भारत में शराब पीने वालों को समाज में भले ही अच्छी नजर से न देखा जाता हो, लेकिन राज्य सरकारों के लिए यही लोग कमाई का बड़ा जरिया बन जाते हैं। शराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी यानी उत्पाद शुल्क कई राज्यों की आय का अहम हिस्सा है। यही वजह है कि अधिकांश राज्य सरकारें शराब की बिक्री को पूरी तरह बंद करने से बचती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पेट्रोल-डीजल की तरह शराब भी GST के दायरे से बाहर है। इसका मतलब यह हुआ कि शराब पर टैक्स लगाने और उससे कमाई करने का पूरा अधिकार राज्य सरकारों के पास है। हर राज्य अपनी जरूरत और नीति के हिसाब से अलग-अलग टैक्स तय करता है। इसी कारण कहीं शराब बेहद महंगी मिलती है तो कहीं अपेक्षाकृत सस्ती।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा संदर्भित स्टेट फाइनेंस डेटा और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ राज्य शराब से कमाई के मामले में बाकी राज्यों से काफी आगे हैं। यह कमाई सिर्फ आबादी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि राज्य में शराब पीने वालों की संख्या कितनी है, वहां शराब की खपत कितनी है और सरकार एक्साइज ड्यूटी कितनी वसूलती है।
एक्साइज ड्यूटी क्या होती है?

एक्साइज ड्यूटी वह टैक्स है जो राज्य सरकारें शराब, पेट्रोलियम उत्पाद और कुछ अन्य वस्तुओं पर लगाती हैं। शराब पर यह टैक्स उत्पादन, वितरण और बिक्री के अलग-अलग स्तर पर लगाया जाता है।
GST लागू होने के बाद भी शराब को जानबूझकर उससे बाहर रखा गया क्योंकि यह राज्यों की कमाई का बड़ा स्रोत है। कई राज्यों के कुल टैक्स रेवेन्यू में शराब से मिलने वाला हिस्सा 15% तक पहुंच जाता है।
शराब से कमाई में यूपी नंबर-1
देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश ने शराब से कमाई के मामले में भी पहला स्थान हासिल किया है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक फैला शराब दुकानों का विशाल नेटवर्क राज्य की कमाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
NFHS-5 और स्टेट फाइनेंस डेटा के मुताबिक उत्तर प्रदेश को शराब से करीब 31,517 करोड़ रुपये का एक्साइज रेवेन्यू मिला। राज्य में लगभग 14.6% पुरुष और 0.3% महिलाएं शराब का सेवन करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूपी में आबादी के साथ-साथ उपभोक्ता आधार बड़ा होने से शराब की बिक्री लगातार मजबूत बनी रहती है। इसके अलावा हाईवे, शहरीकरण और बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम ने भी शराब बाजार को बढ़ावा दिया है।
कर्नाटक दूसरे स्थान पर

दक्षिण भारत का कर्नाटक शराब से कमाई के मामले में दूसरे नंबर पर है। राज्य को एक्साइज ड्यूटी से लगभग 20,950 करोड़ रुपये की आय हुई।
बेंगलुरु जैसे महानगर इस कमाई की सबसे बड़ी वजह हैं। आईटी सेक्टर, बड़ी युवा आबादी और नाइटलाइफ कल्चर ने यहां शराब की मांग को काफी बढ़ाया है। NFHS-5 के अनुसार राज्य में 16.5% पुरुष और 0.9% महिलाएं शराब का सेवन करती हैं।
कर्नाटक सरकार समय-समय पर शराब पर टैक्स बढ़ाती रही है, जिससे उसकी आय में लगातार इजाफा हुआ है।
महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर
महाराष्ट्र शराब बाजार के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्यों में गिना जाता है। मुंबई, पुणे और नासिक जैसे शहरों में प्रीमियम शराब की भारी मांग रहती है। यही वजह है कि राज्य को शराब से करीब 17,477 करोड़ रुपये का राजस्व मिला।
NFHS के आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में 13.9% पुरुष और 0.4% महिलाएं शराब का सेवन करती हैं। हालांकि प्रतिशत के हिसाब से यह कुछ राज्यों से कम है, लेकिन बड़ी शहरी आबादी और महंगी प्रीमियम शराब की बिक्री सरकार की कमाई बढ़ा देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र में वाइन इंडस्ट्री भी तेजी से बढ़ी है, खासकर नासिक क्षेत्र में। इससे राज्य की शराब आधारित अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त मजबूती मिली है।
मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर

मध्य प्रदेश शराब से कमाई के मामले में चौथे नंबर पर है। राज्य को एक्साइज ड्यूटी से लगभग 11,873 करोड़ रुपये का राजस्व मिला।
राज्य में शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में शराब की मजबूत मांग है। NFHS-5 के मुताबिक यहां करीब 17% पुरुष और लगभग 1% महिलाएं शराब का सेवन करती हैं।
मध्य प्रदेश सरकार पिछले कुछ वर्षों में नई आबकारी नीति के जरिए राजस्व बढ़ाने पर लगातार फोकस कर रही है। शराब दुकानों की संख्या बढ़ाने और लाइसेंस फीस में बदलाव जैसे कदमों से सरकार की आय में वृद्धि हुई है।
तमिलनाडु पांचवें नंबर पर
तमिलनाडु इस सूची में पांचवें स्थान पर है। राज्य ने शराब से करीब 7,262 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया। तमिलनाडु की खास बात यह है कि यहां शराब बिक्री का बड़ा हिस्सा सरकारी नियंत्रण में चलता है। राज्य में TASMAC (Tamil Nadu State Marketing Corporation) के जरिए शराब की बिक्री होती है।
NFHS-5 के अनुसार तमिलनाडु में 25.4% पुरुष शराब का सेवन करते हैं, जो कई बड़े राज्यों की तुलना में ज्यादा है। इसके बावजूद सरकारी नियंत्रण वाली बिक्री व्यवस्था के कारण राज्य का मॉडल अलग माना जाता है।
शराब GST के बाहर क्यों है?

जब 2017 में GST लागू किया गया था तब शराब को इसमें शामिल नहीं किया गया। इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों की वित्तीय निर्भरता है।
यदि शराब GST के दायरे में आ जाती तो राज्यों को टैक्स दर तय करने की स्वतंत्रता खत्म हो जाती। इससे उनकी कमाई पर असर पड़ सकता था। इसलिए आज भी शराब पर राज्य सरकारें अलग-अलग टैक्स वसूलती हैं।
राज्यों की कमाई में शराब की कितनी अहमियत?
कई राज्यों के लिए शराब से मिलने वाला टैक्स सरकारी योजनाओं, कर्मचारियों के वेतन और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का बड़ा स्रोत बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक सुस्ती के दौर में भी शराब की बिक्री अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। इसी वजह से राज्य सरकारें इसे “सुरक्षित राजस्व स्रोत” मानती हैं।
हालांकि दूसरी तरफ शराब से जुड़े सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी नुकसान भी लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। कई राज्यों में शराबबंदी की मांग समय-समय पर उठती रहती है, लेकिन भारी राजस्व नुकसान के डर से सरकारें पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से बचती हैं।
कौन-सा राज्य सबसे ज्यादा शराब पीता है?
NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के कई राज्यों में शराब सेवन करने वालों का प्रतिशत काफी ज्यादा है। हालांकि कुल कमाई आबादी, टैक्स दर और बिक्री व्यवस्था पर निर्भर करती है।
यही कारण है कि कम प्रतिशत वाले बड़े राज्य भी राजस्व के मामले में आगे निकल जाते हैं।
निष्कर्ष
भारत में शराब सिर्फ एक सामाजिक या स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राज्यों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा भी बन चुकी है। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्य शराब से हजारों करोड़ रुपये की कमाई कर रहे हैं।
आने वाले वर्षों में राज्यों की आबकारी नीति, टैक्स दरें और प्रीमियम शराब की बढ़ती मांग इस सेक्टर को और बड़ा बना सकती है। हालांकि इसके साथ सरकारों के सामने सामाजिक जिम्मेदारी और राजस्व के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बनी रहेगी।
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