नई दिल्ली: जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ था, तब दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों, ऊर्जा विशेषज्ञों और उद्योग जगत के जानकारों ने एक बड़े वैश्विक संकट की आशंका जताई थी। डर था कि तेल, गैस, उर्वरक और कई जरूरी औद्योगिक उत्पादों की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होगी। इससे महंगाई आसमान छू सकती थी और दुनिया मंदी की गिरफ्त में आ सकती थी। लेकिन कुछ महीनों बाद तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई। संकट आया जरूर, लेकिन वह उस स्तर तक नहीं पहुंचा जिसकी आशंका जताई जा रही थी।
ऊर्जा संकट से लेकर खाद्य संकट तक का डर
युद्ध की शुरुआत के साथ ही वैश्विक बाजारों में तेल और गैस की कीमतों में उछाल आ गया था। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा सप्लाई करता है। ऐसे में आशंका थी कि यदि आपूर्ति बाधित हुई तो पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन की भारी कमी हो जाएगी।
सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, उर्वरक बाजार में भी बड़ा झटका लगा। यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतें 450 डॉलर प्रति टन से बढ़कर करीब 900 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गईं। विशेषज्ञों का मानना था कि इससे खेती की लागत बढ़ेगी, खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और दुनिया के कई गरीब देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है।
इसके अलावा एल्युमीनियम, पेट्रोकेमिकल्स, प्लास्टिक और हीलियम जैसी वस्तुओं की आपूर्ति पर भी खतरा मंडराने लगा था। उद्योग जगत को डर था कि सप्लाई चेन टूटने से उत्पादन गतिविधियां प्रभावित होंगी।
वैश्विक मंदी की आशंका क्यों थी?
ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। महंगाई बढ़ने से लोगों की खरीदारी क्षमता घटती है। इससे आर्थिक गतिविधियां कमजोर होती हैं और विकास दर प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों को आशंका थी कि सरकारों को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी, जबकि टैक्स संग्रह घट जाएगा। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, ब्याज दरें ऊंची रहेंगी और कई कमजोर अर्थव्यवस्थाएं संकट में फंस सकती हैं।
लेकिन आखिर ऐसा हुआ क्यों नहीं?
दुनिया ने इस संकट का मुकाबला अपेक्षा से कहीं बेहतर तरीके से किया। कई देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार खोले और आपातकालीन स्टॉक का उपयोग किया। सरकारों ने इसे दीर्घकालिक संकट नहीं बल्कि अस्थायी झटका माना।
ऊर्जा पर सीमित अवधि की सब्सिडी, अतिरिक्त सरकारी खर्च और भंडार के इस्तेमाल से बाजार में घबराहट कम हुई। यदि युद्ध छह महीने या उससे अधिक समय तक चलता तो स्थिति गंभीर हो सकती थी, लेकिन अपेक्षाकृत कम अवधि के संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को संभलने का मौका दे दिया।
चीन की सुस्त अर्थव्यवस्था बनी अनचाहा सहायक
इस संकट को नियंत्रित करने में चीन की कमजोर मांग ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देशों में से एक है। लेकिन वहां आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती देखने को मिली।
खुदरा बिक्री के कमजोर आंकड़े और तेल खपत में गिरावट ने वैश्विक मांग को सीमित रखा। यदि चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही होती, तो तेल और गैस की कीमतों पर दबाव कहीं ज्यादा होता और दुनिया को गंभीर महंगाई का सामना करना पड़ सकता था।
ट्रंप ने क्यों चुना समझौते का रास्ता?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने भी राजनीतिक चुनौती थी। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले वे तेल की ऊंची कीमतों और बढ़ती महंगाई का जोखिम नहीं लेना चाहते थे।
इसी वजह से अमेरिका ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते हुए ईरान के साथ समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया। इससे बाजारों को यह संकेत मिला कि संघर्ष लंबे समय तक नहीं चलेगा। परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में धीरे-धीरे नरमी आने लगी और निवेशकों का भरोसा लौटा।
हालांकि अमेरिका में महंगाई अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है और यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप की राजनीतिक चुनौतियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं।
भारत ने कैसे संभाली स्थिति?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा आयात लागत थी। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर महंगाई पर पड़ सकता था।
सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स में राहत देकर और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को कुछ समय तक दबाव झेलने की अनुमति देकर कीमतों में अचानक वृद्धि को रोका। इससे उपभोक्ताओं पर तत्काल बोझ नहीं पड़ा।
दूसरी ओर, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये पर दबाव कम करने के लिए विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने वाले कदम उठाए। इससे डॉलर की मांग और रुपये की कमजोरी को नियंत्रित करने में मदद मिली।
यूरिया संकट भी टल गया
युद्ध के दौरान जिस यूरिया की कीमतें दोगुनी हो गई थीं, वे बाद में फिर सामान्य स्तर के करीब लौट आईं। इससे भारतीय किसानों और सरकार दोनों को राहत मिली।
यदि उर्वरक कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहतीं तो कृषि क्षेत्र पर भारी दबाव पड़ता और सरकार का सब्सिडी बिल काफी बढ़ जाता।
फिर भी नुकसान पूरी तरह नहीं टला
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कुछ हद तक जरूर पड़ा है। RBI का अनुमान है कि देश की GDP वृद्धि दर पिछले वर्ष के 7.7% से घटकर इस वर्ष 6.6% रह सकती है।
हालांकि यह गिरावट चिंता का विषय है, लेकिन 6.6% की वृद्धि दर अब भी दुनिया की अधिकांश बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी मजबूत मानी जाती है।
उधर, उर्वरक सब्सिडी और कर कटौती के कारण सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी बढ़ा है। इससे राजकोषीय घाटा कुछ समय के लिए बढ़ सकता है।
आगे क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार सरकार को तीन प्रमुख कदमों पर ध्यान देना होगा—
- पेट्रोल और डीजल पर घटाए गए करों को धीरे-धीरे फिर से लागू करना।
- यूरिया सब्सिडी को अधिक प्रभावी बनाना ताकि दुरुपयोग और तस्करी रोकी जा सके।
- विदेशी मुद्रा आकर्षित करने वाली अस्थायी योजनाओं को जरूरत खत्म होने पर वापस लेना।
भारत के लिए सकारात्मक संकेत
संकट के बावजूद भारत का भुगतान संतुलन अपेक्षा से बेहतर स्थिति में बना हुआ है। चालू खाता संतुलन में सुधार देखा गया है और रुपये पर दबाव भी पहले की तुलना में कम हुआ है।
यही वजह है कि अमेरिका-ईरान युद्ध, तेल संकट और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देता है। यह बताता है कि सही समय पर लिए गए नीतिगत फैसले, वैश्विक मांग में नरमी और भू-राजनीतिक समझौतों ने मिलकर उस बड़े आर्थिक संकट को टाल दिया जिसकी आशंका कुछ महीने पहले जताई जा रही थी।
निष्कर्ष
अमेरिका-ईरान संघर्ष ने दुनिया को यह दिखा दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी आपस में जुड़ी हुई है। लेकिन इस बार रणनीतिक तेल भंडार, चीन की कमजोर मांग, ट्रंप प्रशासन की राजनीतिक मजबूरियां और भारत की त्वरित नीतिगत प्रतिक्रिया ने संभावित महासंकट को टाल दिया। चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह बड़े वैश्विक झटकों का सामना पहले से कहीं अधिक मजबूती के साथ कर सकता है।


