नई दिल्ली। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में राहत का इंतजार कर रहे करोड़ों लोगों की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है। इसकी वजह हैं अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump, जिनके बयानों ने वैश्विक तेल बाजार में फिर से अनिश्चितता पैदा कर दी है। एक तरफ वह ईरान के साथ शांति और तनाव कम करने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई के संकेत देकर बाजार की चिंताएं बढ़ा देते हैं।
कुछ दिन पहले अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की खबरों से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई थी। ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था। इससे उम्मीद जगी थी कि आने वाले समय में भारत समेत दुनिया के कई देशों में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम कम हो सकते हैं। लेकिन अब हालात फिर बदलते नजर आ रहे हैं।
शांति वार्ता पर संकट, फिर महंगा हुआ कच्चा तेल

ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित बातचीत को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण दोनों देशों के बीच वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी। इसका असर सीधे तेल बाजार पर पड़ा और ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया।
तेल बाजार में सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि तनाव फिर बढ़ता है तो प्रमुख समुद्री मार्गों पर सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इससे दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों में फिर उछाल आ सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल और गैस विदेशों से आयात करता है। इसमें भी 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई जैसे देश भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकता है।
यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति स्थापित होती है और सप्लाई सामान्य रहती है तो तेल की कीमतों में गिरावट संभव है। इसका फायदा भारत को भी मिल सकता है।
रिफाइंड उत्पादों की सप्लाई भी बनी चुनौती

सिर्फ कच्चे तेल की कीमतें ही चिंता का विषय नहीं हैं। पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और एलपीजी जैसे रिफाइंड उत्पादों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है।
कई खाड़ी रिफाइनरियों को हालिया संघर्षों के दौरान नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में उत्पादन क्षमता पूरी तरह बहाल होने में समय लग सकता है।
- एशियाई देशों में एलपीजी और नेफ्था की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
- यूरोप को डीजल और जेट फ्यूल की सप्लाई में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
- अमेरिका में पेट्रोल का स्टॉक सीमित होने से खुदरा कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
आखिर कब सस्ते होंगे पेट्रोल, डीजल और एलपीजी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत में आम लोगों को राहत कब मिलेगी। ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि सिर्फ एक-दो दिन के लिए कच्चा तेल सस्ता होने से पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं घटते।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बना रहता है और वैश्विक सप्लाई पूरी तरह सामान्य रहती है, तभी भारत में कीमतों में कटौती की संभावना बढ़ेगी।
सरकारी तेल विपणन कंपनियां अभी भी पुराने घाटों की भरपाई कर रही हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी गिरावट का फायदा तुरंत उपभोक्ताओं तक पहुंचने की उम्मीद कम है।
फिलहाल राहत की उम्मीद क्यों कमजोर?

तेल बाजार में अभी भी कई जोखिम बने हुए हैं। अमेरिका-ईरान संबंध, मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति, रिफाइनरियों की उत्पादन क्षमता और वैश्विक मांग जैसे कारक कीमतों की दिशा तय करेंगे।
यही वजह है कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में तत्काल बड़ी राहत मिलने की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है। जब तक कच्चा तेल लगातार सस्ता नहीं होता और बाजार में स्थिरता नहीं लौटती, तब तक उपभोक्ताओं को इंतजार करना पड़ सकता है।


