जापान में करीब 2,000 बुजुर्गों पर हुई लंबी अवधि की रिसर्च में पाया गया कि जो लोग अपनी लंबी उम्र को लेकर ज्यादा आशावादी थे, वे अक्सर वास्तव में भी ज्यादा समय तक जीवित रहे। हालांकि, 59% प्रतिभागी अपनी बताई हुई अनुमानित उम्र से आगे तक जिए।
नई दिल्ली: अगर आपसे पूछा जाए कि आप कितने साल तक जिएंगे, तो शायद आप भी कोई अनुमानित उम्र बता देंगे। लेकिन क्या किसी व्यक्ति का अपनी संभावित उम्र को लेकर लगाया गया अनुमान उसकी वास्तविक जीवन अवधि से जुड़ा हो सकता है? जापान में बुजुर्गों पर हुई एक नई रिसर्च ने इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है।
अध्ययन में शोधकर्ताओं को एक दिलचस्प संबंध मिला। जिन लोगों को लगता था कि वे लंबी उम्र तक जीवित रहेंगे, उनमें वास्तव में ज्यादा समय तक जीवित रहने की संभावना भी देखी गई। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी मौत की सही उम्र पहले से जान सकता है। रिसर्च सिर्फ अनुमान और वास्तविक जीवन अवधि के बीच संबंध की ओर इशारा करती है।
करीब 2 हजार लोगों पर 28 साल तक हुई निगरानी
इस अध्ययन में जापान के 2,000 से ज्यादा बुजुर्ग लोगों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों से उनकी संभावित जीवन अवधि के बारे में अनुमान लिया और फिर लंबे समय तक उनके जीवन से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया।
रिसर्च में शामिल 2,054 लोगों में से 1,514 प्रतिभागियों की अध्ययन अवधि के दौरान मृत्यु हुई। शोधकर्ताओं ने आधिकारिक रिकॉर्ड और परिवारों से प्राप्त जानकारी के आधार पर मौत की तारीखों की पुष्टि की।
प्रतिभागियों की जानकारी पर करीब 28 साल तक नजर रखी गई, जिससे शोधकर्ताओं को लोगों के अनुमान और उनकी वास्तविक जीवन अवधि की तुलना करने का मौका मिला।
यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ त्सुकुबा के नेतृत्व में किया गया है और इसे medRxiv पर प्रीप्रिंट के रूप में प्रकाशित किया गया है। चूंकि यह प्रीप्रिंट है, इसलिए इसे अभी स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा यानी peer review से गुजरना बाकी है।
लंबी उम्र की उम्मीद रखने वालों में दिखा अलग पैटर्न
रिसर्च का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि जिन प्रतिभागियों को लगता था कि वे लंबे समय तक जीवित रहेंगे, उनमें वास्तव में भी लंबी उम्र तक जीने की प्रवृत्ति ज्यादा दिखाई दी।
शोधकर्ताओं ने उम्र, लिंग, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति जैसे कई कारकों को ध्यान में रखकर इस संबंध का अध्ययन किया। इन कारकों को शामिल करने के बाद भी अनुमानित जीवन अवधि और वास्तविक जीवन अवधि के बीच संबंध देखने को मिला।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। यह संबंध कारण और परिणाम साबित नहीं करता। यानी सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति लंबी उम्र की उम्मीद करता है, यह जरूरी नहीं कि उसकी यही सोच उसकी उम्र बढ़ा दे।
59% लोग अपनी बताई उम्र से आगे तक जिए
अध्ययन का एक और दिलचस्प आंकड़ा सामने आया। करीब 59% प्रतिभागी उस उम्र से आगे तक जीवित रहे, जितनी उम्र उन्होंने अपने लिए अनुमानित की थी।
इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी संभावित जीवन अवधि को कम आंका था।
महिलाओं में अपने अनुमान से आगे तक जीवित रहने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक देखी गई। वहीं खराब स्वास्थ्य वाले लोगों में ऐसा पैटर्न कम स्पष्ट था। अधिक शिक्षा प्राप्त प्रतिभागियों में भी अपनी अनुमानित उम्र से आगे तक जीने की प्रवृत्ति देखने को मिली।
इन निष्कर्षों से पता चलता है कि लोग अपनी संभावित उम्र का अनुमान लगाते समय केवल स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को भी ध्यान में रख सकते हैं।
80 साल क्यों था इतना आम अनुमान?
शोधकर्ताओं ने एक और दिलचस्प पैटर्न देखा। कई प्रतिभागियों ने अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियों का विस्तृत आकलन करके उम्र बताने के बजाय 80 साल जैसी एक सामान्य और परिचित उम्र को जवाब के रूप में चुना।
ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लोग अपनी संभावित उम्र के बारे में सोचते समय समाज में प्रचलित औसत या सामान्य जीवन प्रत्याशा को एक मानसिक संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
इससे यह भी संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति से उसकी अनुमानित उम्र पूछना हमेशा उसकी वास्तविक व्यक्तिगत भविष्यवाणी को नहीं दर्शाता।
जापान में पहले से ज्यादा है जीवन प्रत्याशा
जापान लंबे समय से दुनिया के उन देशों में शामिल रहा है जहां लोगों की जीवन प्रत्याशा काफी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2024 में जापानी पुरुषों की जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा करीब 81.1 साल और महिलाओं की 87.1 साल थी।
65 साल की उम्र तक पहुंचने के बाद भी जापान में लोगों के औसतन कई वर्ष और जीने की उम्मीद रहती है। इसी वजह से जापान जैसे देश में बुजुर्गों की जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य और भविष्य की योजना से जुड़े अध्ययन खास महत्व रखते हैं।
आपकी सोच आपकी आर्थिक प्लानिंग को भी प्रभावित कर सकती है
किसी व्यक्ति को लगता है कि वह कितने साल तक जीवित रहेगा, इसका असर सिर्फ मानसिक सोच तक सीमित नहीं हो सकता। यह उसके रिटायरमेंट और वित्तीय फैसलों से भी जुड़ा हो सकता है।
मसलन, अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसे 90 साल या उससे अधिक उम्र तक जीवन जीना है, तो वह रिटायरमेंट के बाद के खर्चों के लिए ज्यादा बचत करने की कोशिश कर सकता है। दूसरी ओर, कम उम्र तक जीने की उम्मीद रखने वाला व्यक्ति अपनी बचत और रिटायरमेंट प्लान को अलग तरीके से देख सकता है।
इसी तरह पेंशन, निवेश, बीमा और रिटायरमेंट की उम्र तय करने जैसे फैसलों में भी भविष्य की अनुमानित उम्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
तो क्या अपनी मौत की उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है?
नहीं। इस रिसर्च का यह दावा नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी मौत की सही उम्र बता सकता है।
अध्ययन में सिर्फ यह देखा गया कि किसी व्यक्ति द्वारा अनुमानित जीवन अवधि और उसकी वास्तविक जीवन अवधि के बीच कोई सांख्यिकीय संबंध मौजूद है या नहीं। स्वास्थ्य, जीवनशैली, आनुवंशिकता, सामाजिक परिस्थितियां और कई अन्य कारक किसी व्यक्ति की जीवन अवधि को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए अगर कोई व्यक्ति कहता है कि वह 85 या 90 साल तक जिएगा, तो इसे उसकी वास्तविक जीवन अवधि की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।
रिसर्च का असली संदेश क्या है?
इस अध्ययन की अहमियत इस बात में है कि लोग अपनी संभावित उम्र के बारे में कैसे सोचते हैं और यह सोच उनके भविष्य के फैसलों से कैसे जुड़ सकती है, इसे समझने में मदद मिलती है।
59% लोगों का अपने अनुमान से आगे तक जीवित रहना यह भी दिखाता है कि इंसान अपनी संभावित जीवन अवधि को लेकर अक्सर सटीक अनुमान नहीं लगा पाता। इसलिए रिटायरमेंट और वित्तीय योजना बनाते समय सिर्फ अपनी अनुमानित उम्र पर निर्भर रहने के बजाय लंबी अवधि को ध्यान में रखना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।


