Trump Tariffs on India: रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ा एक अहम अमेरिकी बिल फिलहाल सीनेट में अटकता नजर आ रहा है। अगर यह बिल आगे बढ़ता, तो रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताकत बढ़ सकती थी। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका थी।
नई दिल्ली: भारत के लिए रूस से तेल खरीदने और अमेरिका के संभावित 100 फीसदी टैरिफ को लेकर फिलहाल राहत की खबर सामने आई है। रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा एक विधेयक अमेरिकी सीनेट में राजनीतिक विरोध और कारोबारी समूहों की चिंताओं के बीच अटकता दिखाई दे रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, इसके नवंबर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनाव तक आगे बढ़ने की संभावना कम हो सकती है।
यह वही बिल है, जिसे रूस पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इसके प्रावधान लागू होने पर अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े खरीदारों के साथ-साथ रूस को ऊर्जा प्रतिबंधों से बचाने में मदद करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की अतिरिक्त शक्ति मिल सकती थी।
भारत और चीन पर मंडरा रहा था 100% टैरिफ का खतरा
रूस के ऊर्जा उत्पादों के बड़े खरीदारों में भारत, चीन और तुर्की शामिल हैं। ऐसे में इस विधेयक को लेकर भारत की चिंता स्वाभाविक थी। अगर ट्रंप प्रशासन इस अधिकार का इस्तेमाल करता, तो रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाए जाने का खतरा पैदा हो सकता था।
भारत के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों में कच्चे तेल का बड़ा योगदान है। रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के लिए अहम स्रोत बना हुआ है।
सीनेट में बढ़ रहा बिल का विरोध
रूस पर प्रतिबंध से जुड़े इस प्रस्ताव को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भारी बहुमत के साथ मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि, अब सीनेट में इसे लेकर अलग-अलग स्तर पर विरोध और चिंता सामने आ रही है।
इस विरोध को अमेरिकी रिटेल इंडस्ट्री और प्रभावशाली कारोबारी संगठन यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन समूहों को आशंका है कि कानून के जरिए राष्ट्रपति को बड़े पैमाने पर नए टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जिसका असर अमेरिकी कारोबार और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि विधेयक का भविष्य अब उतना आसान नहीं दिख रहा, जितना प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलने के बाद माना जा रहा था।
लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था प्रस्ताव
इस विधेयक को दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था। ग्राहम यूक्रेन के मुखर समर्थक रहे थे और रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के पक्ष में थे।
प्रस्ताव का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को सीमित करना और यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के बीच मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाना था। बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों तथा रूस को प्रतिबंधों से बचाने में मदद करने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है।
हालांकि, अब अमेरिकी राजनीति में इसे लेकर मतभेद बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
जयशंकर ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर क्या कहा?
इस बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की ऊर्जा जरूरतों पर भारत का रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि किसी संघर्ष का समाधान केवल इस बात से नहीं होगा कि कौन सा देश रूसी तेल, खनिज, धातु या अन्य सामान खरीद रहा है।
जयशंकर के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत की ऊर्जा जरूरतों और उसके दृष्टिकोण को भी समझने की आवश्यकता है।
क्या भारत रूसी तेल की खरीद कम करेगा?
भारत पर अगर रूसी तेल खरीदने को लेकर अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई दिल्ली रूस से आयात कम करेगी।
जयशंकर ने इस सवाल के जवाब में भारत की विशाल आबादी और ऊर्जा जरूरतों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि करीब 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
उन्होंने यह भी कहा कि यूक्रेन के अपने दृष्टिकोण का भारत सम्मान करता है, लेकिन भारत के अपने हित और परिस्थितियां भी हैं और दूसरे देशों को उनका सम्मान करना चाहिए।
भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की बड़ी हिस्सेदारी
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 134.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया। इसमें रूस की हिस्सेदारी लगभग 30.3 फीसदी रही। इस अवधि में भारत ने रूस से करीब 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा।
रिसर्च संस्था के अनुसार, रूस से अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिलने वाले कच्चे तेल ने भारत को अपने आयात बिल को नियंत्रित करने में मदद की है। इसके अलावा इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई और घरेलू महंगाई पर भी दबाव कम रखने में मदद मिली।
सस्ते रूसी तेल को लेकर GTRI की राय
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव पहले ही कह चुके हैं कि भारत को केवल टैरिफ की धमकियों के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव नहीं करना चाहिए।
उनके मुताबिक, जब तक रूसी कच्चा तेल प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध है, भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए खरीद जारी रखने पर विचार करना चाहिए। साथ ही अमेरिका के साथ मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने वाला यह विधेयक अमेरिकी सीनेट में आगे बढ़ता है या नहीं। अगर यह नवंबर के मिड-टर्म चुनाव तक अटका रहता है, तो भारत और चीन जैसे देशों को तत्काल 100 फीसदी टैरिफ के संभावित खतरे से कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि खतरा पूरी तरह खत्म हो गया है। अमेरिकी प्रशासन के पास व्यापार और प्रतिबंधों से जुड़े दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। इसलिए भारत के लिए आने वाले महीनों में ऊर्जा सुरक्षा, रूस से तेल आयात और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध तीनों मोर्चों पर संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
रूस पर नए प्रतिबंधों और 100 फीसदी टैरिफ की आशंका ने भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ा दी थी। लेकिन अमेरिकी सीनेट में बिल के फिलहाल अटकने से नई दिल्ली को कुछ राहत जरूर मिली है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि अमेरिकी मिड-टर्म चुनाव के बाद इस प्रस्ताव का भविष्य क्या होता है और ट्रंप प्रशासन रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ किस तरह की रणनीति अपनाता है।


