SEBI Rules Impact:
भारतीय शेयर बाजार को ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और कम सट्टेबाजी वाला बनाने के लिए SEBI ने पिछले कुछ समय में डेरिवेटिव्स और ट्रेडिंग से जुड़े कई अहम नियम बदले हैं। इनका मकसद रिटेल निवेशकों को अत्यधिक जोखिम से बचाना, लेवरेज घटाना और बाजार में रिस्क मैनेजमेंट मजबूत करना था। हालांकि, इन नियमों का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कुछ बदलावों से जहां अत्यधिक सट्टेबाजी कम हुई, वहीं छोटे निवेशकों के लिए मार्केट एक्सेस और कुछ ट्रेडिंग रणनीतियों की गुंजाइश भी कम हुई है।
SEBI की वित्त वर्ष 2026 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, इक्विटी डेरिवेटिव्स में ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स 51.5% और फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स 17.7% घटे। वहीं, ब्रोकरेज फर्म सैम्को सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी का मानना है कि रेगुलेशन का उद्देश्य सही है, लेकिन इसके साथ मार्केट की एफिशिएंसी, लिक्विडिटी और निवेशकों के लिए फेयर एक्सेस को भी बनाए रखना जरूरी है।
आइए समझते हैं ऐसे 4 बड़े SEBI नियम, जिनका रिटेल निवेशकों और डेरिवेटिव्स मार्केट पर खासा असर पड़ा है।
1. F&O पर सख्ती: सट्टेबाजी घटी, लेकिन रिटेल भागीदारी भी कम हुई
SEBI ने इक्विटी डेरिवेटिव्स यानी Futures & Options में जोखिम घटाने के लिए कई बदलाव किए। इनमें कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाना, वीकली एक्सपायरी की संख्या कम करना, एक्सपायरी के दिन रिस्क कवर बढ़ाना, ऑप्शन प्रीमियम का अग्रिम भुगतान और पोजिशन लिमिट की इंट्रा-डे मॉनिटरिंग जैसे कदम शामिल हैं।
इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य छोटे निवेशकों को अत्यधिक शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग और बड़े नुकसान से बचाना था।
आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2026 में F&O में रिटेल निवेशकों का कुल नुकसान 18% घटकर करीब ₹91,685 करोड़ रह गया। लेकिन इसी अवधि में F&O में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी भी लगभग 20% घटकर 78.6 लाख रह गई।
यहां एक दिलचस्प पहलू यह है कि कुल नुकसान कम होने के बावजूद प्रति ट्रेडर औसत नुकसान ₹1.14 लाख से बढ़कर ₹1.17 लाख हो गया।
यानी नियमों से बाजार में सक्रिय रिटेल ट्रेडर्स की संख्या कम हुई, लेकिन बचे हुए ट्रेडर्स के बीच जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
2. लॉट साइज बढ़ा: जोखिम कम करने के साथ एंट्री बैरियर भी बढ़ा


डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट की न्यूनतम वैल्यू बढ़ाने का मकसद छोटे निवेशकों को बहुत बड़ी स्पेक्यूलेटिव पोजिशन लेने से रोकना था। यह कदम रिस्क कंट्रोल के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।
लेकिन F&O सिर्फ सट्टेबाजी का जरिया नहीं है। कई निवेशक इसका इस्तेमाल हेजिंग के लिए भी करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी निवेशक के पास कैश मार्केट में बड़ी शेयर होल्डिंग है तो वह डेरिवेटिव्स के जरिए अपने पोर्टफोलियो के कुछ जोखिम को हेज कर सकता है।
लॉट साइज बढ़ने का मतलब है कि ऐसी हेजिंग रणनीति के लिए भी ज्यादा पूंजी की आवश्यकता हो सकती है। छोटे निवेशकों के लिए यह अतिरिक्त पूंजी एक बड़ी बाधा बन सकती है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जोखिम कम हुआ या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या सही तरीके से जोखिम मैनेज करने वाले निवेशकों के लिए बाजार तक पहुंच जरूरत से ज्यादा महंगी हो गई है?
3. एक्सपायरी और मार्जिन नियम: बदलीं पुरानी ट्रेडिंग रणनीतियां
SEBI ने एक्सपायरी के समय उपलब्ध कुछ मार्जिन बेनेफिट्स को हटाया और वीकली इंडेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों में बदलाव किया।
इसका उद्देश्य एक्सपायरी के आसपास बनने वाली अत्यधिक जोखिम वाली पोजिशन और बाजार में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना था।
हालांकि, इसका असर उन ट्रेडर्स और हेजर्स पर भी पड़ा जो लंबे समय से एक्सपायरी आधारित रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहे थे। उन्हें अपनी ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी में बदलाव करना पड़ा।
SEBI की 2025 की स्टडी के मुताबिक, इक्विटी डेरिवेटिव्स में यूनिक इंडिविजुअल ट्रेडर्स की संख्या सालाना आधार पर करीब 20% घटी, जबकि प्रीमियम के आधार पर इंडिविजुअल टर्नओवर में करीब 11% की कमी आई।
इससे संकेत मिलता है कि नियमों ने सिर्फ अत्यधिक सट्टेबाजी को कम नहीं किया, बल्कि डेरिवेटिव्स मार्केट में निवेशकों के व्यवहार और ट्रेडिंग पैटर्न को भी बदल दिया।
4. Closing Auction Session: बेहतर Price Discovery, लेकिन शुरुआत में बढ़ी चुनौती
3 अगस्त 2026 से F&O स्टॉक्स के लिए Closing Auction Session यानी CAS लागू किया गया। इसने पहले इस्तेमाल होने वाले 30 मिनट के VWAP आधारित क्लोजिंग सिस्टम की जगह ली।
इस बदलाव का उद्देश्य क्लोजिंग प्राइस की बेहतर खोज यानी Price Discovery करना और आखिरी समय में होने वाली ट्रेडिंग के प्रभाव को कम करना था। साथ ही, इसका एक उद्देश्य भारतीय बाजार की क्लोजिंग प्रक्रिया को वैश्विक बाजारों में इस्तेमाल होने वाली व्यवस्थाओं के ज्यादा करीब लाना भी था।
हालांकि शुरुआती कारोबारी सत्रों में स्पॉट और फ्यूचर्स कीमतों के बीच असामान्य अंतर देखने को मिला और शुरुआती चरण में बाजार भागीदारी भी सीमित रही।
SEBI की ओर से कहा गया कि शुरुआती गतिविधियों में किसी तरह की मैनिपुलेशन नहीं मिली और बाद में बाजार सहभागिता में सुधार हुआ।
यह मामला दिखाता है कि किसी रेगुलेटरी बदलाव का अंतिम उद्देश्य भले ही बाजार को बेहतर बनाना हो, लेकिन नए सिस्टम के शुरुआती दौर में ट्रेडर्स और निवेशकों को बदलाव के साथ तालमेल बिठाने में परेशानी हो सकती है।
SEBI के नियमों से आखिर कहां आई दिक्कत?
SEBI के लगातार कड़े होते नियमों का असर F&O गतिविधियों पर साफ दिखाई देता है। वित्त वर्ष 2026 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स में 51.5% और फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स में 17.7% की गिरावट आई।
इस गिरावट के पीछे केवल रेगुलेटरी बदलाव ही नहीं, बल्कि STT में बढ़ोतरी और अन्य बाजार परिस्थितियां भी जिम्मेदार रही हैं।
जिमीत मोदी के मुताबिक, स्पेक्यूलेशन कम होना अपने आप में सकारात्मक है, लेकिन अगर ट्रेडिंग वॉल्यूम इसलिए घटता है क्योंकि बाजार में प्रवेश करना बहुत महंगा या मुश्किल हो गया है, तो इसका असर लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी पर पड़ सकता है।
उनके नजरिए में रेगुलेशन का लक्ष्य बाजार को ऐसी सड़क बनाना होना चाहिए जो सुरक्षित हो, लेकिन इतनी खाली न हो जाए कि उसकी उपयोगिता ही कम हो जाए।
निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?
SEBI के इन बदलावों से एक बात स्पष्ट है कि रिटेल निवेशकों के लिए F&O ट्रेडिंग पहले की तुलना में ज्यादा नियमबद्ध और पूंजी-गहन हो गई है।
निवेशकों को अब खास तौर पर इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- केवल छोटे समय में मुनाफे के लिए F&O ट्रेडिंग न करें।
- कॉन्ट्रैक्ट साइज और मार्जिन जरूरतों को समझकर ही पोजिशन लें।
- हेजिंग और सट्टेबाजी के बीच अंतर समझें।
- एक्सपायरी आधारित रणनीति अपनाने से पहले नए नियमों की जानकारी रखें।
- अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार ही ट्रेडिंग करें।
जिमीत मोदी के मुताबिक, सिर्फ मार्केट में एंट्री के बैरियर बढ़ाने के बजाय बेहतर डिस्क्लोजर, निवेशक शिक्षा, suitability checks और risk-based safeguards पर भी जोर दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
SEBI के इन नियमों का मूल उद्देश्य रिटेल निवेशकों को अनियंत्रित जोखिम और भारी नुकसान से बचाना है। इस लिहाज से F&O गतिविधियों में कमी को पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। लेकिन दूसरी तरफ, लॉट साइज बढ़ने, मार्जिन नियमों में बदलाव और एक्सपायरी से जुड़े प्रतिबंधों ने कुछ निवेशकों के लिए बाजार में भागीदारी मुश्किल भी की है।
आगे चुनौती यह होगी कि निवेशक सुरक्षा और बाजार की लिक्विडिटी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक ऐसा बाजार जहां जोखिम नियंत्रित हो, लेकिन सही जानकारी और उचित रिस्क मैनेजमेंट के साथ निवेशकों के लिए पहुंच भी बनी रहे, लंबे समय में ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध जानकारी और एक्सपर्ट के विचारों पर आधारित है। शेयर बाजार और F&O में निवेश जोखिम के अधीन है। किसी भी निवेश या ट्रेडिंग का फैसला लेने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता का आकलन करें तथा जरूरत पड़ने पर SEBI-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार की सलाह लें।


