Yashwant Varma Cash Row: पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में अधजली करेंसी मिलने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को संसद के दोनों सदनों में पेश की गई। समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध माना है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा देने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद की कार्रवाई खत्म हो गई है, या अब भी उनके खिलाफ कोई कदम उठाया जा सकता है?
रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली कथित नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और मालिकाना हक के बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। जांच समिति ने उनके जवाब को टालमटोल वाला और असंतोषजनक बताया। इसके अलावा, समिति ने घटनास्थल पर महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखे जाने को भी गंभीर माना।
क्या इस्तीफे के बाद भी संसद की कार्रवाई जारी रह सकती है?
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है। सामान्य तौर पर किसी जज के पद से इस्तीफा देने के बाद उसे पद से हटाने की प्रक्रिया का व्यावहारिक उद्देश्य समाप्त हो जाता है। लेकिन जस्टिस वर्मा के मामले में स्थिति इसलिए अलग बताई जा रही है क्योंकि उनके खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव उनके इस्तीफे से पहले ही स्वीकार किया जा चुका था।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, एक केंद्रीय मंत्री ने संकेत दिया है कि इस्तीफा संसदीय कार्यवाही को अपने आप समाप्त नहीं करता। अब संसद को जांच समिति की रिपोर्ट पर विचार करना होगा। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ सकता है कि जस्टिस वर्मा के पेंशन, रिटायरमेंट लाभ और अन्य सुविधाओं को लेकर क्या फैसला किया जाए।
हालांकि, इस मामले में अंतिम कार्रवाई संसद की प्रक्रिया और लागू संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इस्तीफा देने के बाद जस्टिस वर्मा पूरी तरह से सभी संभावित संसदीय परिणामों से बाहर हो गए हैं।
14 मार्च 2025 को क्या हुआ था?
मामले की शुरुआत 14 मार्च 2025 की रात हुई थी। उस समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। उनके सरकारी आवास में आग लगने के बाद दमकलकर्मी आग बुझाने पहुंचे। इसी दौरान आवास के एक स्टोर रूम में कथित तौर पर अधजली नोटों की गड्डियां मिलने की बात सामने आई।
घटना के बाद इस मामले ने न्यायपालिका के भीतर और राजनीतिक स्तर पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जांच के लिए समिति गठित की। इस जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि जिस स्टोर रूम में कथित तौर पर नकदी मिली थी, उस पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या मौन नियंत्रण था।
इसके बाद जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट तबादला कर दिया गया। हालांकि, उन्हें न्यायिक काम नहीं सौंपा गया।
संसद तक कैसे पहुंचा मामला?
मामला आगे बढ़ने के बाद जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग संसद में उठी। 21 जुलाई 2025 को लोकसभा के 146 सांसदों ने उनके खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया।
इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को प्रस्ताव स्वीकार किया। जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई।
इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। समिति में बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच के दौरान ही जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दे दिया। इसके बावजूद जांच समिति ने अपनी प्रक्रिया जारी रखी और 18 मई 2026 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंप दी।
करीब 17 महीने पुराने इस मामले की रिपोर्ट अब 12 अगस्त 2026 को संसद में पेश की गई है।
जांच समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ क्या पाया?
समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन प्रमुख आरोपों की जांच की और तीनों को सिद्ध माना।
1. सरकारी आवास में कथित नकदी की मौजूदगी
पहला आरोप उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में कथित तौर पर अधजले ₹500 के नोट मिलने से जुड़ा था।
समिति के अनुसार, जस्टिस वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और उसके मालिकाना हक के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। समिति ने उपलब्ध आधिकारिक गवाहों के बयान और अन्य पुष्टिकारक सामग्री के आधार पर उनके स्पष्टीकरण को असंतोषजनक माना।
2. महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखा गया
दूसरा आरोप आग लगने के बाद घटनास्थल पर मौजूद महत्वपूर्ण सामग्री और कथित नकदी से जुड़े साक्ष्यों को पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रखने से संबंधित था।
समिति ने माना कि स्टोर रूम को कानूनी तरीके से सील करने और उसका निरीक्षण करने से पहले वहां मौजूद साक्ष्यों की स्थिति में बदलाव हुआ। बाद में कथित करेंसी भी उपलब्ध नहीं रही।
समिति के निष्कर्ष के मुताबिक, इस आरोप को साबित करने के लिए यह जरूरी नहीं था कि नकदी खुद जस्टिस वर्मा ने हटाई थी। साक्ष्यों के संरक्षण में हुई स्थिति भी जांच का हिस्सा थी।
3. जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण असंतोषजनक
तीसरा आरोप उनके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से संबंधित था। समिति ने उनके जवाबों को टालमटोल वाला और असंतोषजनक माना।
जांच समिति के अनुसार, उनके जवाब कथित नकदी की मौजूदगी और बाद में उसके उपलब्ध नहीं रहने की स्थिति को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं कर सके। इसी आधार पर समिति ने तीसरे आरोप को भी सिद्ध माना।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने क्या सफाई दी थी?
जस्टिस वर्मा ने कथित नकदी के बारे में जानकारी होने से इनकार किया था। तत्कालीन CJI संजीव खन्ना को दिए जवाब में उन्होंने कहा था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि आउटहाउस के स्टोर रूम में कोई पैसा रखा गया था।
उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें या उनके परिवार के किसी सदस्य को कथित नकदी के बारे में जानकारी नहीं थी। परिसर से करेंसी हटाए जाने के आरोपों से भी उन्होंने इनकार किया था।
जस्टिस वर्मा ने कथित नकदी की बरामदगी के तरीके पर भी सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि आग बुझाने के लिए पहुंचे पुलिस और दमकल अधिकारियों ने करेंसी को औपचारिक रूप से जब्त नहीं किया, कोई जब्ती मेमो तैयार नहीं किया और नकदी की सूची भी नहीं बनाई।
हालांकि, जांच समिति ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और तीनों आरोपों को सिद्ध माना।
इस्तीफे की वजह से महाभियोग प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा?
जस्टिस वर्मा ने संसद द्वारा हटाए जाने की आशंका के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से इस्तीफा दिया था। इससे उन्हें पद से हटाने वाली महाभियोग प्रक्रिया का स्वरूप जटिल हो गया।
जजों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया के जानकारों के अनुसार, किसी जज के इस्तीफे के मामले में राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने और उसकी सार्वजनिक जानकारी होने के बाद इसे प्रभावी माना जा सकता है। राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति और कानून मंत्रालय के न्याय विभाग की अधिसूचना प्रक्रिया का हिस्सा होती है।
इसी वजह से जस्टिस वर्मा के इस्तीफे को लेकर यह सवाल भी बना हुआ है कि संसदीय प्रक्रिया के बीच दिए गए इस्तीफे का उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई पर अंतिम कानूनी प्रभाव क्या होगा।
अब संसद में क्या हो सकता है?
जांच समिति की रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण संसद की कार्रवाई है। रिपोर्ट में आरोप सिद्ध पाए जाने के बाद सांसद इस पर विचार कर सकते हैं और लागू नियमों के तहत आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों से जुड़ा है। यदि संसद या संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया में उनके आचरण पर कोई प्रतिकूल निर्णय लिया जाता है, तो यह उनके भविष्य के लाभों पर असर डाल सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इस मामले में आगे की प्रक्रिया पर विचार कर सकती है। हालांकि, अंतिम निर्णय क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
क्या इस्तीफा देकर जस्टिस वर्मा पूरी तरह बच गए?
सीधे शब्दों में कहें तो अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
इस्तीफा देने से जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया पर व्यावहारिक असर जरूर पड़ा है, लेकिन उनके खिलाफ संसदीय जांच पहले ही शुरू हो चुकी थी और जांच समिति ने बाद में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी। अब यह रिपोर्ट संसद के सामने है।
इसलिए मामला केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि उन्हें जज के पद से हटाया जाएगा या नहीं। अब उनके आचरण, संसदीय रिकॉर्ड और संभावित रिटायरमेंट लाभों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
यही वजह है कि इस्तीफा इस मामले का अंतिम अध्याय नहीं माना जा रहा है। संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संसद और सरकार इस रिपोर्ट को किस तरह आगे बढ़ाते हैं और संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया के तहत क्या फैसला लिया जाता है।
निष्कर्ष
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा कैश विवाद भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही और जजों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। एक ओर जांच समिति ने तीनों आरोपों को सिद्ध माना है, वहीं दूसरी ओर जस्टिस वर्मा ने कथित नकदी से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया था।
अब जब जांच रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश हो चुकी है, तो आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद इस रिपोर्ट पर क्या रुख अपनाती है और जस्टिस वर्मा के इस्तीफे का उनके खिलाफ चल रही संसदीय प्रक्रिया तथा रिटायरमेंट लाभों पर क्या अंतिम प्रभाव पड़ता है।
अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि इस्तीफा देने के बावजूद जस्टिस वर्मा का मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।


