Share Market New Rule: अगर आपके पोर्टफोलियो में ऐसे शेयर हैं जिन्हें आप लंबे समय तक होल्ड करना चाहते हैं, तो उन्हें बेचे बिना भी अतिरिक्त कमाई का मौका मिल सकता है। इसके लिए शेयर बाजार में Securities Lending and Borrowing (SLB) व्यवस्था पहले से मौजूद है। अब इसमें एक नया शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट शुरू होने जा रहा है, जिसके तहत निवेशक महज कुछ दिनों के लिए अपने शेयर उधार देकर लेंडिंग फीस कमा सकेंगे।
NSE Clearing Limited 17 अगस्त 2026 से SLB स्कीम के तहत R3 सीरीज के नए कॉन्ट्रैक्ट शुरू करने जा रहा है। इस नए सिस्टम में शेयर लेंडिंग ट्रांजैक्शन का रिवर्स सेटलमेंट T+3 दिन पर होगा। खास बात यह है कि ये कॉन्ट्रैक्ट हर कारोबारी दिन उपलब्ध होंगे और केवल उन्हीं शेयरों में लागू होंगे जो इक्विटी डेरिवेटिव्स यानी F&O सेगमेंट में ट्रेडिंग के लिए पात्र हैं।
इस बदलाव से उन निवेशकों और ट्रेडर्स को फायदा हो सकता है जिन्हें लंबे समय के बजाय सिर्फ कुछ दिनों के लिए शेयर उधार लेने या देने की जरूरत होती है।
क्या है NSE Clearing का नया R3 कॉन्ट्रैक्ट?
SLB यानी Securities Lending and Borrowing Mechanism के तहत शेयर रखने वाला निवेशक अपनी सिक्योरिटीज को एक निश्चित अवधि के लिए दूसरे मार्केट पार्टिसिपेंट को उधार दे सकता है। बदले में उसे इसके लिए लेंडिंग फीस मिलती है।
अब NSE Clearing ने इसी व्यवस्था में कम अवधि वाला R3 कॉन्ट्रैक्ट पेश किया है। इसका उद्देश्य शॉर्ट-टर्म सिक्योरिटीज लेंडिंग और बॉरोइंग को आसान बनाना है।
नए सिस्टम में अगर किसी कारोबारी दिन यानी T Day पर SLB ट्रांजैक्शन किया जाता है, तो उसका पहला हिस्सा T+1 दिन पर सेटल होगा। वहीं इससे जुड़ा रिवर्स हिस्सा यानी शेयरों की वापसी T+3 दिन पर होगी। यहां सेटलमेंट हॉलिडे को शामिल नहीं किया जाएगा।
इसका सीधा मतलब है कि जिन ट्रेडर्स को किसी शेयर की जरूरत सिर्फ कुछ दिनों के लिए है, उन्हें लंबे समय के SLB कॉन्ट्रैक्ट में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
किन शेयरों को किराए पर दिया जा सकेगा?
R3 सीरीज के कॉन्ट्रैक्ट सभी शेयरों के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। NSE Clearing के अनुसार, इस सुविधा के तहत केवल वे शेयर पात्र होंगे जो इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट यानी F&O सेगमेंट में ट्रेडिंग के लिए एलिजिबल हैं।
इसलिए किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में शेयर मौजूद होने मात्र से यह जरूरी नहीं है कि वह उसे R3 कॉन्ट्रैक्ट के तहत लेंड कर पाएगा। शेयर का संबंधित डेरिवेटिव्स सेगमेंट में पात्र होना जरूरी होगा।
यह व्यवस्था खास तौर पर उन शेयरों में उपयोगी हो सकती है जिनमें शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग और शॉर्ट सेलिंग की गतिविधियां ज्यादा होती हैं।
कैसे काम करेगा शेयर को किराए पर देने का सिस्टम?
मान लीजिए किसी निवेशक के पास F&O सेगमेंट का कोई शेयर है और वह उसे लंबे समय तक अपने पास रखना चाहता है। उसे शेयर बेचने की जरूरत नहीं है। वह SLB के जरिए उस शेयर को एक निश्चित अवधि के लिए किसी दूसरे मार्केट पार्टिसिपेंट को उधार दे सकता है।
इसके बदले उसे लेंडिंग फीस मिलती है।
दूसरी तरफ, किसी ट्रेडर को अगर कुछ दिनों के लिए उसी शेयर की जरूरत है, तो वह SLB के जरिए शेयर उधार ले सकता है। इसके लिए उसे संबंधित फीस चुकानी होती है।
इस तरह इसमें दो पक्ष होते हैं—
- Lender: शेयर उधार देने वाला निवेशक
- Borrower: शेयर उधार लेने वाला ट्रेडर
- Lending Fee: शेयर उधार देने के बदले मिलने वाली फीस
- Collateral: लेनदेन में जोखिम को नियंत्रित करने के लिए जरूरी सुरक्षा व्यवस्था
- Clearing Corporation: ट्रांजैक्शन, सेटलमेंट और जोखिम प्रबंधन की व्यवस्था संभालने वाली संस्था
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि लंबी अवधि के निवेशक अपने शेयर बेचे बिना उनसे अतिरिक्त आय हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
T+1 और T+3 सेटलमेंट को आसान भाषा में समझें
R3 कॉन्ट्रैक्ट की सबसे अहम बात इसका सेटलमेंट स्ट्रक्चर है।
अगर किसी निवेशक ने सोमवार को SLB ट्रांजैक्शन किया, तो उसका शुरुआती हिस्सा अगले कारोबारी दिन यानी T+1 पर सेटल होगा। वहीं रिवर्स ट्रांजैक्शन के तहत शेयरों की वापसी T+3 पर होगी।
इसका अर्थ है कि R3 कॉन्ट्रैक्ट में शेयरों की वापसी कम अवधि में हो जाती है। हालांकि वास्तविक कैलेंडर में बाजार की छुट्टियों के कारण तारीख बदल सकती है।
यही वजह है कि यह कॉन्ट्रैक्ट खास तौर पर उन मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए उपयोगी हो सकता है जिन्हें बहुत कम समय के लिए शेयर उधार लेने की आवश्यकता होती है।
पुराने SLB कॉन्ट्रैक्ट से कैसे अलग है R3?
मौजूदा SLB व्यवस्था की तुलना में R3 कॉन्ट्रैक्ट का सबसे बड़ा अंतर इसकी कम अवधि है। नए कॉन्ट्रैक्ट को शॉर्ट-टर्म जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
R3 कॉन्ट्रैक्ट में कुछ महत्वपूर्ण नियम इस प्रकार हैं—
- ट्रांजैक्शन T Day पर किया जाएगा।
- पहला हिस्सा T+1 पर सेटल होगा।
- रिवर्स हिस्सा T+3 पर सेटल होगा।
- सेटलमेंट हॉलिडे को T+3 की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।
- R3 कॉन्ट्रैक्ट हर कारोबारी दिन उपलब्ध होंगे।
- सिर्फ F&O में पात्र शेयरों पर यह सुविधा मिलेगी।
- इन कॉन्ट्रैक्ट्स में repayment, recall और rollover की सुविधा नहीं होगी।
इसके अलावा AGM यानी Annual General Meeting या EGM यानी Extraordinary General Meeting होने की स्थिति में R3 कॉन्ट्रैक्ट को समय से पहले बंद नहीं किया जाएगा।
निवेशकों के लिए क्या है फायदा?
अगर किसी निवेशक के पास लंबे समय के नजरिए से कोई शेयर है और वह उसे बेचना नहीं चाहता, तो SLB एक अतिरिक्त कमाई का विकल्प बन सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी निवेशक ने किसी कंपनी के शेयर लंबे समय के लिए खरीदे हैं। अगर उस शेयर की SLB मार्केट में मांग है, तो निवेशक उसे कुछ समय के लिए उधार देकर लेंडिंग फीस हासिल कर सकता है।
इस तरह शेयर की कीमत बढ़ने पर मिलने वाले संभावित फायदे के अलावा निवेशक को लेंडिंग फीस से अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है।
हालांकि यह कमाई गारंटीड नहीं होती। शेयर को उधार देने से पहले बाजार में उसकी मांग, उपलब्ध लेंडिंग रेट और संबंधित जोखिमों को समझना जरूरी है।
ट्रेडर्स के लिए भी क्यों महत्वपूर्ण है R3?
SLB का इस्तेमाल सिर्फ शेयरधारकों के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रेडर्स के लिए भी महत्वपूर्ण है।
कई बार किसी ट्रेडर को किसी शेयर में शॉर्ट पोजीशन लेने या अपनी ट्रेडिंग रणनीति पूरी करने के लिए शेयरों की जरूरत होती है। ऐसे में शेयर खरीदकर रखने के बजाय वह SLB के माध्यम से उन्हें उधार ले सकता है।
R3 कॉन्ट्रैक्ट की कम अवधि ऐसे ट्रेडर्स के लिए उपयोगी हो सकती है जिन्हें केवल कुछ दिनों के लिए सिक्योरिटीज की जरूरत होती है।
इससे शॉर्ट-टर्म बॉरोइंग की जरूरत को लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट के मुकाबले ज्यादा लचीले तरीके से मैनेज किया जा सकता है।
क्या शेयर किराए पर देने का मतलब शेयर बेचना है?
नहीं। SLB में शेयर बेचा नहीं जाता, बल्कि एक तय अवधि के लिए उधार दिया जाता है।
निवेशक शेयर का मालिक बना रहता है, जबकि निर्धारित नियमों के तहत दूसरा मार्केट पार्टिसिपेंट उस सिक्योरिटी को कुछ समय के लिए उधार लेता है।
यानी लंबी अवधि के निवेशक के लिए इसका मूल विचार यह है कि वह अपनी होल्डिंग को बनाए रखते हुए उपलब्ध SLB अवसर के जरिए अतिरिक्त आय हासिल कर सके।
हालांकि निवेशकों को यह समझना चाहिए कि SLB एक मार्केट व्यवस्था है और इसमें नियम, फीस, उपलब्धता तथा संबंधित जोखिम लागू होते हैं।
SLBM क्या है?
Securities Lending and Borrowing Mechanism (SLBM) शेयर बाजार की ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक निवेशक अपनी सिक्योरिटीज को दूसरे मार्केट पार्टिसिपेंट को तय अवधि के लिए उधार दे सकता है।
शेयर उधार देने वाले निवेशक को इसके बदले लेंडिंग फीस मिलती है। दूसरी तरफ, शेयर उधार लेने वाला ट्रेडर निर्धारित नियमों के तहत उस सिक्योरिटी का इस्तेमाल करता है।
एक्सचेंज और क्लियरिंग कॉरपोरेशन इस प्रक्रिया में ट्रांजैक्शन मैचिंग, कोलेटरल, सेटलमेंट और रिस्क मैनेजमेंट जैसी व्यवस्थाओं को संभालते हैं।
R3 सिस्टम क्यों लाया जा रहा है?
बाजार में हर ट्रेडर या निवेशक की सिक्योरिटीज लेंडिंग की जरूरत एक जैसी नहीं होती। कुछ मामलों में लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट की जरूरत होती है, जबकि कुछ ट्रेडर्स को सिर्फ कुछ कारोबारी दिनों के लिए शेयर चाहिए होते हैं।
R3 कॉन्ट्रैक्ट इसी शॉर्ट-टर्म जरूरत को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। इससे SLB मार्केट में कम अवधि वाले बॉरोइंग और लेंडिंग ट्रांजैक्शन के लिए एक अलग विकल्प उपलब्ध होगा।
इससे बाजार सहभागियों को अपनी जरूरत के हिसाब से कॉन्ट्रैक्ट चुनने में ज्यादा लचीलापन मिल सकता है।
ध्यान रखें: शेयर किराए पर देना भी पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं
SLB से लेंडिंग फीस मिलने का मौका जरूर है, लेकिन इसे गारंटीड इनकम या बिना जोखिम वाली कमाई नहीं समझना चाहिए।
किसी शेयर को लेंड करने से पहले निवेशक को यह देखना चाहिए कि संबंधित सिक्योरिटी SLB के लिए पात्र है या नहीं, उसकी लेंडिंग डिमांड कितनी है और उपलब्ध फीस कितनी है। साथ ही संबंधित ब्रोकर और एक्सचेंज के नियमों को समझना भी जरूरी है।
निष्कर्ष: NSE Clearing का R3 कॉन्ट्रैक्ट SLB बाजार में शॉर्ट-टर्म शेयर लेंडिंग और बॉरोइंग का नया विकल्प लेकर आ रहा है। 17 अगस्त से शुरू होने वाली यह सुविधा F&O सेगमेंट के पात्र शेयरों पर लागू होगी। इसमें ट्रांजैक्शन का शुरुआती हिस्सा T+1 और रिवर्स हिस्सा T+3 पर सेटल होगा। ऐसे निवेशक जो अपने शेयर बेचना नहीं चाहते, लेकिन उपलब्ध अवसर के आधार पर उनसे अतिरिक्त लेंडिंग आय हासिल करना चाहते हैं, उनके लिए यह सिस्टम उपयोगी हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचना और शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। शेयर बाजार में निवेश और ट्रेडिंग बाजार जोखिमों के अधीन हैं। SLB में भी जोखिम और अलग-अलग नियम लागू होते हैं। किसी भी निवेश या ट्रेडिंग निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लें। NewsJagran.in किसी शेयर या सिक्योरिटी को खरीदने, बेचने या लेंड करने की सलाह नहीं देता है।


