नई दिल्ली। भारत में करेंसी नोटों को लेकर जल्द बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में प्लास्टिक यानी पॉलीमर नोटों को शुरू करने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय बैंक की हालिया बोर्ड बैठकों में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई है और जल्द ही एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है। यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो भारतीय नागरिकों को पहली बार बड़े पैमाने पर प्लास्टिक के नोट इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा। यह बदलाव केवल नोटों की बनावट तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इससे सरकार की लागत, नकदी प्रबंधन व्यवस्था और नकली नोटों के खिलाफ लड़ाई पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
आखिर क्या होते हैं पॉलीमर नोट?
पॉलीमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत, टिकाऊ और सुरक्षित माने जाते हैं। इनमें कई आधुनिक सुरक्षा फीचर्स जोड़े जा सकते हैं जिन्हें नकली बनाना काफी मुश्किल होता है। दुनिया के कई देशों ने पिछले तीन दशकों में कागजी नोटों की जगह पॉलीमर नोटों को अपनाया है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, न्यूजीलैंड और रोमानिया जैसे देशों में यह प्रणाली सफलतापूर्वक लागू है।
RBI प्लास्टिक नोटों पर क्यों कर रहा विचार?
RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश में लगातार बढ़ती नकदी की मांग है। डिजिटल भुगतान में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद नकदी का उपयोग पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 15 मई 2026 तक देश में प्रचलन में मौजूद कुल नकदी (Currency in Circulation) बढ़कर लगभग 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 11.5 प्रतिशत अधिक है। जितनी अधिक नकदी बाजार में होगी, उतनी ही अधिक संख्या में नोट छापने पड़ेंगे। यही कारण है कि RBI और सरकार नोट छपाई की लागत कम करने के विकल्प तलाश रहे हैं।
नोट छापने पर कितना खर्च होता है?
RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने की लागत लगभग 6,372.8 करोड़ रुपये रही। एक वर्ष पहले यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी सिर्फ एक साल में नोट छपाई की लागत में 1,200 करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा बड़ी संख्या में पुराने और खराब नोटों को नष्ट करना भी महंगा और जटिल काम है। FY25 में लगभग 23.8 अरब रुपये मूल्य के खराब नोट नष्ट किए गए थे।
प्लास्टिक नोटों का सबसे बड़ा फायदा
पॉलीमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक समय तक चलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कागजी नोट औसतन 2 से 4 साल तक चलते हैं, पॉलीमर नोट 6 से 10 साल तक टिक सकते हैं, गंदे होने की संभावना कम होती है, पानी और नमी से कम प्रभावित होते हैं, जल्दी फटते नहीं हैं इससे बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम हो जाती है और सरकार का खर्च घट सकता है।
नकली नोटों पर भी लगेगी रोक?
भारत में नकली नोटों की समस्या लंबे समय से चुनौती बनी हुई है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, माइक्रो प्रिंटिंग, उन्नत होलोग्राम और अन्य सुरक्षा फीचर्स जोड़े जा सकते हैं। इन तकनीकों के कारण जाली नोट बनाना काफी कठिन हो जाता है। यही वजह है कि कई देशों ने नकली मुद्रा पर नियंत्रण के लिए पॉलीमर नोटों को अपनाया है।
2012 में क्यों फेल हो गया था प्रयोग?
भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2012 में तत्कालीन सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपये के पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना बनाई थी। हालांकि उस समय कई तकनीकी चुनौतियां सामने आई थीं। एटीएम मशीनें अनुकूल नहीं थीं, नोट गिनने वाली मशीनों में दिक्कतें आईं बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं था इन्हीं कारणों से परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
अब क्या बदला है?
पिछले एक दशक में भारत का बैंकिंग और भुगतान ढांचा काफी आधुनिक हो चुका है। आज अधिकांश एटीएम नई तकनीक से लैस हैं, करेंसी सॉर्टिंग मशीनें अधिक उन्नत हैं, बैंकिंग ऑटोमेशन तेजी से बढ़ा है, नकदी प्रबंधन प्रणाली पहले से बेहतर है इसी वजह से RBI दोबारा इस विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद कैश की मांग क्यों बढ़ रही है?
यह एक दिलचस्प सवाल है। UPI लेनदेन लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं, लेकिन नकदी की मांग भी बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी का उपयोग अभी भी अधिक है, छोटे व्यापारियों के बीच कैश लोकप्रिय है, आर्थिक अनिश्चितता के समय लोग नकदी रखना पसंद करते हैं, शादी और त्योहारों के दौरान नकदी की मांग बढ़ती है. यही कारण है कि डिजिटल क्रांति के बावजूद बाजार में नकदी की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
दुनिया के कौन-कौन से देश इस्तेमाल करते हैं प्लास्टिक नोट?
वर्तमान में लगभग 60 देशों में पॉलीमर नोट चल रहे हैं। कुछ प्रमुख उदाहरण:
| देश | शुरुआत |
|---|---|
| ऑस्ट्रेलिया | 1988 |
| कनाडा | 2011 |
| सिंगापुर | 1990 के दशक |
| न्यूजीलैंड | 1999 |
| रोमानिया | 1999 |
| वियतनाम | 2003 |
ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश था जिसने बड़े पैमाने पर पॉलीमर करेंसी अपनाई थी।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
यदि RBI पॉलीमर नोटों को मंजूरी देता है तो आम लोगों के लिए लेनदेन की प्रक्रिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। हालांकि कुछ फायदे मिल सकते हैं नोट जल्दी खराब नहीं होंगे, गंदे नोटों की समस्या कम होगी, नकली नोटों का जोखिम घटेगा, बैंकों और एटीएम में बेहतर गुणवत्ता वाली करेंसी उपलब्ध होगी. शुरुआती चरण में लोगों को नए नोटों की पहचान और उपयोग की जानकारी दी जा सकती है।
क्या भारत में जल्द आ जाएंगे प्लास्टिक नोट?
फिलहाल RBI की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स और बोर्ड बैठकों में हुई चर्चाओं से संकेत मिल रहे हैं कि केंद्रीय बैंक इस दिशा में गंभीरता से काम कर रहा है। संभावना है कि पहले सीमित स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाए। इसके परिणाम सफल रहने पर भविष्य में कुछ मूल्यवर्ग के नोटों को पॉलीमर स्वरूप में जारी किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, लेकिन नकदी की जरूरत अभी भी खत्म नहीं हुई है। बढ़ती छपाई लागत, खराब नोटों के निस्तारण का खर्च और नकली मुद्रा की चुनौती को देखते हुए पॉलीमर नोट RBI के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरे हैं। यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में भारतीयों के हाथों में प्लास्टिक के नोट दिखाई देना कोई बड़ी बात नहीं होगी।
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