नई दिल्ली: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से रूस पर लगे प्रतिबंधों में कोई बड़ी राहत नहीं मिलने के बावजूद भारत के लिए रूसी कच्चा तेल (Russian Crude Oil) सबसे बड़ा सप्लाई स्रोत बना हुआ है। जुलाई 2026 में भी रूस से होने वाला क्रूड ऑयल आयात रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया है। अमेरिका-ईरान तनाव और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी तेल खरीद रणनीति को इस तरह तैयार किया है कि सप्लाई और कीमत दोनों का संतुलन बना रहे।
ग्लोबल रियल-टाइम डेटा और एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में अब तक भारत ने रूस से औसतन 24.5 लाख बैरल प्रतिदिन (BPD) कच्चा तेल आयात किया है। यह जून 2026 में दर्ज 26.4 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब है।
जुलाई में भारत के सबसे बड़े क्रूड ऑयल सप्लायर
जुलाई के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार भारत के प्रमुख तेल सप्लायर इस प्रकार हैं—
| देश | औसत सप्लाई (बैरल प्रतिदिन) |
|---|---|
| रूस | 24.5 लाख |
| संयुक्त अरब अमीरात (UAE) | 6.17 लाख |
| सऊदी अरब | 5.86 लाख |
इन आंकड़ों से साफ है कि रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, जबकि यूएई और सऊदी अरब दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।
प्रतिबंधों के बावजूद रूस कैसे बना नंबर-1?
रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध लागू होने के बाद भी भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिकी प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी चुनौतियों के बावजूद भारतीय रिफाइनर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और शिपिंग नेटवर्क के जरिए आयात बनाए रखने में सफल रहे।
उधर, अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जुड़े जोखिमों के बीच यूएई और सऊदी अरब ने भी वैकल्पिक शिपिंग मार्गों के जरिए भारत को तेल की आपूर्ति जारी रखी।
रूस ने और मजबूत की अपनी स्थिति
अमेरिका-ईरान तनाव शुरू होने के बाद पिछले करीब साढ़े चार महीनों में रूस ने भारत को लगभग 30 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति की है। इससे उसने भारत के सबसे बड़े तेल सप्लायर के रूप में अपनी बढ़त और मजबूत कर ली है।
इस दौरान मध्य पूर्व से भी पर्याप्त मात्रा में तेल आता रहा, लेकिन रूस की हिस्सेदारी सबसे अधिक बनी रही।
भारत की तेल खरीद रणनीति क्यों मानी जा रही है सफल?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने आयात स्रोतों में विविधता (Diversification) बनाए रखी है।
भारत एक साथ रूस, यूएई, सऊदी अरब, इराक और अब वेनेजुएला जैसे देशों से भी कच्चा तेल खरीद रहा है। इससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर भी देश की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित नहीं होती।
केप्लर के विश्लेषक ने क्या कहा?
केप्लर के प्रमुख विश्लेषक सुमित रिटोलिया के अनुसार, प्रमुख तेल आयातकों में भारत सबसे बेहतर स्थिति में रहा है। सक्रिय खरीद रणनीति और विभिन्न देशों से सप्लाई सुनिश्चित करने की नीति के कारण भारत ने वैश्विक संकट के दौरान भी कच्चे तेल का प्रवाह बनाए रखा।
उनका कहना है कि मध्य पूर्व में सप्लाई बाधाओं के बावजूद भारतीय रिफाइनर समय पर वैकल्पिक कार्गो हासिल करने में सफल रहे हैं, जिससे रिफाइनिंग लागत और उत्पादन दोनों संतुलित रहे।
वेनेजुएला की भी बढ़ी हिस्सेदारी
हाल के महीनों में वेनेजुएला ने भी भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाई है। अब यह भारत के शीर्ष पांच तेल सप्लायर देशों में शामिल हो चुका है। इससे भारत के आयात स्रोत और अधिक विविध हुए हैं।
2022 से पहले रूस की हिस्सेदारी कितनी थी?
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी केवल करीब 2% थी। लेकिन फरवरी 2022 के बाद रूस ने भारी डिस्काउंट पर तेल बेचना शुरू किया, जिसका भारतीय कंपनियों ने लाभ उठाया।
2023 से 2025 के बीच रूस भारत के लिए सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया और कई महीनों तक उसने देश के कुल आयात में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी बनाए रखी। उस समय रूसी तेल पर 15 से 30 डॉलर प्रति बैरल तक का डिस्काउंट भी मिल रहा था, जिससे भारतीय रिफाइनरों की लागत में उल्लेखनीय कमी आई।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
रूस से लगातार बड़ी मात्रा में कच्चा तेल मिलने का सबसे बड़ा फायदा भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मिलता है। सस्ते दाम पर तेल खरीदने से आयात बिल नियंत्रित रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है। हालांकि, भारत समानांतर रूप से मध्य पूर्व, अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी आयात बढ़ाकर अपनी ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है।


