राजस्थान के सीमावर्ती जिलों श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में इस साल गेहूं खरीद सीजन किसानों और प्रशासन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद की अवधि इस बार एक महीने घटा दी गई है, जिससे पूरी व्यवस्था पर दबाव साफ दिखाई देने लगा है।
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा जारी नए शेड्यूल के अनुसार, इस वर्ष गेहूं खरीद 16 मार्च से शुरू होकर 31 मई 2026 तक ही चलेगी। पहले यह अवधि 30 जून तक रहती थी, यानी इस बार किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए लगभग एक महीना कम समय मिला है।
कम समय, बड़ा लक्ष्य और संसाधनों की कमी—इन तीनों का मिला-जुला असर अब मंडियों में दिखाई देने लगा है।
पंजीकरण की अंतिम तिथि और बढ़ता दबाव
सरकार ने किसानों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की अंतिम तिथि 25 मई निर्धारित की है। इसका मतलब यह है कि जिन किसानों ने अभी तक पंजीकरण नहीं कराया है, उन्हें सीमित समय में प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ मंडल में अब तक 27,320 किसानों ने पंजीकरण कराया है। इनमें:
- श्रीगंगानगर जिले के 13,849 किसान
- हनुमानगढ़ जिले के 13,471 किसान शामिल हैं
लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने कम समय में सभी किसान अपनी उपज बेच पाएंगे? यही चिंता अब किसानों के बीच चर्चा का विषय बन रही है।
खरीद लक्ष्य: आंकड़े दिखाते हैं बड़ा ऑपरेशन
इस साल प्रशासन ने बड़े स्तर पर गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया है।
- कुल लक्ष्य: 12.16 लाख मीट्रिक टन
- श्रीगंगानगर: 4.90 लाख मीट्रिक टन
- हनुमानगढ़: 7.25 लाख मीट्रिक टन
- कुल खरीद केंद्र: 141
यह आंकड़े बताते हैं कि खरीद का दायरा बड़ा है, लेकिन समय कम होने के कारण इसे पूरा करना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।
सबसे बड़ी समस्या: बारदाने की कमी
खरीद प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बारदाने (गन्नी बैग) की होती है। लेकिन इस बार यही सबसे बड़ी बाधा बनता दिख रहा है।
पूरे मंडल में लगभग 48 हजार बैल्स बारदाने की जरूरत है, लेकिन अब तक केवल 20 हजार बैल्स ही उपलब्ध हो पाए हैं।
अधिकारियों के अनुसार:
- 7 हजार बैल्स जल्द पहुंचने की संभावना है
- बाकी की आपूर्ति प्रक्रिया अभी जारी है
लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि अगर समय पर पर्याप्त बारदाना उपलब्ध नहीं हुआ, तो मंडियों में खरीद प्रक्रिया धीमी हो सकती है। इससे किसानों को अपनी फसल बेचने में देरी और परेशानी दोनों झेलनी पड़ सकती है।
प्रशासन के लिए “परीक्षा” क्यों बन रहा यह सीजन
मंगलवार को हुई मंडल स्तरीय बैठक में अधिकारियों ने खरीद व्यवस्था को लेकर समीक्षा की। भारतीय खाद्य निगम यानी Food Corporation of India (FCI) से जुड़े अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि मंडियों में व्यवस्थाएं मजबूत रखी जाएं।
इसके बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं:
- कम समय में ज्यादा खरीद
- बारदाने की कमी
- किसानों की बढ़ती संख्या
- लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज की सीमाएं
इन सभी कारणों से यह सीजन प्रशासन के लिए एक “टेस्ट केस” बन गया है।
किसानों के लिए नया नियम: कैसे तय होगी खरीद मात्रा
इस बार गेहूं खरीद की मात्रा तय करने के नियमों में भी बदलाव किया गया है।
अब किसान से गेहूं की खरीद उसकी गिरदावरी (भूमि रिकॉर्ड) में दर्ज बोए गए क्षेत्र के आधार पर तय होगी। इसके साथ संबंधित पटवारी सर्कल की औसत उपज को ध्यान में रखते हुए अधिकतम खरीद सीमा निर्धारित की जाएगी।
सरकार का कहना है कि इससे तकनीकी त्रुटियां दूर होंगी और वास्तविक उत्पादन के आधार पर खरीद सुनिश्चित होगी।
लेकिन कई किसान इस बदलाव का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि कई बार वास्तविक उत्पादन औसत से अधिक होता है, ऐसे में वे पूरी फसल MSP पर नहीं बेच पाएंगे।
जमीनी असर: किसानों की चिंता क्यों बढ़ रही है
अगर इस पूरे सिस्टम को जमीन पर देखें, तो किसानों की चिंता कई कारणों से बढ़ रही है:
पहला, खरीद का समय कम हो गया है।
दूसरा, बारदाने की कमी से देरी हो सकती है।
तीसरा, खरीद सीमा तय होने से पूरी उपज बेचने में दिक्कत आ सकती है।
इन सभी कारणों से किसानों को डर है कि उन्हें अपनी फसल MSP से कम दाम पर खुले बाजार में बेचनी पड़ सकती है।
क्या समाधान संभव है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर प्रशासन समय रहते कुछ कदम उठाए, तो स्थिति को संभाला जा सकता है:
- बारदाने की आपूर्ति तेज करना
- खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाना
- डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाना
- किसानों को स्लॉट आधारित खरीद सुविधा देना
इसके अलावा, मंडियों में बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता भी जरूरी है, ताकि किसानों का भरोसा बना रहे।
निष्कर्ष
श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में इस साल का गेहूं खरीद सीजन कई मायनों में अलग और चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ सरकार ने बड़ा लक्ष्य तय किया है, वहीं दूसरी तरफ समय की कमी और संसाधनों की सीमाएं इसे जटिल बना रही हैं।
अगर व्यवस्थाओं में तेजी नहीं लाई गई, तो इसका सीधा असर किसानों पर पड़ सकता है। वहीं प्रशासन के लिए यह एक बड़ा टेस्ट है कि वह इस चुनौती को कैसे संभालता है।
आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि यह खरीद सीजन किसानों के लिए राहत लेकर आता है या नई परेशानियां खड़ी करता है।
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