नई दिल्ली। आयकर मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसले में मुंबई आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने किरायेदारों को बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी किरायेदार को अपनी किरायेदारी का अधिकार छोड़ने के बदले नई दुकान, फ्लैट या अन्य संपत्ति मिलती है, तो उसे मुफ्त में प्राप्त संपत्ति नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संपत्ति बेचने पर पूरे बिक्री मूल्य पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता, बल्कि केवल वास्तविक पूंजीगत लाभ (Capital Gain) पर ही कर देय होगा।
क्या है पूरा मामला?
मुंबई निवासी घनश्याम एक दुकान में लंबे समय से किरायेदार थे। वर्ष 2007 में जिस इमारत में उनकी दुकान स्थित थी, उसका पुनर्विकास (Redevelopment) शुरू किया गया। इस दौरान मकान मालिक ने उनसे किरायेदारी का अधिकार छोड़ने का अनुरोध किया।
समझौते के तहत घनश्याम ने अपनी पुरानी किरायेदारी छोड़ दी और बदले में उन्हें उसी पुनर्विकास परियोजना में एक नई मालिकाना दुकान देने का वादा किया गया। वर्ष 2010 में परियोजना पूरी होने के बाद उन्हें नई दुकान का स्वामित्व मिल गया।
इसके कुछ समय बाद सितंबर 2010 में घनश्याम ने इस नई दुकान को 38.62 लाख रुपये में बेच दिया। हालांकि, आयकर रिटर्न दाखिल करते समय उन्होंने इस लेनदेन से जुड़े कैपिटल गेन का विवरण नहीं दिया। इसके बाद आयकर विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी।
आयकर विभाग का क्या था तर्क?
आयकर विभाग का कहना था कि घनश्याम ने नई दुकान खरीदने के लिए कोई नकद भुगतान नहीं किया था। इसलिए इस संपत्ति की लागत (Cost of Acquisition) शून्य मानी जानी चाहिए।
विभाग के अनुसार जब लागत शून्य होगी तो दुकान की बिक्री से प्राप्त पूरी 38.62 लाख रुपये की राशि को कर योग्य पूंजीगत लाभ माना जाएगा और उसी आधार पर टैक्स लगाया जाना चाहिए।
घनश्याम ने क्या दलील दी?
घनश्याम ने विभाग की इस व्याख्या का विरोध किया। उनका कहना था कि उन्हें नई दुकान मुफ्त में नहीं मिली थी।
उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने अपनी पुरानी किरायेदारी का अधिकार छोड़ा था, जिसकी आर्थिक और कानूनी दोनों दृष्टि से एक स्पष्ट कीमत थी। यही अधिकार नई दुकान प्राप्त करने के बदले दिया गया था। इसलिए नई दुकान की लागत को शून्य नहीं माना जा सकता।
ITAT ने क्या फैसला सुनाया?
मुंबई ITAT ने घनश्याम की दलीलों को स्वीकार करते हुए आयकर विभाग के दृष्टिकोण को खारिज कर दिया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि किरायेदारी का अधिकार (Tenancy Rights) स्वयं एक मूल्यवान पूंजीगत संपत्ति है। जब कोई व्यक्ति इस अधिकार का त्याग करता है तो वह एक आर्थिक मूल्य वाली संपत्ति छोड़ रहा होता है।
अपने फैसले में ITAT ने कहा:
- नई दुकान को मुफ्त में प्राप्त संपत्ति नहीं माना जा सकता।
- किरायेदारी अधिकार छोड़ना ही नई संपत्ति प्राप्त करने का वास्तविक प्रतिफल (Consideration) था।
- इसलिए संपत्ति की लागत को शून्य नहीं माना जा सकता।
- कैपिटल गेन की गणना करते समय उचित लागत निर्धारित करना आवश्यक होगा।
पूरी बिक्री राशि पर टैक्स लगाना गलत
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि यदि पूरी 38.62 लाख रुपये की बिक्री राशि को ही कर योग्य आय मान लिया जाए, तो यह पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax) की मूल अवधारणा के खिलाफ होगा।
आयकर कानून के तहत कर केवल वास्तविक लाभ पर लगाया जाता है, न कि पूरी प्राप्त राशि पर। यदि लागत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए तो करदाता की कुल प्राप्ति पर टैक्स लग जाएगा, जो कानून की मंशा नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
ITAT ने मामले को दोबारा असेसिंग ऑफिसर (AO) के पास भेज दिया है। अब अधिकारी यह निर्धारित करेंगे कि:
- जिस समय घनश्याम ने किरायेदारी का अधिकार छोड़ा था, उसकी बाजार कीमत कितनी थी, या
- नई दुकान की उस समय की उचित बाजार कीमत (Fair Market Value) क्या थी।
इसके बाद उस मूल्य को 38.62 लाख रुपये की बिक्री राशि से घटाया जाएगा और जो वास्तविक पूंजीगत लाभ बचेगा, उसी पर आयकर लगाया जाएगा।
अन्य किरायेदारों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
देश के कई बड़े शहरों में पुनर्विकास परियोजनाओं के दौरान किरायेदारों को पुराने अधिकार छोड़ने के बदले नई दुकानें या फ्लैट दिए जाते हैं। ऐसे मामलों में अक्सर यह विवाद खड़ा होता है कि नई संपत्ति की लागत क्या मानी जाए।
मुंबई ITAT का यह फैसला स्पष्ट करता है कि किरायेदारी अधिकार भी एक मूल्यवान संपत्ति है और उसके बदले प्राप्त संपत्ति को “मुफ्त” नहीं कहा जा सकता। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में करदाताओं को बड़ी राहत मिल सकती है और पूंजीगत लाभ की गणना अधिक न्यायसंगत तरीके से की जा सकेगी।


