नई दिल्ली। देश में भीषण गर्मी और लगातार बढ़ रही लू के बीच भारत की बिजली खपत और मांग ने नए रिकॉर्ड बना दिए हैं। मई 2026 में देश की कुल बिजली खपत 11.55 प्रतिशत बढ़कर 164.98 अरब यूनिट (BU) पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष मई 2025 में यह 147.89 अरब यूनिट थी। पीक आवर में बिजली की मांग भी बढ़कर 2.7082 लाख मेगावाट तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के 2.3099 लाख मेगावाट के मुकाबले काफी अधिक है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस समय देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है, उसी दौरान देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) का उत्पादन घट गया है। मई 2026 में कंपनी का उत्पादन 11.6 प्रतिशत घटकर 5.61 करोड़ टन रहा, जबकि मई 2025 में यह 6.35 करोड़ टन था। चूंकि भारत के कुल कोयला उत्पादन में कोल इंडिया की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत है, इसलिए इस गिरावट ने ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची बिजली की मांग
बिजली मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 18 मई से 21 मई 2026 के बीच लगातार चार दिनों तक बिजली की मांग नए रिकॉर्ड बनाती रही। 18 मई को मांग 2.57 लाख मेगावाट, 19 मई को 2.60 लाख मेगावाट, 20 मई को 2.65 लाख मेगावाट और 21 मई को 2.71 लाख मेगावाट तक पहुंच गई।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पूरे वर्ष 2026 के लिए अधिकतम बिजली मांग लगभग 2.71 लाख मेगावाट रहने का अनुमान लगाया था। लेकिन मई महीने में ही यह स्तर लगभग छू लिया गया, जिससे साफ संकेत मिलता है कि वास्तविक मांग सरकारी अनुमान से अधिक तेज गति से बढ़ रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती शहरी आबादी, एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों का बढ़ता उपयोग तथा लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव इस रिकॉर्ड मांग के प्रमुख कारण हैं।
आखिर इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है बिजली खपत?
देश के कई राज्यों में मई के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में लोगों ने गर्मी से राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य विद्युत उपकरणों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया।
इसके अलावा औद्योगिक गतिविधियों में तेजी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार ने भी बिजली की खपत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और बड़े वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों की ऊर्जा आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।
कोयला उत्पादन में गिरावट क्यों चिंता बढ़ा रही है?
भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्रों पर निर्भर है। देश में उत्पादित कुल बिजली का बड़ा हिस्सा थर्मल पावर प्लांट्स से आता है, जिनके लिए कोयला सबसे महत्वपूर्ण ईंधन है।
ऐसे समय में जब बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है, कोयला उत्पादन में गिरावट चिंता पैदा करती है। अप्रैल-मई 2026 के दौरान कोयला उत्पादन 10.6 प्रतिशत घटकर 11.22 करोड़ टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 12.56 करोड़ टन था।
कोल इंडिया की कई प्रमुख सहायक कंपनियों में भी उत्पादन घटा है। इनमें महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड, वेस्टर्न कोलफील्ड्स, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और ईस्टर्न कोलफील्ड्स शामिल हैं। केवल साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स में उत्पादन वृद्धि दर्ज की गई।
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून शुरू होने से पहले लगातार दो महीने तक उत्पादन में गिरावट भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है, क्योंकि सामान्यतः जुलाई से सितंबर के बीच बारिश के कारण कोयला उत्पादन प्रभावित होता है।
कोयला मंत्रालय क्यों नहीं मान रहा खतरा?
कोयला मंत्रालय का कहना है कि उत्पादन में कमी किसी संकट का संकेत नहीं है। मंत्रालय के अनुसार देश के ताप बिजली संयंत्रों के पास पर्याप्त कोयला भंडार मौजूद है और वर्तमान मांग को पूरा करने के लिए आपूर्ति पर्याप्त है।
सरकार का दावा है कि हाल के वर्षों में कोयला भंडारण क्षमता बढ़ाई गई है, जिससे अचानक मांग बढ़ने की स्थिति में भी बिजली संयंत्रों को ईंधन की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के कुछ जानकारों का मानना है कि यदि जून और जुलाई में भी बिजली मांग लगातार उच्च स्तर पर बनी रहती है, तो उत्पादन और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्या बढ़ सकती हैं बिजली कटौती?
केंद्र सरकार का कहना है कि देश में बिजली उपलब्धता पर्याप्त है, लेकिन कई राज्यों से स्थानीय स्तर पर बिजली कटौती की खबरें सामने आई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और कुछ छोटे शहरों में उपभोक्ताओं ने अनियमित बिजली आपूर्ति की शिकायतें भी की हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि अत्यधिक गर्मी का दौर लंबा चलता है और मांग लगातार बढ़ती रहती है, तो वितरण कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में लोड मैनेजमेंट या सीमित अवधि की बिजली कटौती की नौबत आ सकती है।
नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, फिर भी क्यों जरूरी है कोयला?
भारत तेजी से सौर और पवन ऊर्जा क्षमता बढ़ा रहा है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी को और बढ़ाना है। इसके बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में कोयला आधारित बिजली उत्पादन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।
सौर ऊर्जा केवल दिन के समय उपलब्ध होती है, जबकि पवन ऊर्जा मौसम और हवा की गति पर निर्भर करती है। दूसरी ओर थर्मल पावर प्लांट चौबीसों घंटे लगातार बिजली उपलब्ध करा सकते हैं।
इसी कारण जब बिजली मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती है, तब कोयला आधारित संयंत्र ही ग्रिड को स्थिर बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं।
आम लोगों और उद्योगों पर क्या होगा असर?
यदि बिजली मांग इसी तरह बढ़ती रही तो इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।
- कुछ क्षेत्रों में बिजली कटौती की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
- उद्योगों की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है।
- वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
- महंगी बिजली खरीदने की स्थिति में भविष्य में बिजली दरों पर असर पड़ सकता है।
- छोटे कारोबारों और ग्रामीण क्षेत्रों को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि फिलहाल सरकार और मंत्रालय दोनों का कहना है कि देश में बिजली और कोयले का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है तथा उपभोक्ताओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्ष
मई 2026 में भारत की बिजली मांग और खपत ने नए रिकॉर्ड स्थापित किए हैं। भीषण गर्मी के कारण ऊर्जा की आवश्यकता तेजी से बढ़ी है, जबकि दूसरी ओर देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी का उत्पादन घटा है। सरकार इसे चिंता का विषय नहीं मान रही और पर्याप्त भंडार होने का दावा कर रही है, लेकिन लगातार बढ़ती मांग और मानसून से पहले उत्पादन में गिरावट ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है।
आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ती बिजली मांग, कोयला आपूर्ति और नवीकरणीय ऊर्जा के बीच संतुलन किस तरह बनाए रखा जाता है। यही तय करेगा कि देश रिकॉर्ड गर्मी के इस दौर में बिना बड़े बिजली संकट के आगे बढ़ पाता है या नहीं।


