Sharmila Tagore-Kangana Ranaut: ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाने को लेकर जारी बहस अब बॉलीवुड की दो दिग्गज अभिनेत्रियों तक पहुंच गई है। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने कविता के शुरुआती दो पदों को ही गाने की बात कही, जबकि बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने इस विचार पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कंगना ने कहा कि कविता को धार्मिक नजरिए से देखने के बजाय उसके काव्यात्मक और प्रतीकात्मक अर्थ को समझना चाहिए।
‘वंदे मातरम’ के छह पदों को लेकर क्या है विवाद?
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ‘वंदे मातरम’ में कुल छह पद हैं। मौजूदा समय में आम तौर पर इसके शुरुआती दो पद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों और आधिकारिक अवसरों पर गाए जाते हैं।
विवाद इस बात को लेकर है कि क्या राष्ट्रगीत के सभी छह पदों को गाया जाना चाहिए या सिर्फ शुरुआती दो पदों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। कविता के बाद के पदों में दुर्गा और काली जैसे हिंदू देवी-देवताओं तथा धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख मिलता है।
इसी संदर्भ में अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने शुरुआती दो पदों को ही गाने का समर्थन किया है।
शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?
IANS को दिए एक इंटरव्यू में शर्मिला टैगोर ने कहा कि भारत एक विविध धार्मिक देश है। उनके मुताबिक देश में ऐसे लोग भी हैं जो एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हैं और कई देवी-देवताओं के नाम वाले अंशों को गाने में असहज महसूस कर सकते हैं।
उन्होंने इसी वजह से ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो पदों को सभी समुदायों के लिए अधिक स्वीकार्य विकल्प बताया। उनका तर्क था कि यदि उद्देश्य देश के अलग-अलग धार्मिक समुदायों को साथ लेकर चलना है, तो ऐसे शब्दों से बचना चाहिए जिन्हें कोई समुदाय धार्मिक रूप से स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करे।
कंगना रनौत ने दिया तीखा जवाब
शर्मिला टैगोर के बयान पर कंगना रनौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज के जरिए प्रतिक्रिया दी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह शर्मिला टैगोर का व्यक्तिगत रूप से सम्मान करती हैं और उन्हें पसंद करती हैं।
कंगना ने कविता के शब्दों को शाब्दिक धार्मिक अर्थ में देखने पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि कविता, गीत और साहित्य में रूपक, प्रतीक और कल्पना का इस्तेमाल भावनात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए किया जाता है।
कंगना के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ में शक्ति और देवी के संदर्भ को उस दौर के स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में समझना चाहिए। उनका मानना है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इन प्रतीकों के जरिए लोगों के भीतर देश के लिए साहस और शक्ति की भावना जगाने की कोशिश की थी।
‘शक्ति’ का उदाहरण देकर समझाया मतलब
कंगना ने अपनी बात समझाने के लिए स्वामी विवेकानंद के विचारों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति या विचार को ‘शक्ति’ के रूपक से जोड़ा जाता है तो उसका मतलब हमेशा किसी धार्मिक क्रिया से नहीं होता।
उन्होंने इसी तरह ‘वंदे मातरम’ में देवी-देवताओं के संदर्भ को भी राष्ट्र और मातृभूमि की शक्ति के प्रतीक के तौर पर देखने की बात कही।
कंगना ने शर्मिला टैगोर से हिंदू-मुस्लिम के नजरिए से आगे बढ़कर कविता को समझने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के बावजूद लोगों को एक-दूसरे को अपनाने और साथ खड़े होने की जरूरत है।
‘वंदे मातरम’ पर क्यों होती रही है बहस?
‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ी रचना है। इसे लेकर समय-समय पर धार्मिक प्रतीकों, इसके कुछ अंशों और सार्वजनिक रूप से इसके गायन को लेकर बहस होती रही है।
इस विवाद में एक पक्ष का तर्क है कि शुरुआती दो पद अपेक्षाकृत अधिक समावेशी हैं और इन्हें सभी समुदाय आसानी से अपना सकते हैं। दूसरी ओर, दूसरा पक्ष मानता है कि पूरी रचना को उसके ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए और बाद के पदों में मौजूद देवी-देवताओं के उल्लेख को धार्मिक आदेश के रूप में नहीं समझना चाहिए।
शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत की हालिया टिप्पणियों ने इसी पुराने विवाद को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। दोनों अभिनेत्रियों का नजरिया अलग है, लेकिन बहस का केंद्र यही सवाल है कि ‘वंदे मातरम’ को धार्मिक प्रतीकों के आधार पर देखा जाए या स्वतंत्रता आंदोलन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में।


