नई दिल्ली: नई कार खरीदने के बाद ज्यादातर लोग उसे सीधे घर ले जाने की जल्दी में होते हैं। लेकिन अगर वाहन का रजिस्ट्रेशन पूरा नहीं हुआ है तो यह जल्दबाजी आपको लाखों रुपये का नुकसान करा सकती है। राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि बिना वैध रजिस्ट्रेशन के सड़क पर वाहन चलाने की स्थिति में इंश्योरेंस कंपनी क्लेम देने से इनकार कर सकती है। हालांकि अगर डीलर की लापरवाही साबित होती है तो उसे भी नुकसान की भरपाई करनी होगी।
राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग ने जयपुर के के.एस. मोटर्स को ग्राहक को 3.07 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि डीलर ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी किए बिना नई कार ग्राहक को सौंपकर कानून का उल्लंघन किया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला नवंबर 2016 का है। हनुमानगढ़ निवासी श्रवण राम ने जयपुर स्थित के.एस. मोटर्स से करीब 7 लाख रुपये में महिंद्रा की नई कार खरीदी थी। ग्राहक ने वाहन की कीमत के साथ-साथ रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी राशि भी जमा कर दी थी।
कार की डिलीवरी लेने के बाद जब वह अपने घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में वाहन का गंभीर एक्सीडेंट हो गया। हादसे में कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हालांकि किसी व्यक्ति को चोट नहीं आई।
इसके बाद ग्राहक ने बीमा कंपनी से क्लेम किया, लेकिन कंपनी ने दावा खारिज कर दिया।
इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम क्यों ठुकराया?
बीमा कंपनी ने जांच में पाया कि दुर्घटना के समय वाहन का न तो स्थायी (Permanent) और न ही अस्थायी (Temporary) रजिस्ट्रेशन हुआ था।
यानी वाहन बिना वैध रजिस्ट्रेशन के सार्वजनिक सड़क पर चलाया जा रहा था। इसे बीमा पॉलिसी की शर्तों का गंभीर उल्लंघन माना गया। इसी आधार पर इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम देने से इनकार कर दिया।
कार की मरम्मत का अनुमानित खर्च लगभग 8.38 लाख रुपये था, जबकि बीमित राशि (IDV) 6.15 लाख रुपये निर्धारित थी।
मामला पहुंचा उपभोक्ता आयोग
इंश्योरेंस क्लेम खारिज होने के बाद ग्राहक ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। जिला आयोग ने डीलर को जिम्मेदार ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया था।
इस आदेश के खिलाफ के.एस. मोटर्स ने राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की, लेकिन आयोग ने 22 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में डीलर की अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने डीलर को क्यों माना दोषी?
आयोग ने कहा कि वाहन डीलर ने ग्राहक से रजिस्ट्रेशन शुल्क लेने के बावजूद रजिस्ट्रेशन पूरा किए बिना वाहन की डिलीवरी कर दी।
यह सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स, 1989 के नियम 42 का सीधा उल्लंघन है।
नियम के अनुसार कोई भी डीलर वाहन का स्थायी या अस्थायी रजिस्ट्रेशन कराए बिना उसे ग्राहक को सार्वजनिक सड़क पर चलाने के लिए नहीं दे सकता।
आयोग ने कहा कि वाहन डीलर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
खरीदार भी पूरी तरह निर्दोष नहीं
राज्य आयोग ने यह भी माना कि ग्राहक की भी लापरवाही थी।
ग्राहक को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि वाहन का रजिस्ट्रेशन पूरा हो चुका है। बिना रजिस्ट्रेशन नंबर की पुष्टि किए सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाना भी नियमों के खिलाफ है।
इसी कारण आयोग ने दोनों पक्षों को आंशिक रूप से जिम्मेदार माना।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
राज्य उपभोक्ता आयोग ने जिला फोरम का फैसला बरकरार रखते हुए कहा कि—
- डीलर ग्राहक को बीमा राशि का 50% यानी लगभग 3.07 लाख रुपये देगा।
- इस राशि पर दुर्घटना की तारीख से भुगतान होने तक 9% सालाना ब्याज भी देना होगा।
- मानसिक प्रताड़ना के लिए 5,000 रुपये अलग से देने होंगे।
- मुकदमे के खर्च के रूप में 5,000 रुपये अतिरिक्त देने होंगे।
- बाकी 50% नुकसान ग्राहक स्वयं वहन करेगा क्योंकि उसने बिना रजिस्ट्रेशन वाहन चलाया।
नए वाहन खरीदारों के लिए बड़ा सबक
यह फैसला हर नए वाहन खरीदार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर लोग शोरूम से गाड़ी मिलते ही उसे सीधे सड़क पर लेकर निकल जाते हैं, लेकिन अगर वाहन का अस्थायी या स्थायी रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है तो यह कानूनी जोखिम बन सकता है।
ऐसी स्थिति में दुर्घटना होने पर बीमा कंपनी क्लेम देने से इनकार कर सकती है और लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नई कार खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
नई कार की डिलीवरी लेने से पहले इन बातों की पुष्टि जरूर करें—
- वाहन का टेंपरेरी या परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर जारी हो चुका हो।
- इंश्योरेंस पॉलिसी पूरी तरह एक्टिव हो।
- रजिस्ट्रेशन से जुड़े सभी दस्तावेज अपने पास रखें।
- डिलीवरी चेकलिस्ट पर हस्ताक्षर करने से पहले सभी कागजात जांच लें।
- बिना वैध रजिस्ट्रेशन वाहन को सार्वजनिक सड़क पर बिल्कुल न चलाएं।
निष्कर्ष
राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग का यह फैसला वाहन डीलरों और ग्राहकों दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। डीलर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी किए बिना वाहन नहीं सौंप सकते, वहीं ग्राहकों की भी जिम्मेदारी है कि वे सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही नई गाड़ी सड़क पर लेकर निकलें। थोड़ी सी लापरवाही लाखों रुपये के इंश्योरेंस क्लेम को खतरे में डाल सकती है।


