अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक वित्तीय बाजारों में एक नई चिंता सामने आई है। दुनिया की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली अमेरिकी सरकारी बॉन्ड मार्केट यानी यूएस ट्रेजरी मार्केट से विदेशी निवेशक तेजी से पैसा निकाल रहे हैं। मार्च 2026 में विदेशी देशों की यूएस ट्रेजरीज होल्डिंग्स में 139 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई, जो सितंबर 2022 के बाद सबसे बड़ी मासिक गिरावट मानी जा रही है।
सबसे ज्यादा चर्चा जापान और चीन की बिकवाली को लेकर हो रही है। दोनों देशों ने केवल एक महीने में लगभग 89 अरब डॉलर की अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज बेच दीं। ऐसे समय में यह घटनाक्रम सामने आया है जब मध्य पूर्व में तनाव बढ़ रहा है, कच्चे तेल की कीमतें चढ़ रही हैं और दुनिया भर में महंगाई दोबारा तेज होने की आशंका बढ़ गई है।
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह केवल सामान्य पोर्टफोलियो बदलाव नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में धीरे-धीरे आ रहे बदलाव का संकेत भी हो सकता है।
क्या होती हैं यूएस ट्रेजरीज और क्यों महत्वपूर्ण हैं?
यूएस ट्रेजरीज अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले बॉन्ड होते हैं। इन्हें दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है क्योंकि इनके पीछे अमेरिकी सरकार की गारंटी होती है। दुनिया के कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा अमेरिकी ट्रेजरीज में निवेश करते हैं।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि डॉलर अभी भी दुनिया की रिजर्व करेंसी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल खरीद और विदेशी लेनदेन का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है। ऐसे में देशों के केंद्रीय बैंक अमेरिकी बॉन्ड खरीदकर अपनी पूंजी सुरक्षित रखते हैं।
लेकिन जब बड़े देश तेजी से अमेरिकी बॉन्ड बेचने लगते हैं तो यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर की मजबूती को लेकर चिंता का संकेत माना जाता है।
जापान ने क्यों बेचे अमेरिकी बॉन्ड?
यूएस ट्रेजरीज में सबसे बड़ी विदेशी हिस्सेदारी जापान की है। मार्च 2026 में जापान ने अपनी होल्डिंग्स में 48 अरब डॉलर की कटौती की। इसके बाद उसकी कुल हिस्सेदारी दिसंबर 2025 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह जापानी करेंसी येन पर दबाव माना जा रहा है। हाल के महीनों में डॉलर के मुकाबले येन काफी कमजोर हुआ है। जापान का केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय लंबे समय से करेंसी मार्केट में हस्तक्षेप कर रहे हैं ताकि येन की गिरावट को रोका जा सके।
जब कोई देश अपनी मुद्रा को मजबूत करना चाहता है तो वह विदेशी रिजर्व का इस्तेमाल करता है। जापान ने भी डॉलर आधारित संपत्तियां बेचकर डॉलर बाजार में उतारे और बदले में येन खरीदे। इससे उसकी ट्रेजरी होल्डिंग्स में कमी आई।
चीन लगातार क्यों घटा रहा है अमेरिका पर भरोसा?
चीन ने मार्च में अमेरिकी ट्रेजरीज में अपनी हिस्सेदारी 41 अरब डॉलर घटा दी। इसके बाद उसकी कुल होल्डिंग्स घटकर 652 अरब डॉलर रह गई, जो सितंबर 2008 के बाद सबसे कम स्तर है।
अगर पूरे 2026 की शुरुआत से देखें तो चीन ने अब तक 109 अरब डॉलर की कटौती कर दी है। यानी कुछ ही महीनों में उसकी अमेरिकी बॉन्ड होल्डिंग्स करीब 14 फीसदी घट गई हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि चीन पिछले कई वर्षों से अमेरिका पर अपनी वित्तीय निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, टेक्नोलॉजी प्रतिबंध, ताइवान मुद्दा और भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़े हैं। ऐसे में चीन अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा विविध बनाना चाहता है।
चीन तेजी से: सोने की खरीद बढ़ा रहा है, दूसरे देशों के बॉन्ड में निवेश कर रहा है, युआन आधारित व्यापार को बढ़ावा दे रहा है, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है यही वजह है कि अमेरिकी ट्रेजरीज में उसकी हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है।
क्या ईरान तनाव ने बढ़ाई चिंता?
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो दुनिया भर में महंगाई दोबारा बढ़ सकती है।
महंगाई बढ़ने पर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रख सकते हैं। इससे बॉन्ड मार्केट में भारी उतार-चढ़ाव आता है। निवेशक अक्सर ऐसी स्थिति में अपनी रणनीति बदलते हैं।
मार्च के दौरान अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में भी काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। यही कारण है कि कई देशों ने अपने रिजर्व पोर्टफोलियो में बदलाव शुरू किया।
ब्रिटेन ने उल्टा क्यों बढ़ाया निवेश?
जहां जापान और चीन अमेरिकी ट्रेजरीज बेच रहे थे, वहीं ब्रिटेन ने मार्च में अपनी होल्डिंग्स 30 अरब डॉलर बढ़ा दीं। इसके बाद उसकी कुल हिस्सेदारी रिकॉर्ड 927 अरब डॉलर तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन अभी भी अमेरिकी बॉन्ड मार्केट को सबसे सुरक्षित और लिक्विड विकल्प मान रहा है। इसके अलावा लंदन दुनिया का बड़ा वित्तीय केंद्र है, जहां कई अंतरराष्ट्रीय फंड अमेरिकी बॉन्ड के जरिए निवेश करते हैं। इसलिए ब्रिटेन की बढ़ती होल्डिंग्स का मतलब केवल सरकारी निवेश नहीं बल्कि वैश्विक फाइनेंशियल फ्लो भी हो सकता है।
अमेरिका के लिए कितना बड़ा खतरा?
फिलहाल अमेरिका के लिए यह स्थिति तुरंत संकट जैसी नहीं मानी जा रही, लेकिन लंबे समय में यह चिंता जरूर बढ़ा सकती है। अमेरिका पहले से ही भारी कर्ज के बोझ से जूझ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रीय कर्ज लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है।
अगर विदेशी देश अमेरिकी बॉन्ड खरीदना कम कर देते हैं तो अमेरिका के लिए उधार लेना महंगा हो सकता है। इससे: ब्याज भुगतान बढ़ सकता है, डॉलर पर दबाव आ सकता है अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊपर जा सकती है, शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है हालांकि अभी भी अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद बॉन्ड मार्केट माना जाता है। इसलिए अचानक किसी बड़े संकट की संभावना कम मानी जा रही है।
क्या दुनिया डॉलर से दूरी बना रही है?
पिछले कुछ वर्षों में “डी-डॉलराइजेशन” यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा तेजी से बढ़ी है। चीन, रूस, ब्रिक्स देशों और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने स्थानीय करेंसी में व्यापार बढ़ाने की कोशिश शुरू की है।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर को तुरंत चुनौती देना आसान नहीं है क्योंकि: वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है, अमेरिकी बॉन्ड मार्केट सबसे बड़ा है, डॉलर की लिक्विडिटी सबसे ज्यादा है, संकट के समय निवेशक अब भी डॉलर को सुरक्षित मानते हैं.
लेकिन चीन और जापान जैसे बड़े देशों की लगातार बिकवाली यह जरूर दिखाती है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने रिजर्व पोर्टफोलियो में बदलाव कर रही है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर अमेरिकी बॉन्ड मार्केट में अस्थिरता बढ़ती है तो इसका असर भारत सहित उभरते बाजारों पर भी पड़ सकता है। डॉलर मजबूत होने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, महंगाई और ब्याज दरों पर असर पड़ सकता है.
हालांकि भारत ने हाल के वर्षों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत किया है, जिससे बाहरी झटकों का असर कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मार्च 2026 में यूएस ट्रेजरीज से 139 अरब डॉलर की विदेशी निकासी केवल एक सामान्य वित्तीय घटना नहीं मानी जा रही। जापान और चीन की बड़ी बिकवाली ने यह संकेत दिया है कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा है।
ईरान तनाव, महंगाई का खतरा, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आने वाले समय में दुनिया की वित्तीय व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल अमेरिका की स्थिति मजबूत बनी हुई है, लेकिन बड़े देशों की रणनीति में बदलाव भविष्य के लिए नए संकेत जरूर दे रहा है।
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