Rameshwaram Cafe Success Story: कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर फिल्मों में अभिनेता बनने का सपना देखने वाले राघवेंद्र राव आज देश के सबसे तेजी से बढ़ते साउथ इंडियन फूड ब्रांड्स में से एक रामेश्वरम कैफे (Rameshwaram Cafe) के सह-संस्थापक हैं। एक्टिंग में सफलता नहीं मिली तो उन्होंने हार नहीं मानी। होटल में नौकरी की, दोस्तों से उधार लेकर छोटा-सा इडली-डोसा स्टॉल शुरू किया और आज उनका ब्रांड करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का रेवेन्यू करीब 17.8 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले करीब 62% अधिक है।
एक्टिंग के लिए छोड़ दी इंजीनियरिंग की पढ़ाई
राघवेंद्र राव को शुरुआती दिनों से ही फिल्मों में काम करने का शौक था। इसी जुनून में उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अभिनेता बनने का सपना लेकर वे मुंबई, चेन्नई और दिल्ली तक पहुंचे। कई वर्षों तक ऑडिशन दिए, लेकिन उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी।
इस दौरान रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए उन्होंने होटल और रेस्टोरेंट्स में नौकरी की। दिल्ली के प्रतिष्ठित ली मेरिडियन जैसे होटलों में भी उन्होंने काम किया, जिससे उन्हें फूड इंडस्ट्री की बारीकियां समझने का मौका मिला।
असफलता के बाद पूरी की इंजीनियरिंग
फिल्म इंडस्ट्री में करियर नहीं बन पाने के बाद राघवेंद्र राव वापस बेंगलुरु लौट आए। उन्होंने अपनी अधूरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और 2011 में डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने नौकरी करने के बजाय खुद का व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया।
दोस्तों से करीब 2 लाख रुपये उधार लेकर उन्होंने इडली और डोसा का एक छोटा आउटलेट शुरू किया। ग्राहकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला, लेकिन मुनाफा सीमित था। तभी उनकी मुलाकात दिव्या से हुई, जो आईआईएम ग्रेजुएट और चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। दोनों ने मिलकर एक बड़े फूड ब्रांड का सपना देखा और बाद में शादी भी कर ली।
700 वर्ग फीट की दुकान से शुरू हुआ सफर
साल 2021 में पति-पत्नी ने मिलकर बेंगलुरु के इंदिरानगर में लगभग 700 वर्ग फीट की जगह पर रामेश्वरम कैफे की शुरुआत की। शुरुआत से ही उन्होंने सीमित लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले मेन्यू पर फोकस किया। डोसा, इडली और वड़ा जैसी पारंपरिक साउथ इंडियन डिशेज को ताजा सामग्री, तेज सर्विस और प्रीमियम अनुभव के साथ ग्राहकों तक पहुंचाया गया।
यही रणनीति उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई और कुछ ही समय में कैफे के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगने लगीं।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जन्मस्थान से मिला नाम
कैफे का नाम रामेश्वरम रखने के पीछे भी एक खास सोच थी। यह नाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जन्मस्थान से प्रेरित है। संस्थापकों का मानना था कि यह नाम भारतीय संस्कृति, सादगी और भरोसे का प्रतीक बनेगा। समय के साथ यह ब्रांड पूरे देश में लोकप्रिय होता चला गया।
बिना बाहरी निवेश के बनाया बड़ा बिजनेस
रामेश्वरम कैफे की सबसे खास बात यह है कि कंपनी ने अपने विस्तार के लिए किसी बड़े बाहरी निवेशक से फंडिंग नहीं ली। बिजनेस को अपने मुनाफे के आधार पर आगे बढ़ाया गया। यही वजह है कि कंपनी पर निवेशकों का दबाव नहीं है और संस्थापकों का नियंत्रण पूरी तरह बरकरार है।
आज कंपनी रेस्टोरेंट संचालन के अलावा फ्रेंचाइजी और रॉयल्टी मॉडल से भी अच्छी कमाई कर रही है।
FY25 में 62% बढ़ा रेवेन्यू
वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का रेवेन्यू 17.8 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष FY24 में यह करीब 11 करोड़ रुपये था। यानी एक साल में कारोबार में लगभग 62% की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में कंपनी का मुनाफा भी करीब 2 करोड़ रुपये रहा।
अब मुंबई और दुबई पर नजर
बेंगलुरु में सफलता मिलने के बाद कंपनी ने हैदराबाद और मुंबई में भी अपने आउटलेट्स शुरू किए हैं। हाल ही में मुंबई के चर्चगेट स्थित इरोज बिल्डिंग में कंपनी ने अपना फ्लैगशिप आउटलेट खोला है। इसके अलावा कंपनी इस साल दुबई में भी अपना पहला अंतरराष्ट्रीय आउटलेट शुरू करने की तैयारी कर रही है।
सफलता की सबसे बड़ी सीख
राघवेंद्र राव की कहानी बताती है कि असफलता किसी सफर का अंत नहीं होती। एक्टिंग में करियर नहीं बना, लेकिन उसी संघर्ष ने उन्हें फूड इंडस्ट्री की समझ दी। सीमित पूंजी, स्पष्ट रणनीति और गुणवत्ता पर फोकस के दम पर उन्होंने एक ऐसा ब्रांड खड़ा किया, जिसकी पहचान आज देशभर में बन चुकी है।


