नई दिल्ली: भारत सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात शुल्क (Export Duty) में बड़ा बदलाव किया है। केंद्र सरकार ने डीजल और ATF पर लगने वाली एक्सपोर्ट ड्यूटी में कटौती कर दी है, जबकि पेट्रोल पर निर्यात शुल्क बढ़ा दिया गया है। नई दरें 1 जुलाई 2026 से लागू होंगी।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे आई हैं। सरकार का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए निर्यात शुल्क में बदलाव जरूरी था।
Highlights
- डीजल पर एक्सपोर्ट ड्यूटी 14 रुपये से घटाकर 8.5 रुपये प्रति लीटर।
- ATF पर ड्यूटी 12.5 रुपये से घटाकर 7.5 रुपये प्रति लीटर।
- पेट्रोल पर एक्सपोर्ट ड्यूटी 1.5 रुपये से बढ़ाकर 4 रुपये प्रति लीटर।
- नई दरें 1 जुलाई 2026 से प्रभावी।
- नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका के साथ अब मॉरीशस और मालदीव को भी कुछ निर्यात पर राहत।
क्या बदली हैं नई एक्सपोर्ट ड्यूटी?
सरकार के नए फैसले के अनुसार तीन प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क इस प्रकार रहेगा:
| उत्पाद | पुरानी ड्यूटी | नई ड्यूटी |
|---|---|---|
| डीजल | ₹14 प्रति लीटर | ₹8.5 प्रति लीटर |
| ATF | ₹12.5 प्रति लीटर | ₹7.5 प्रति लीटर |
| पेट्रोल | ₹1.5 प्रति लीटर | ₹4 प्रति लीटर |
यानी जहां डीजल और विमान ईंधन के निर्यात पर कंपनियों को राहत मिलेगी, वहीं पेट्रोल के निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क देना होगा।
पेट्रोल पर ड्यूटी क्यों बढ़ाई गई?
सरकार का मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में पेट्रोल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना माना जा रहा है। पेट्रोल पर निर्यात शुल्क बढ़ने से कंपनियों के लिए विदेशों में बिक्री अपेक्षाकृत कम आकर्षक होगी और घरेलू बाजार को प्राथमिकता मिलने की संभावना बढ़ेगी।
दूसरी ओर डीजल और ATF पर शुल्क घटाने से इनके निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी।
किन देशों को मिलेगी राहत?
रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों द्वारा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका को किए जाने वाले पेट्रोल, डीजल और ATF के निर्यात पर पहले से ही शुल्क छूट उपलब्ध थी।
अब सरकार ने इस छूट का दायरा बढ़ाते हुए मॉरीशस और मालदीव को होने वाले सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के निर्यात को भी इसमें शामिल कर लिया है। इससे इन देशों को ईंधन आपूर्ति पहले की तरह सुचारु बनी रह सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में क्यों आई गिरावट?
पिछले कुछ सप्ताह में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। इसकी प्रमुख वजहें हैं—
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव में कमी।
- होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की सामान्य आवाजाही शुरू होना।
- सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं का कम होना।
- वैश्विक बाजार में तेल उपलब्धता का सामान्य स्तर पर लौटना।
ईरान-अमेरिका तनाव के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। लेकिन हालात सामान्य होने के बाद कीमतों में लगातार गिरावट आई और मंगलवार रात करीब 73.04 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार होता देखा गया।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए राहत की खबर है। इससे आयात बिल कम होने, चालू खाते के घाटे पर दबाव घटने और महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि पेट्रोल पर बढ़ी निर्यात ड्यूटी का असर मुख्य रूप से निर्यात करने वाली रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ेगा, जबकि डीजल और ATF पर शुल्क में कटौती से उनके निर्यात मार्जिन में सुधार आने की संभावना है।
क्या आम लोगों पर पड़ेगा असर?
फिलहाल यह फैसला निर्यात शुल्क से जुड़ा है, इसलिए इसका सीधा असर घरेलू पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर तुरंत देखने को मिलने की संभावना नहीं है। देश में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, रिफाइनिंग लागत, टैक्स और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करती हैं।
यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक निम्न स्तर पर बनी रहती हैं, तो भविष्य में घरेलू ईंधन कीमतों पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।


