Wheat Price: देश में गेहूं की कीमतों में एक बार फिर तेजी के संकेत मिल रहे हैं। घरेलू मंडियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक गेहूं के दाम मजबूत बने हुए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, रेड-सी क्षेत्र में बढ़ता तनाव, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में उत्पादन एवं निर्यात को लेकर चिंताओं ने वैश्विक बाजार में गेहूं की कीमतों को सहारा दिया है। वहीं भारत में भी अगर सरकार अगस्त-सितंबर में खुले बाजार बिक्री योजना (OMSS) के तहत गेहूं नहीं बेचती है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।
एक महीने में बढ़े होलसेल और रिटेल दाम
देश में पिछले एक महीने के दौरान गेहूं की कीमतों में करीब 1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़त केवल थोक बाजार तक सीमित नहीं रही, बल्कि खुदरा बाजार में भी गेहूं के दाम लगभग 1 फीसदी बढ़े हैं। इससे आटा मिलों और उपभोक्ताओं दोनों की लागत पर असर पड़ सकता है।
मंडी के ताजा आंकड़ों के अनुसार—
- 17 जुलाई: गेहूं का औसत भाव 2,506.66 रुपये प्रति क्विंटल, आवक 51,399.90 मीट्रिक टन
- 18 जुलाई: औसत भाव 2,527.33 रुपये प्रति क्विंटल
- 19 जुलाई: औसत भाव 2,447.61 रुपये प्रति क्विंटल
हालांकि 19 जुलाई को कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली, लेकिन बाजार का समग्र रुख अभी भी मजबूत बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो साल की ऊंचाई के करीब गेहूं
वैश्विक बाजार में गेहूं की कीमतें लगातार मजबूत बनी हुई हैं। शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) में गेहूं का भाव 674 डॉलर प्रति बुशेल के ऊपर पहुंच गया है। 17 जुलाई को यह कीमत बढ़कर 682.75 डॉलर प्रति बुशेल तक पहुंच गई, जो लगभग दो वर्षों के उच्च स्तर के करीब मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेड-सी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव के कारण गेहूं की कीमतों को लगातार समर्थन मिल रहा है।
किन कारणों से बढ़ रही हैं गेहूं की कीमतें?
दुनिया भर में कई ऐसे कारक हैं, जो गेहूं की कीमतों को ऊपर बनाए हुए हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध का असर
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर वैश्विक खाद्यान्न आपूर्ति पर साफ दिखाई दे रहा है। रूस लगातार यूक्रेन के बंदरगाह और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है, जिससे गेहूं के निर्यात पर दबाव बना हुआ है।
अमेरिका से कमजोर निर्यात
अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुसार 9 जुलाई तक अमेरिका से गेहूं का निर्यात घटकर 2.35 लाख टन रहा। कमजोर निर्यात और कम बुआई ने भी वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
ऑस्ट्रेलिया में उत्पादन घटने की आशंका
ऑस्ट्रेलिया में गर्म मौसम और प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण इस साल गेहूं उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। अनुमान है कि उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 फीसदी कम रह सकता है। जहां 2025 में लगभग 1.33 करोड़ टन उत्पादन हुआ था, वहीं इस वर्ष उत्पादन घटकर लगभग 95 लाख टन रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।
अगस्त में क्या और महंगा होगा गेहूं?
श्री गोवर्ध रोलर फ्लोर मिल्स के संदीप बंसल के अनुसार, अमेरिका में पिछले 100 वर्षों में गेहूं की बुआई सबसे कम स्तर पर है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन संघर्ष और ऑस्ट्रेलिया में कमजोर उत्पादन की संभावना भी वैश्विक कीमतों को मजबूती दे रही है।
उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में इस साल करीब 25 से 26 मिलियन टन गेहूं उत्पादन होने का अनुमान है, जो सामान्य स्तर से कम है।
भारत में क्या रहेगा असर?
भारतीय बाजार में गेहूं की कीमतों का रुख काफी हद तक सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार Open Market Sale Scheme (OMSS) के तहत अगस्त और सितंबर में बाजार में गेहूं की अतिरिक्त आपूर्ति नहीं करती है, तो घरेलू कीमतों में और तेजी आ सकती है।
इसके अलावा एल नीनो जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियां भी आगामी फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बनी रह सकती है।
उपभोक्ताओं और कारोबारियों को क्या करना चाहिए?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी बनी रहती है और घरेलू बाजार में सरकारी हस्तक्षेप सीमित रहता है, तो आने वाले हफ्तों में गेहूं और आटे की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम दिशा सरकार की नीति, बफर स्टॉक की स्थिति और OMSS के तहत बिक्री के फैसले पर निर्भर करेगी।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें शामिल बाजार विशेषज्ञों के विचार उनके निजी आकलन हैं। NewsJagran.in किसी भी निवेश, व्यापारिक या खरीद संबंधी निर्णय के लिए जिम्मेदार नहीं है। किसी भी वित्तीय या कमोडिटी संबंधी निर्णय से पहले प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।


