल रहा है।
भारत के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने रक्षा उत्पादन और निर्यात को बढ़ाने पर खास जोर दिया है। हालांकि, उत्पादन में तेजी आने के बावजूद ग्लोबल डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी अभी बेहद कम है। स्थिति यह है कि हथियारों के निर्यात में भारत पाकिस्तान से भी पीछे है।
भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट 38,424 करोड़ रुपये पहुंचा
भारत के रक्षा निर्यात में पिछले एक दशक में तेज वृद्धि देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2013-14 में देश का डिफेंस एक्सपोर्ट सिर्फ 686 करोड़ रुपये था। यह बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया।
वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 17,353 करोड़ रुपये, यानी 45.16 फीसदी रही। वहीं रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों यानी डिफेंस PSUs का योगदान 21,071 करोड़ रुपये, यानी 54.84 फीसदी रहा।
सरकार का लक्ष्य अब इससे काफी आगे जाने का है। सरकार ने 2029 तक सालाना 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है।
यानी मौजूदा निर्यात को अगले कुछ वर्षों में काफी तेजी से बढ़ाना होगा।
डिफेंस एक्सपोर्ट में पाकिस्तान भारत से आगे

भारत के लिए सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बात यह है कि ग्लोबल हथियार निर्यात के मामले में पाकिस्तान भी उससे आगे है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक डिफेंस एक्सपोर्ट में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 0.4 फीसदी है और वह हथियार निर्यात करने वाले देशों की सूची में 21वें स्थान पर है। वहीं भारत की हिस्सेदारी लगभग 0.2 फीसदी है और वह 27वें स्थान पर है।
पाकिस्तान ने पिछले साल करीब 10 अरब डॉलर की डिफेंस एक्सपोर्ट डील भी हासिल की, जो उसके इतिहास में सबसे बड़ी डिफेंस एक्सपोर्ट डील बताई गई है।
भारत के लिए यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का रक्षा उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और घरेलू स्तर पर हथियारों की डिजाइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके बावजूद ग्लोबल एक्सपोर्ट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी अभी छोटी है।
अमेरिका सबसे बड़ा हथियार निर्यातक

दुनिया के डिफेंस एक्सपोर्ट मार्केट में अमेरिका का दबदबा बरकरार है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ग्लोबल हथियार निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी है।
इसके बाद फ्रांस लगभग 10 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है। इजरायल की हिस्सेदारी 7.8 फीसदी, दक्षिण कोरिया की 6 फीसदी, रूस की 5.8 फीसदी, इटली की 5.7 फीसदी और जर्मनी की 5.1 फीसदी है।
चीन की हिस्सेदारी करीब 2.6 फीसदी है, जबकि ब्रिटेन की 2.1 फीसदी और नीदरलैंड्स की करीब 1.8 फीसदी है।
तुर्की भी तेजी से उभरता हुआ हथियार निर्यातक है। उसकी हिस्सेदारी करीब 1.6 फीसदी बताई गई है।
इसके अलावा नॉर्वे, स्पेन, कनाडा, स्वीडन, डेनमार्क, ब्राजील, चेक गणराज्य, रोमानिया, स्विट्जरलैंड, यूक्रेन, दक्षिण अफ्रीका, फिनलैंड, ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम जैसे देश भी भारत से आगे हैं।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक
भारत की चुनौती का दूसरा पहलू यह है कि देश अभी भी दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदारों में शामिल है।
2021 से 2025 के बीच वैश्विक हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 8.2 फीसदी रही। इस अवधि में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा।
रूस के साथ युद्ध के कारण यूक्रेन इस सूची में पहले स्थान पर रहा। भारत के अलावा कतर, सऊदी अरब और जापान भी बड़े हथियार खरीदारों में शामिल हैं।
यही वह जगह है जहां भारत के लिए बड़ा अवसर छिपा है। अगर देश अपनी हथियार जरूरतों का बड़ा हिस्सा घरेलू कंपनियों से पूरा करने के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी अपने उत्पाद बेचने में सफल होता है, तो वह आयातक से बड़ा निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
डिफेंस कंपनियों में बढ़ रहा प्राइवेट सेक्टर का रोल
भारत में लंबे समय तक रक्षा उत्पादन पर सरकारी कंपनियों का दबदबा रहा। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, भारत डायनामिक्स और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स जैसी सरकारी कंपनियां देश के प्रमुख डिफेंस सप्लायर्स में शामिल हैं।
अब निजी क्षेत्र की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है।
टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी प्रिसिजन इंजीनियरिंग एंड सिस्टम्स, महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स और अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियां रक्षा क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही हैं।
यह बदलाव भारत के लिए अहम है क्योंकि ग्लोबल डिफेंस मार्केट में प्रतिस्पर्धा सिर्फ बड़े सरकारी संस्थानों के बीच नहीं है। आधुनिक हथियारों के विकास में निजी कंपनियां, स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी कंपनियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
FDI नियमों में ढील से मिल सकता है फायदा
सरकार रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश यानी FDI को और आसान बनाने पर भी विचार कर रही है। मौजूदा नियमों के तहत रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी तक FDI ऑटोमैटिक रूट से आने की अनुमति है।
74 फीसदी से अधिक विदेशी निवेश के लिए सरकारी मंजूरी की जरूरत होती है। ऐसे निवेश को आमतौर पर आधुनिक तकनीक और दूसरे रणनीतिक फायदे के आधार पर देखा जाता है।
अगर FDI नियमों में और बदलाव किए जाते हैं, तो इससे भारत में विदेशी डिफेंस कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप बढ़ सकती है। इससे घरेलू कंपनियों को ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ने का मौका भी मिल सकता है।
हालांकि, केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना ही पर्याप्त नहीं होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि निवेश के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू कंपोनेंट सप्लाई चेन भी मजबूत हो।
भारत में लोकल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
सरकार पिछले कुछ वर्षों से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए लगातार कदम उठा रही है।
एक हालिया सरकारी नोट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों ने स्थानीय सप्लायर्स से 15,700 से ज्यादा आइटम खरीदे। इससे घरेलू वेंडर्स के लिए करीब 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार पैदा हुआ।
इस तरह की खरीद से छोटे और मझोले मैन्युफैक्चरर्स को रक्षा सप्लाई चेन में शामिल होने का मौका मिलता है। लंबे समय में यही कंपनियां ग्लोबल डिफेंस कंपनियों की सप्लायर बन सकती हैं।
चीन से भारत को क्या सीखना होगा?
डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक चीन है। चीन ने घरेलू रक्षा उत्पादन और डिजाइन क्षमता को बड़े स्तर पर विकसित किया है।
एक अनुमान के मुताबिक, चीन अपनी रक्षा उत्पादन जरूरतों का करीब 92 फीसदी हिस्सा स्थानीय सोर्सिंग से पूरा करता है। रूस में यह आंकड़ा करीब 70 फीसदी और अमेरिका में लगभग 69 फीसदी बताया गया है।
भारत का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये रहा। यह देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए सिर्फ उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।
भारत को डिजाइन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, इंजन टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, एवियोनिक्स और हाई-एंड कंपोनेंट्स में भी अपनी क्षमता मजबूत करनी होगी।
ग्लोबल डिफेंस कंपनियों से मुकाबला आसान नहीं
दुनिया के रक्षा बाजार में पहले से ही कई बड़ी कंपनियों का दबदबा है। अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन, यूरोप का थेल्स और राइनमेटल, इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स और दक्षिण कोरिया की हान्वा एयरोस्पेस जैसी कंपनियां अलग-अलग सेगमेंट में मजबूत स्थिति रखती हैं।
भारत को इन कंपनियों से मुकाबला करने के लिए केवल कम कीमत वाले हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय क्वालिटी, टेक्नोलॉजी, भरोसेमंद सप्लाई और समय पर डिलीवरी पर भी ध्यान देना होगा।
50,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य कितना मुश्किल?
भारत का 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये के सालाना डिफेंस एक्सपोर्ट का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। मौजूदा स्तर से वहां पहुंचने के लिए निर्यात में लगातार तेज वृद्धि करनी होगी।
लेकिन भारत के पास कुछ मजबूत फायदे भी हैं। देश के पास बड़ा घरेलू रक्षा बाजार, इंजीनियरिंग टैलेंट, तेजी से बढ़ता निजी सेक्टर, मजबूत आईटी क्षमता और कई मित्र देशों के साथ रणनीतिक संबंध हैं।
अगर भारत घरेलू उत्पादन के साथ-साथ डिजाइन और टेक्नोलॉजी क्षमता को मजबूत करता है, तो आने वाले वर्षों में डिफेंस एक्सपोर्ट में बड़ा उछाल संभव है।
सिर्फ हथियार बनाना नहीं, ग्लोबल ब्रांड बनना होगा
भारत के सामने असली चुनौती केवल 50,000 करोड़ रुपये का एक्सपोर्ट लक्ष्य हासिल करना नहीं है। बड़ी चुनौती यह है कि भारतीय डिफेंस कंपनियां वैश्विक बाजार में भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी ब्रांड बनें।
इसके लिए सरकार को R&D, निजी निवेश, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, स्टार्टअप्स, घरेलू कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सपोर्ट पर लगातार काम करना होगा।
भारत ने डिफेंस प्रोडक्शन में लंबी छलांग लगाई है, लेकिन ग्लोबल हथियार निर्यात की दौड़ में अभी काफी दूरी तय करनी बाकी है। अगर सरकार और इंडस्ट्री मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो भारत आने वाले वर्षों में एक बड़े डिफेंस एक्सपोर्टर के रूप में उभर सकता है।


