नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार (Share Market) के लिए बीते कुछ दिनों में माहौल तेजी से बदला है। लंबे समय तक लगातार बिकवाली करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अब एक बार फिर भारतीय बाजार की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट और एशियाई बाजारों में बढ़ती अस्थिरता मानी जा रही है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले नौ कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों के रुख में आया बदलाव आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। हालांकि अभी खरीदारी का स्तर सीमित है, लेकिन लगातार बिकवाली का सिलसिला थमता दिखाई दे रहा है।
9 कारोबारी दिनों में बदला निवेशकों का मूड
शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 15 जून से 25 जून के बीच हुए 9 कारोबारी सत्रों में से 5 दिन FIIs कैश मार्केट में खरीदार रहे। इससे पहले विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव दर्शाता है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे भारतीय इक्विटी बाजार पर फिर से मजबूत हो रहा है। अगर आने वाले दिनों में वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो विदेशी निवेश में और तेजी देखने को मिल सकती है।
रुपये की मजबूती बनी सबसे बड़ा सहारा
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी.के. विजयकुमार के मुताबिक विदेशी निवेशकों के रुख में बदलाव की सबसे बड़ी वजह भारतीय रुपये की मजबूती है।
कुछ समय पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर करीब 96.96 प्रति डॉलर तक पहुंच गया था। लेकिन अब इसमें उल्लेखनीय सुधार हुआ है और यह करीब 94.40 प्रति डॉलर के स्तर तक मजबूत हो चुका है।
जब किसी देश की मुद्रा मजबूत होती है तो विदेशी निवेशकों को करेंसी लॉस का जोखिम कम हो जाता है। ऐसे में वे उस बाजार में निवेश बनाए रखना ज्यादा पसंद करते हैं।
एशियाई बाजारों की कमजोरी से भारत को मिला फायदा
दूसरा बड़ा कारण दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे एशियाई शेयर बाजारों में बढ़ती अस्थिरता है।
हाल के दिनों में इन बाजारों में तेज गिरावट दर्ज की गई। दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में एक दिन लगभग 8 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली, जिसके कारण ट्रेडिंग अस्थायी रूप से रोकनी पड़ी।
ऐसे माहौल में विदेशी निवेशकों ने वहां मुनाफावसूली कर पूंजी निकालनी शुरू की और भारत को अपेक्षाकृत स्थिर एवं बेहतर निवेश विकल्प के रूप में देखना शुरू किया।
सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए बड़ी राहत
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट हमेशा सकारात्मक मानी जाती है। हाल ही में ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने के बाद भारत को बड़ी राहत मिली है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल सस्ता होने से:
- आयात बिल कम होता है।
- चालू खाते के घाटे पर दबाव घटता है।
- महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
- रुपये को मजबूती मिलती है।
- कंपनियों की लागत कम होती है।
इन सभी कारणों का सीधा असर शेयर बाजार की धारणा पर पड़ता है।
भुगतान संतुलन की चिंता हुई कम
विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल में गिरावट से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP) पर बना दबाव भी काफी हद तक कम हुआ है।
यही वजह है कि विदेशी निवेशक अब भारतीय बाजार को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और आकर्षक मान रहे हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भी बढ़ा भरोसा
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बनी सकारात्मक उम्मीदों ने भी निवेशकों का विश्वास मजबूत किया है।
यदि दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौता आगे बढ़ता है तो इसका फायदा भारतीय निर्यात, विनिर्माण और कई सूचीबद्ध कंपनियों को मिल सकता है। यही उम्मीद बाजार में सकारात्मक माहौल बनाने में मदद कर रही है।
आगे क्या रहेगा निवेशकों का रुख?
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल विदेशी निवेशकों की वापसी शुरुआती चरण में है। यदि:
- रुपया मजबूत बना रहता है,
- कच्चा तेल नियंत्रित स्तर पर रहता है,
- वैश्विक बाजारों में अस्थिरता कम होती है,
- और भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत रहती है,
तो आने वाले महीनों में विदेशी निवेश का प्रवाह और बढ़ सकता है।
हालांकि वैश्विक ब्याज दरों, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
निष्कर्ष
भारतीय शेयर बाजार के लिए हालिया घटनाक्रम सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। मजबूत रुपया, सस्ता कच्चा तेल, एशियाई बाजारों में कमजोरी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की उम्मीद ने विदेशी निवेशकों का भरोसा फिर से बढ़ाया है। हालांकि अभी खरीदारी सीमित है, लेकिन लगातार बिकवाली का दौर थमता दिख रहा है। यदि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहती हैं तो आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार को विदेशी निवेश का और अधिक समर्थन मिल सकता है।


