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रुपया 100 प्रति डॉलर तक जाने दो? दिग्गज अर्थशास्त्री अरविंद पनागरिया की सलाह ने बढ़ाई बहस

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/22 at 7:45 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी के बीच देश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष Arvind Panagariya ने ऐसा बयान दिया है जिसने आर्थिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सलाह दी है कि रुपये को कृत्रिम तरीके से बचाने की बजाय उसे बाजार के हिसाब से कमजोर होने दिया जाए, भले ही डॉलर के मुकाबले यह 100 रुपये के स्तर तक क्यों न पहुंच जाए।

Contents
आखिर क्या बोले अरविंद पनागरिया?क्यों दबाव में है भारतीय रुपया?RBI क्यों करता है हस्तक्षेप?क्या 100 रुपये प्रति डॉलर खतरनाक होगा?कमजोर रुपये से किसे फायदा होता है?2013 और आज के भारत में कितना अंतर?क्या RBI वास्तव में रुपये को 100 तक जाने देगा?आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?संभावित असर:आगे क्या देखना होगा?निष्कर्ष

यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया संकट, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी पूंजी निकासी के कारण भारतीय मुद्रा लगातार दबाव में है। रुपये में गिरावट को लेकर आम लोगों के बीच चिंता बढ़ रही है, क्योंकि इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेश यात्रा और आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। लेकिन अरविंद पनागरिया का मानना है कि मौजूदा भारत 2013 वाला भारत नहीं है और देश की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि वह रुपये की कमजोरी का असर झेल सकती है।

आखिर क्या बोले अरविंद पनागरिया?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई पोस्ट करते हुए पनागरिया ने कहा कि नीति निर्माताओं को “100 रुपये प्रति डॉलर” जैसी मनोवैज्ञानिक सीमा से डरना नहीं चाहिए। उनके अनुसार, “100 सिर्फ एक संख्या है” और केवल इस स्तर को बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार झोंक देना सही रणनीति नहीं होगी।

उन्होंने कहा कि अगर बाजार की परिस्थितियों के कारण रुपया कमजोर हो रहा है, तो RBI को उसे जबरदस्ती संभालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उनका मानना है कि मुद्रा विनिमय दर को बाजार आधारित रहना चाहिए और जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकता है।

पनागरिया ने यह भी तर्क दिया कि अगर तेल संकट अस्थायी है, तो बाद में रुपया खुद सुधर सकता है। वहीं यदि संकट लंबा चलता है, तो कृत्रिम बचाव केवल भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को कमजोर करेगा।

क्यों दबाव में है भारतीय रुपया?

पिछले कुछ महीनों में कई वैश्विक कारणों ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। इनमें सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब तेल महंगा होता है, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होने लगता है।

इसके अलावा विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये पर असर डाल रही है। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे डॉलर खरीदते हैं, जिससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति भी एक बड़ा कारण है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें विदेशी निवेशकों को वहां पैसा लगाने के लिए आकर्षित करती हैं, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकलती है।

RBI क्यों करता है हस्तक्षेप?

भारतीय रिजर्व बैंक आमतौर पर रुपये में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करता है। इसके लिए RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है ताकि बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़े और रुपये पर दबाव कम हो।

हालांकि लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार घट सकता है। यही कारण है कि कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि केवल किसी खास स्तर को बचाने के लिए रिजर्व खर्च करना समझदारी नहीं है।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी वैश्विक मानकों के हिसाब से मजबूत माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक लगातार हस्तक्षेप महंगा साबित हो सकता है।

क्या 100 रुपये प्रति डॉलर खतरनाक होगा?

यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। आम तौर पर कमजोर रुपया कई समस्याएं पैदा करता है: पेट्रोल-डीजल और LPG महंगे हो सकते हैं, आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल की कीमतें बढ़ सकती हैं, विदेश में पढ़ाई और यात्रा महंगी हो सकती है, कंपनियों की आयात लागत बढ़ सकती है, महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है लेकिन दूसरी ओर कमजोर रुपया कुछ फायदे भी देता है।

कमजोर रुपये से किसे फायदा होता है?

जब रुपया कमजोर होता है, तो भारतीय निर्यात दुनिया के बाजार में सस्ता हो जाता है। इससे IT कंपनियों, फार्मा कंपनियों और एक्सपोर्ट सेक्टर को फायदा मिल सकता है। उदाहरण के लिए: IT कंपनियों को डॉलर में कमाई होती है, टेक्सटाइल और फार्मा निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, विदेशी पर्यटकों के लिए भारत सस्ता हो जाता है

पनागरिया का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब इतनी बड़ी और विविध हो चुकी है कि वह मुद्रा में गिरावट को बेहतर तरीके से संभाल सकती है।

Dear @RBI: Do not let the psychology of Rs 100 per dollar determine your policy response. 100 is just a number, like 99 and 101. Whether the oil shortage is short-lived or long-lived, the right response at this moment is to let the rupee depreciate. 1/6

— Arvind Panagariya (@APanagariya) May 21, 2026

2013 और आज के भारत में कितना अंतर?

पनागरिया ने अपने बयान में 2013 का भी जिक्र किया। उस समय भारत “टेपेर टैंट्रम” संकट से गुजर रहा था। अमेरिकी फेड की नीति के कारण विदेशी निवेश तेजी से बाहर निकला था और रुपया भारी दबाव में आ गया था।

लेकिन आज स्थिति अलग मानी जा रही है:

20132026
ऊंची महंगाईनियंत्रित मुद्रास्फीति
बड़ा चालू खाता घाटाअपेक्षाकृत बेहतर स्थिति
कमजोर विदेशी मुद्रा भंडारमजबूत रिजर्व
निवेशकों का कम भरोसामजबूत GDP ग्रोथ

इसी आधार पर पनागरिया कह रहे हैं कि आज भारत ज्यादा मजबूत स्थिति में है।

क्या RBI वास्तव में रुपये को 100 तक जाने देगा?

फिलहाल इसकी संभावना कम मानी जा रही है। RBI आमतौर पर अत्यधिक अस्थिरता रोकने की कोशिश करता है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य किसी खास स्तर को तय करना नहीं बल्कि बाजार में स्थिरता बनाए रखना होता है।

हालांकि यदि वैश्विक हालात लंबे समय तक खराब रहते हैं और तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि RBI धीरे-धीरे नियंत्रित गिरावट स्वीकार कर सकता है, लेकिन अचानक तेज कमजोरी को रोकने की कोशिश जारी रहेगी।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

अगर रुपया लगातार कमजोर होता है तो इसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।

संभावित असर:

पेट्रोल और डीजल महंगे, हवाई यात्रा खर्च बढ़ सकता है, मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे, विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ेगा, खाने-पीने की चीजों पर महंगाई दबाव हालांकि सरकार टैक्स कटौती या अन्य कदमों के जरिए कुछ राहत देने की कोशिश कर सकती है।

आगे क्या देखना होगा?

अब बाजार की नजर तीन बड़ी चीजों पर रहेगी:

  1. पश्चिम एशिया संकट कितना लंबा चलता है
  2. कच्चे तेल की कीमतें कहां तक जाती हैं
  3. RBI की आगे की रणनीति क्या रहती है

यदि तेल कीमतें स्थिर होती हैं और विदेशी निवेश वापस आता है, तो रुपये में सुधार भी संभव है। लेकिन अगर वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो भारतीय मुद्रा पर दबाव और गहरा सकता है।

निष्कर्ष

अरविंद पनागरिया का बयान केवल रुपये की कीमत पर टिप्पणी नहीं बल्कि भारत की आर्थिक मजबूती पर भरोसे का संकेत भी माना जा रहा है। उनका कहना है कि मुद्रा को कृत्रिम रूप से बचाने के बजाय अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत पर भरोसा करना चाहिए।

हालांकि कमजोर रुपये का असर आम लोगों की जेब पर जरूर पड़ता है, लेकिन कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि बाजार आधारित विनिमय दर लंबे समय में ज्यादा टिकाऊ होती है। अब देखना होगा कि RBI आने वाले दिनों में कितनी आक्रामक मुद्रा रक्षा रणनीति अपनाता है और वैश्विक हालात किस दिशा में जाते हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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