Sugar Price Hike: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों से आम लोगों को फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद कम है। सरकार और चीनी उद्योग की ओर से पेराई सीजन को सामान्य समय से करीब 10-15 दिन पहले, यानी अक्टूबर में शुरू करने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि, जमीनी स्तर पर यह योजना मुश्किल में पड़ती दिखाई दे रही है।
देश की ज्यादातर चीनी मिलों के लिए अक्टूबर में गन्ने की पेराई शुरू करना आसान नहीं होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह गन्ने की कटाई के लिए जरूरी मजदूरों की कमी है। इसके अलावा गन्ने की कटाई में इस्तेमाल होने वाली मशीनों की संख्या भी इतनी नहीं है कि मजदूरों की कमी की पूरी भरपाई की जा सके। ऐसे में चीनी उत्पादन बढ़ने और कीमतों में राहत मिलने का इंतजार लंबा हो सकता है।
अक्टूबर में पेराई शुरू करना क्यों मुश्किल?
गन्ने की कटाई के लिए महाराष्ट्र समेत प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में बड़ी संख्या में मौसमी मजदूरों पर निर्भरता रहती है। ये मजदूर आमतौर पर दिवाली के आसपास या उसके बाद अपने गांवों से गन्ना कटाई के लिए निकलते हैं।
महाराष्ट्र में गन्ना कटाई मजदूरों के नेता गहिनी ठोर पाटिल के अनुसार, मजदूर नवंबर के पहले सप्ताह से पहले अपने गांवों से निकलने की स्थिति में नहीं होंगे। ऐसे में अक्टूबर में बड़े स्तर पर गन्ने की कटाई और मिलों तक उसकी आपूर्ति करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में गन्ने की कटाई में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन अभी भी मशीनों की उपलब्धता इतनी नहीं है कि मजदूरों की कमी को पूरी तरह दूर किया जा सके।
क्यों उठी थी जल्दी पेराई शुरू करने की मांग?
देश में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने स्टॉक लिमिट और फिजिकल स्टॉक चेकिंग जैसे कदम उठाए हैं। इसके बावजूद बाजार में कीमतों पर अपेक्षित दबाव नहीं बन पाया।
इसी बीच इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज फेडरेशन ने सरकार को पत्र लिखकर पेराई सीजन को करीब 10-15 दिन पहले शुरू करने का आश्वासन दिया था।
इसका मकसद अक्टूबर में ही नई चीनी का उत्पादन शुरू करना था, ताकि बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सके और बढ़ती कीमतों पर लगाम लग सके।
सरकार ने मिलों को इंसेंटिव देने पर किया विचार
समय से पहले पेराई शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से चीनी मिलों को कुछ प्रोत्साहन देने पर भी चर्चा हुई थी। इनमें अक्टूबर में उत्पादित पूरी चीनी को बेचने की अनुमति और मिलों को अतिरिक्त बिक्री कोटा देने जैसे विकल्प शामिल थे।
सरकार की कोशिश थी कि मिलों को जल्दी पेराई शुरू करने के लिए आर्थिक रूप से प्रोत्साहित किया जाए। इससे बाजार में नई चीनी की उपलब्धता बढ़ती और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती थी।
मजदूरों की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती
योजना का सबसे बड़ा अड़ंगा यही है कि सिर्फ मिलों को इंसेंटिव देने से पेराई जल्दी शुरू नहीं हो सकती। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में गन्ने की कटाई और उसकी मिलों तक समय पर सप्लाई जरूरी है।
अगर मजदूर नवंबर से पहले बड़ी संख्या में उपलब्ध नहीं होते हैं, तो अक्टूबर में बड़े पैमाने पर पेराई शुरू करना मुश्किल होगा। मशीनों से कटाई बढ़ाने का विकल्प मौजूद है, लेकिन सीमित मशीनरी के कारण यह पूरे उद्योग की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
चीनी की कीमतों पर क्या होगा असर?
अगर ज्यादातर मिलें अक्टूबर में अपेक्षित स्तर पर पेराई शुरू नहीं कर पाती हैं, तो बाजार में नई चीनी की अतिरिक्त सप्लाई आने में देरी हो सकती है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ सकता है।
सरकार की ओर से स्टॉक लिमिट और जांच जैसे कदमों के बावजूद अगर सप्लाई बढ़ाने में देरी होती है, तो चीनी की कीमतों में तत्काल राहत मिलना मुश्किल हो सकता है। यानी उपभोक्ताओं को सस्ती चीनी के लिए सामान्य पेराई सीजन के शुरू होने तक इंतजार करना पड़ सकता है।
आगे क्या होगा?
अब सरकार और चीनी उद्योग के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध करानी है, वहीं दूसरी तरफ समय से पहले पेराई शुरू करने के लिए मजदूरों और मशीनों की व्यवस्था करनी होगी।
अगर मजदूर नवंबर के पहले सप्ताह से पहले उपलब्ध नहीं होते हैं और मशीनों की संख्या भी सीमित रहती है, तो अक्टूबर में बड़े पैमाने पर पेराई शुरू करने की योजना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में चीनी की कीमतों में राहत के लिए सरकार को सप्लाई बढ़ाने के दूसरे विकल्पों पर भी ध्यान देना पड़ सकता है।
निष्कर्ष: चीनी की कीमतों को कम करने के लिए समय से पहले पेराई शुरू करने की सरकारी और उद्योग जगत की कोशिश फिलहाल व्यावहारिक चुनौतियों में फंसी नजर आ रही है। मजदूरों की कमी और सीमित मशीनरी के कारण अक्टूबर में बड़े पैमाने पर पेराई शुरू नहीं हुई तो बाजार में अतिरिक्त चीनी की सप्लाई आने में देरी होगी और सस्ती चीनी का इंतजार बढ़ सकता है।


