**Netaji Subhas Chandra Bose Ashes: देश की आजादी के 80 साल पूरे होने के करीब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। उनकी बेटी अनीता बोस फाफ ने जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में रखे बताए जाने वाले उनके अवशेषों को भारत लाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। **
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु और उनके अवशेषों को लेकर करीब आठ दशक से बहस चली आ रही है। एक तरफ भारत सरकार के आधिकारिक रुख में 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए विमान हादसे को नेताजी की मृत्यु का कारण माना गया है, वहीं दूसरी तरफ उनकी मौत की परिस्थितियों और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों की पहचान को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 11 अगस्त को नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में रखे नेताजी के बताए जाने वाले अवशेषों को भारत वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने केंद्र सरकार, विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय से जवाब मांगा है।
यानी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया है कि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां निश्चित रूप से नेताजी की ही हैं। अदालत ने सरकार का पक्ष जानने के लिए नोटिस जारी किया है।
नेताजी की अस्थियां जापान कैसे पहुंचीं?
नेताजी की मृत्यु को लेकर सबसे ज्यादा स्वीकार किया जाने वाला आधिकारिक घटनाक्रम 18 अगस्त 1945 के विमान हादसे से जुड़ा है।
सरकारी रिकॉर्ड और जांच समितियों के निष्कर्षों के अनुसार, नेताजी ताइवान में विमान दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए थे। इसके बाद उनकी मृत्यु होने की बात कही गई। बाद में उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया और कथित तौर पर उनकी अस्थियां जापान लाई गईं।
इसके बाद इन अवशेषों को टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखा गया। भारतीय विदेश मंत्रालय के 2015 के एक RTI जवाब में शाहनवाज खान समिति, जीडी खोसला आयोग और जस्टिस एमके मुखर्जी आयोग के निष्कर्षों का उल्लेख किया गया था।
शाहनवाज समिति और खोसला आयोग ने विमान हादसे में नेताजी की मृत्यु और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को नेताजी का बताया था। लेकिन बाद में जस्टिस मुखर्जी आयोग ने अलग निष्कर्ष दिया।
रेनकोजी मंदिर में ही क्यों रखा गया कलश?
उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, जापान पहुंचने के बाद नेताजी के बताए जाने वाले अवशेषों को रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखा गया। मंदिर के पुजारी ने इन्हें तब तक संभालकर रखने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी, जब तक उन्हें भारत वापस नहीं ले जाया जाता।
14 सितंबर 1945 को एक श्रद्धांजलि सभा के बाद इन अवशेषों को मंदिर में रखे जाने का उल्लेख सरकारी दस्तावेजों में मिलता है।
इसके बाद रेनकोजी मंदिर नेताजी की स्मृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया। हर साल 18 अगस्त के आसपास वहां नेताजी को श्रद्धांजलि दी जाती है और भारतीय तथा जापानी प्रतिनिधि कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।
इस तरह जिस कलश को शुरुआत में अस्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए मंदिर में रखा गया था, वह करीब आठ दशक बाद भी वहीं मौजूद है।
क्या भारत सरकार नेताजी की अस्थियों को अपना मानती है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
भारत सरकार ने अलग-अलग समय पर गठित जांच समितियों के निष्कर्षों पर विचार किया है। 2017 में एक RTI जवाब में केंद्र सरकार ने कहा था कि उपलब्ध जांच रिपोर्टों पर विचार करने के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि नेताजी की मृत्यु 1945 के विमान हादसे में हुई थी। हालांकि बाद में सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह रुख 2006 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा जस्टिस मुखर्जी आयोग के कुछ निष्कर्षों को स्वीकार न करने के फैसले से जुड़ा था।
यानी आधिकारिक सरकारी रुख और जांच आयोगों के निष्कर्षों के बीच इतिहास में एक महत्वपूर्ण अंतर रहा है।
जस्टिस मुखर्जी आयोग ने क्या कहा था?
नेताजी की मौत के रहस्य की जांच के लिए जस्टिस एमके मुखर्जी आयोग बनाया गया था। आयोग ने 2005 में अपनी रिपोर्ट दी।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक, आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि नेताजी की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन वह 18 अगस्त 1945 के कथित विमान हादसे में नहीं मरे थे। आयोग ने यह भी कहा था कि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की नहीं थीं।
हालांकि केंद्र सरकार ने 2006 में आयोग के इन दोनों निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया था।
यही वजह है कि नेताजी की मृत्यु और रेनकोजी मंदिर में रखे अवशेषों की पहचान आज भी पूरी तरह निर्विवाद विषय नहीं है।
DNA टेस्ट क्यों नहीं हुआ?
रेनकोजी मंदिर में रखे अवशेषों की पहचान को लेकर DNA जांच की मांग लंबे समय से उठती रही है।
जस्टिस मुखर्जी आयोग से जुड़े दस्तावेजों में उल्लेख है कि आयोग अवशेषों वाले कंटेनर को खुद खोलकर जांच नहीं कर सका था। बाद में भारतीय दूतावास से प्राप्त तस्वीरों में कथित तौर पर हड्डी के टुकड़े, खोपड़ी के हिस्से और दांत जैसे अवशेष दिखाई देने की बात दर्ज की गई थी।
लेकिन इन अवशेषों की निर्णायक DNA पहचान को लेकर आज तक कोई ऐसा सार्वजनिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है, जिसे सभी पक्षों ने स्वीकार कर लिया हो।
यही वजह है कि नेताजी के परिवार के कुछ सदस्य अवशेषों को भारत लाकर अंतिम संस्कार कराने की मांग करते रहे हैं।
नेताजी का परिवार लगातार क्यों कर रहा है भारत लाने की मांग?
नेताजी के परिवार की ओर से दशकों से भारत में उनके अंतिम संस्कार की मांग की जाती रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, परिवार के सदस्यों ने अलग-अलग प्रधानमंत्रियों को पत्र लिखकर नेताजी के अवशेषों को जापान से भारत लाने की मांग की। नेताजी के छोटे भाई ने 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा था। बाद में 1990 में उनके भतीजों अशोक नाथ बोस, अमिया नाथ बोस और सुब्रत बोस ने प्रधानमंत्री वीपी सिंह को पत्र लिखा।
2007 में अनीता बोस फाफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इस मुद्दे पर पत्र लिखा था।
अब सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका इस मांग को एक संवैधानिक और कानूनी मंच तक ले आई है।
80 साल बाद भी यह मामला इतना संवेदनशील क्यों है?
नेताजी सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में से एक रहे हैं। उनकी आजाद हिंद फौज और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष ने भारतीय इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।
उनकी मृत्यु को लेकर रहस्य इसलिए भी लंबे समय तक बना रहा क्योंकि 1945 के बाद नेताजी के जीवित होने की कई तरह की अटकलें सामने आती रहीं।
सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों और विभिन्न जांच आयोगों के बावजूद, उनके अंतिम दिनों और रेनकोजी मंदिर में रखे अवशेषों की पहचान को लेकर समाज के एक हिस्से में सवाल बने रहे।
अब सुप्रीम कोर्ट में अनीता बोस फाफ की याचिका से यह सवाल फिर सामने है कि क्या जापान में दशकों से रखे इन अवशेषों को भारत लाया जाना चाहिए और क्या उनकी वैज्ञानिक जांच के जरिए उनकी पहचान को लेकर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है।
क्या अब नेताजी की अस्थियां भारत आ पाएंगी?
फिलहाल इसका जवाब देना जल्दबाजी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसके बाद सरकार का पक्ष, जापान से संबंधित पहलू और अवशेषों की पहचान से जुड़े ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक सवाल अदालत के सामने आ सकते हैं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि अदालत के सामने इस समय मुख्य मांग अवशेषों को भारत वापस लाने से जुड़ी है। अभी अदालत ने यह तय नहीं किया है कि रेनकोजी मंदिर में रखे अवशेष निश्चित रूप से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ही हैं।
इसलिए आने वाले समय में इस मामले में सरकार का जवाब और सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही बेहद महत्वपूर्ण होगी।
निष्कर्ष
करीब 80 साल बाद भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अवशेष जापान के रेनकोजी मंदिर में रखे होने का दावा इतिहास के सबसे लंबे समय से चले आ रहे रहस्यों में शामिल है। एक ओर आधिकारिक सरकारी रुख 1945 के विमान हादसे में नेताजी की मृत्यु को स्वीकार करता है, वहीं जस्टिस मुखर्जी आयोग ने विमान हादसे और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को लेकर अलग निष्कर्ष दिया था।
अब नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ की सुप्रीम कोर्ट याचिका ने इस मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है। कोर्ट द्वारा केंद्र से जवाब मांगे जाने के बाद यह देखना अहम होगा कि सरकार इस बार अवशेषों को भारत लाने की मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या आठ दशक पुराने इस सवाल का कोई निर्णायक समाधान निकल पाता है।


