India International Air Traffic: पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय एयरलाइंस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अप्रैल-जून की तिमाही में भारतीय एयरलाइंस के इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ विदेशी एयरलाइंस ने इसी दौरान भारत से जुड़े अपने यात्री ट्रैफिक में बढ़ोतरी हासिल की।
नई दिल्ली: भारत की एयरलाइन इंडस्ट्री के लिए पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। पाकिस्तान के एयरस्पेस पर पाबंदी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर खास तौर पर एयर इंडिया और इंडिगो जैसी भारतीय एयरलाइंस पर पड़ा है। लंबा एयर रूट, बढ़ती परिचालन लागत और कुछ रूट्स पर उड़ानों में बदलाव का सीधा असर यात्रियों की संख्या पर देखने को मिला है।
अप्रैल से जून का समय आमतौर पर एयरलाइंस के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में गर्मियों की छुट्टियों और अंतरराष्ट्रीय यात्रा की मांग बढ़ती है। इसके बावजूद भारत आने-जाने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की कुल संख्या में गिरावट दर्ज की गई। खास बात यह रही कि इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर भारतीय एयरलाइंस पर पड़ा, जबकि कुछ विदेशी विमानन कंपनियां इस स्थिति में अपने लिए अवसर तलाशने में सफल रहीं।
भारत का इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक घटा
डीजीसीए के आंकड़ों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में भारत आने-जाने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या करीब 10.5 फीसदी घटकर 1.7 करोड़ रह गई।
इस दौरान भारतीय एयरलाइंस के इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक में लगभग 26 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके उलट कई विदेशी एयरलाइंस ने भारत से जुड़े अपने यात्री ट्रैफिक में मजबूती दिखाई।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय विमानन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का विस्तार हाल के वर्षों में कारोबार की रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। ऐसे में एयरस्पेस प्रतिबंध और भू-राजनीतिक परिस्थितियां उनके लिए अतिरिक्त लागत और परिचालन संबंधी दबाव पैदा कर रही हैं।
पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने से बढ़ी दूरी
भारतीय एयरलाइंस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं कर पाना है। भारतीय विमानों के लिए पाकिस्तान के रास्ते पश्चिमी देशों की ओर जाने वाले कई रूट प्रभावित हुए हैं।
दिल्ली भारत की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विमानन हब में शामिल है। यहां से यूरोप, ब्रिटेन और पश्चिमी देशों के लिए जाने वाली उड़ानों को पाकिस्तान के ऊपर से सीधा रास्ता नहीं मिलने के कारण वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं।
रूट लंबा होने का मतलब केवल उड़ान का समय बढ़ना नहीं है। इससे ईंधन की खपत, क्रू की लागत, विमान के उपयोग का समय और कुल परिचालन खर्च भी बढ़ जाता है। एयरलाइंस के लिए यह स्थिति खास तौर पर चुनौतीपूर्ण होती है क्योंकि अतिरिक्त लागत को हमेशा टिकट की कीमत में पूरी तरह शामिल करना संभव नहीं होता।
ईरान से जुड़े संकट ने बढ़ाई परेशानी
पाकिस्तान के बाद पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े तनाव ने भी एयरलाइंस के लिए परिचालन मुश्किलें बढ़ाई हैं। हवाई क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता होने पर विमान कंपनियों को अपने रूट बदलने पड़ सकते हैं।
भारतीय एयरलाइंस के लिए यह चुनौती इसलिए और बड़ी है क्योंकि यूरोप और पश्चिमी देशों से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में पश्चिम की ओर जाने वाले रूट महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी एयरस्पेस से बचना पड़े तो विमान को लंबा चक्कर लगाना पड़ता है।
इसका असर उड़ान के समय और लागत दोनों पर पड़ता है। यही वजह है कि भू-राजनीतिक संकट का प्रभाव एयरलाइंस के लिए केवल यात्रियों की संख्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी कमाई और मार्जिन पर भी पड़ सकता है।
एयर इंडिया ग्रुप के इंटरनेशनल ट्रैफिक में बड़ी गिरावट
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में इस चुनौती का बड़ा असर झेलना पड़ा है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून अवधि में एयर इंडिया ग्रुप के इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक में करीब 35 फीसदी की गिरावट आई। पिछले साल अहमदाबाद में हुए विमान हादसे के बाद भी एयर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय सेवाओं पर असर पड़ा था और कुछ उड़ानों में कटौती की गई थी।
इसके साथ ही एयरस्पेस संबंधी दिक्कतों ने कंपनी के लिए परिचालन परिस्थितियों को और कठिन बना दिया।
एयर इंडिया इन दिनों अपने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। लेकिन लंबे रूट और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां उसके लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन गई हैं।
इंडिगो का इंटरनेशनल ट्रैफिक भी घटा
देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस में शामिल इंडिगो भी इस दबाव से अछूती नहीं रही।
अप्रैल-जून 2025 की अवधि में इंडिगो का इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक करीब 39.5 लाख था। बाद की अवधि में यह लगभग 15.4 फीसदी घटकर 33.4 लाख रह गया।
इंडिगो ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से विस्तार किया है। यूरोप, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई शहरों के लिए उसकी सेवाएं बढ़ी हैं। ऐसे में एयरस्पेस प्रतिबंधों का असर उसके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर भी पड़ता है।
हालांकि, इंडिगो का बड़ा घरेलू नेटवर्क कंपनी को कुछ हद तक सहारा देता है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में लंबी दूरी और बढ़ती लागत कंपनी के लिए चुनौती बनी हुई है।
विदेशी एयरलाइंस को कैसे मिला फायदा?
दिलचस्प बात यह है कि जहां भारतीय एयरलाइंस का इंटरनेशनल ट्रैफिक घटा, वहीं कुछ विदेशी एयरलाइंस ने भारत से जुड़े यात्री ट्रैफिक में बढ़ोतरी दर्ज की।
एमिरेट्स इसका एक उदाहरण है। दुबई स्थित इस एयरलाइन का भारत से आने-जाने वाला यात्री ट्रैफिक अप्रैल-जून तिमाही में करीब 7 फीसदी बढ़कर 14.8 लाख हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या लगभग 13.8 लाख थी।
इसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि यूएई ने संबंधित अवधि में विदेशी एयरलाइंस की उड़ानों को लेकर कुछ समय तक सीमाएं लागू की थीं। परिस्थितियों में बदलाव के बाद एमिरेट्स को भारत से जुड़े ट्रैफिक का लाभ मिला।
वहीं एतिहाद एयरवेज के भारत से जुड़े यात्री ट्रैफिक में भी मामूली बदलाव आया। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून की अवधि में कंपनी ने पिछले साल के करीब 8.5 लाख यात्रियों के मुकाबले केवल 1,939 यात्रियों की कमी दर्ज की।
Lufthansa और British Airways को भी फायदा
कुछ यूरोपीय एयरलाइंस ने भी भारत के अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की।
लुफ्थांसा ने अप्रैल-जून की अवधि में भारत आने-जाने वाले करीब 3.7 लाख यात्रियों को सेवा दी, जबकि एक साल पहले यह संख्या लगभग 3.5 लाख थी।
इसी तरह ब्रिटिश एयरवेज ने अप्रैल-जून 2025 में 2.9 लाख से ज्यादा यात्रियों को भारत से जुड़े रूट्स पर यात्रा कराई।
इससे पता चलता है कि भारतीय एयरलाइंस की चुनौती का फायदा कुछ विदेशी विमानन कंपनियों को मिल रहा है। जिन यात्रियों के लिए रूट और कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण है, वे ऐसे समय में उन एयरलाइंस को चुन सकते हैं जिनके पास वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय हब और बेहतर कनेक्टिंग नेटवर्क उपलब्ध है।
विदेशी हब वाली एयरलाइंस को क्यों मिल रहा फायदा?
एमिरेट्स, एतिहाद और कई अन्य विदेशी एयरलाइंस का बिजनेस मॉडल बड़े अंतरराष्ट्रीय हब पर आधारित है। दुबई, अबू धाबी और यूरोप के प्रमुख एयरपोर्ट्स से यात्री आसानी से अलग-अलग देशों के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट ले सकते हैं।
भारत के यात्रियों के लिए भी ये एयरलाइंस लंबे समय से पश्चिमी देशों की यात्रा का महत्वपूर्ण विकल्प रही हैं।
ऐसे में अगर भारतीय एयरलाइंस को किसी एयरस्पेस से बचने के लिए लंबा रूट लेना पड़ता है, तो विदेशी हब वाली एयरलाइंस को कनेक्टिंग फ्लाइट के जरिए अपेक्षाकृत अधिक विकल्प मिल सकते हैं। यही वजह है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों का असर अलग-अलग एयरलाइंस पर एक जैसा नहीं पड़ रहा है।
भारतीय एयरलाइंस के सामने दोहरी चुनौती
मौजूदा हालात में एयर इंडिया और इंडिगो जैसी कंपनियों के सामने मुख्य रूप से दो चुनौतियां हैं।
पहली चुनौती है अंतरराष्ट्रीय रूट की लागत। लंबी उड़ान के कारण ईंधन और परिचालन खर्च बढ़ता है। दूसरी चुनौती है यात्रियों की मांग और नेटवर्क की प्रतिस्पर्धा। अगर यात्री किसी दूसरे हब के जरिए सफर करना पसंद करते हैं तो भारतीय एयरलाइंस के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि, भारत का तेजी से बढ़ता विमानन बाजार इन कंपनियों के लिए बड़ा अवसर भी पैदा करता है। जैसे-जैसे देश से विदेश यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ रही है, भारतीय एयरलाइंस के पास अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को विस्तार देने की मजबूत संभावना है।
आगे क्या होगा?
भारतीय एयरलाइंस के लिए एयरस्पेस से जुड़ी परिस्थितियां कब सामान्य होंगी, यह काफी हद तक भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा। यदि पाकिस्तान और पश्चिम एशिया के हवाई मार्गों पर स्थिति सामान्य होती है तो भारतीय विमानन कंपनियों को लंबे रूट से राहत मिल सकती है।
फिलहाल, एयर इंडिया और इंडिगो के लिए चुनौती केवल यात्रियों को आकर्षित करने की नहीं है। उन्हें सुरक्षित रूट, लागत नियंत्रण, उड़ान समय और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी के बीच संतुलन बनाना होगा।
दूसरी तरफ, विदेशी एयरलाइंस के लिए भारत अब भी बेहद महत्वपूर्ण बाजार है। भारतीय यात्रियों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय यात्रा मांग को देखते हुए एमिरेट्स, एतिहाद, लुफ्थांसा और ब्रिटिश एयरवेज जैसी कंपनियां अपनी मौजूदगी का फायदा उठाने की कोशिश कर सकती हैं।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान के एयरस्पेस प्रतिबंध और पश्चिम एशिया की अस्थिर परिस्थितियों ने भारतीय विमानन कंपनियों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जहां एयर इंडिया और इंडिगो को लंबे रूट और घटते इंटरनेशनल ट्रैफिक का सामना करना पड़ रहा है, वहीं मजबूत विदेशी हब वाली एयरलाइंस इस बदलाव से अपने लिए नए अवसर तलाश रही हैं।


