Billionaires Longevity Bet: इंसानी इतिहास में मौत से कोई मोल-भाव नहीं कर पाया है। राजा-महाराजा हों या दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी, आखिरकार हर इंसान को उम्र की सीमा का सामना करना पड़ता है। लेकिन सिलिकॉन वैली के कुछ अरबपति अब इसी अंतिम सीमा को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। इनका लक्ष्य सीधे तौर पर अमरता हासिल करना हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन उम्र बढ़ने की रफ्तार को धीमा करना, स्वस्थ जीवन के साल बढ़ाना और शरीर की कोशिकाओं को फिर से युवा अवस्था के करीब लाना इनकी बड़ी महत्वाकांक्षा है।
इस कोशिश को Longevity Research कहा जाता है। इसमें बायोटेक्नोलॉजी, जेनेटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेलुलर रीप्रोग्रामिंग, नई दवाओं और लगातार हेल्थ मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश हो चुका है और जेफ बेजोस, सैम ऑल्टमैन, पीटर थिएल और ब्रायन जॉनसन जैसे नाम इससे जुड़े हैं।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि आज विज्ञान के पास इंसानों को अमर बनाने का कोई प्रमाणित तरीका नहीं है। ज्यादातर रिसर्च का लक्ष्य ‘मौत को खत्म करना’ नहीं, बल्कि इंसान को ज्यादा समय तक स्वस्थ रखना यानी healthspan बढ़ाना है।
‘ज्यादा जीना’ से लेकर ‘मरना नहीं है’ तक
लंबी उम्र की इस दौड़ का सबसे चर्चित नाम टेक उद्यमी ब्रायन जॉनसन है। जॉनसन ने अपनी जिंदगी को ही एक बड़े हेल्थ एक्सपेरिमेंट में बदल दिया है। उनके Blueprint प्रोग्राम में डाइट, एक्सरसाइज, नींद, सप्लीमेंट्स और लगातार मेडिकल मॉनिटरिंग शामिल हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, जॉनसन अपनी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने के लिए सालाना करीब 20 लाख डॉलर तक खर्च करते हैं। उनका दावा है कि वह अपने शरीर के कई बायोमार्कर लगातार ट्रैक करते हैं और इस डेटा के आधार पर अपनी जीवनशैली को बदलते हैं।
उनकी महत्वाकांक्षा को उनके चर्चित स्लोगन ‘Don’t Die’ यानी ‘मरना नहीं है’ से समझा जा सकता है। हालांकि, जॉनसन के प्रयोगों को वैज्ञानिक समुदाय में किसी प्रमाणित अमरता के इलाज के तौर पर नहीं देखा जाता।
सैम ऑल्टमैन का $180 मिलियन का दांव
OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने Longevity Research में सबसे बड़ा व्यक्तिगत दांव लगाने वाले टेक दिग्गजों में अपनी जगह बनाई है। उन्होंने Retro Biosciences में शुरुआती दौर में करीब 18 करोड़ डॉलर यानी $180 मिलियन का निवेश किया था। कंपनी का लक्ष्य मानव जीवन में लगभग 10 स्वस्थ साल जोड़ना है।
Retro Biosciences उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्याओं पर कई तकनीकों के जरिए काम कर रही है। इसमें सेल रिप्लेसमेंट, जीन थेरेपी और ऐसी प्रक्रियाएं शामिल हैं जिनका उद्देश्य पुराने या कमजोर हो चुके ऊतकों में ज्यादा स्वस्थ कोशिकाओं को बढ़ावा देना है।
कंपनी की महत्वाकांक्षा सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है। 2026 में Retro ने करीब 1.8 अरब डॉलर के वैल्यूएशन पर नई फंडिंग जुटाने की जानकारी दी और बताया कि वह इंसानी जीवन में 10 स्वस्थ साल जोड़ने के लक्ष्य पर काम कर रही है।
ऑल्टमैन के लिए यह प्रयोग इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि AI और बायोटेक्नोलॉजी के मेल से वैज्ञानिकों को जटिल जैविक प्रक्रियाओं को समझने और संभावित उपचार तेजी से विकसित करने की उम्मीद है।
जेफ बेजोस और Altos Labs की कहानी
Amazon के संस्थापक जेफ बेजोस का नाम भी Longevity Research की दुनिया में प्रमुखता से सामने आता है। बेजोस को Altos Labs के प्रमुख समर्थकों में गिना जाता है। कंपनी का फोकस सेलुलर रीप्रोग्रामिंग के जरिए कोशिकाओं को अधिक स्वस्थ और युवा अवस्था के करीब लाने पर है।
Altos Labs ने 2022 में करीब 3 अरब डॉलर की शुरुआती फंडिंग के साथ शुरुआत की थी। कंपनी ने उम्र बढ़ने और बीमारी से होने वाली कोशिकीय क्षति को समझने के लिए दुनिया के कई प्रमुख वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़ा।
इस रिसर्च के पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विचार है—क्या किसी उम्रदराज कोशिका को इस तरह रीप्रोग्राम किया जा सकता है कि वह कुछ हद तक युवा कोशिका की तरह काम करने लगे?
यही वह जगह है जहां cellular reprogramming जैसी तकनीकें चर्चा में आती हैं। हालांकि, लैब और जानवरों में मिले शुरुआती परिणामों को सीधे इंसानों में सुरक्षित और प्रभावी इलाज मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
पीटर थिएल का नजरिया और Cryonics
PayPal के सह-संस्थापक और टेक निवेशक पीटर थिएल भी लंबे समय से उम्र बढ़ने और मृत्यु को लेकर असामान्य रूप से मुखर रहे हैं। उन्होंने Longevity Research से जुड़ी कई पहलों में निवेश किया है।
थिएल का नजरिया पारंपरिक स्वास्थ्य निवेश से काफी आगे जाता है। वह Cryonics में भी रुचि रखते रहे हैं। इसमें किसी व्यक्ति के शरीर को बेहद कम तापमान पर संरक्षित करने की कोशिश की जाती है, इस उम्मीद के साथ कि भविष्य की तकनीक कभी उसे फिर से जीवित करने में सक्षम हो सकती है।
लेकिन यहां भी एक बड़ी बात स्पष्ट है—आज तक किसी इंसान को Cryonics के जरिए सफलतापूर्वक दोबारा जीवित नहीं किया गया है। इसलिए इसे वर्तमान चिकित्सा विज्ञान का प्रमाणित उपचार नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक पर आधारित एक अत्यंत सट्टात्मक उम्मीद माना जाता है।
एलन मस्क का ‘अर्ध-अमरता’ वाला विचार
Tesla और SpaceX के प्रमुख एलन मस्क ने भी इंसानी जीवन और मृत्यु को लेकर तकनीकी नजरिया सामने रखा है। मस्क ने अतीत में ‘semi-immortality’ यानी अर्ध-अमरता की संभावना पर बात की है।
उनके विचार का मूल आधार यह है कि इंसानी शरीर की उम्र बढ़ना भी किसी हद तक एक जैविक सिस्टम की तरह समझा जा सकता है। अगर वैज्ञानिक उस सिस्टम को समझकर उसकी कमजोरियों को ठीक कर सकें तो इंसान की उम्र और स्वस्थ जीवन दोनों बढ़ सकते हैं।
हालांकि, मस्क की ओर से ऐसी कोई प्रमाणित तकनीक पेश नहीं की गई है जो इंसान को अमर बना सके। इसलिए उनका नजरिया फिलहाल भविष्य की तकनीक और बायोइंजीनियरिंग की संभावनाओं से जुड़ी एक महत्वाकांक्षी सोच के तौर पर देखा जाना चाहिए।
दीपिंदर गोयल भी बना रहे हैं ‘Longevity Tech’
भारत से भी इस क्षेत्र में टेक्नोलॉजी आधारित दिलचस्प प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। Eternal के फाउंडर दीपिंदर गोयल एक छोटे वियरेबल डिवाइस Temple पर काम कर रहे हैं।
यह डिवाइस शरीर की मेटाबोलिक स्थिति से जुड़े संकेतों को रियल-टाइम में ट्रैक करने के उद्देश्य से बनाया जा रहा है। शुरुआती तौर पर इसे वेलनेस डिवाइस के रूप में पेश करने की योजना बताई गई है और इसकी कीमत करीब 1,000 डॉलर होने की उम्मीद जताई गई है।
इस तरह के डिवाइस Longevity की दुनिया में एक अलग रास्ता दिखाते हैं। यहां मकसद सीधे उम्र को रोकना नहीं, बल्कि शरीर के बारे में ज्यादा से ज्यादा डेटा जुटाकर नींद, फिटनेस, रिकवरी और मेटाबॉलिज्म जैसे पहलुओं को बेहतर समझना है।
क्या सच में इंसान की उम्र उलटी हो सकती है?
यही इस पूरी दौड़ का सबसे बड़ा सवाल है।
वैज्ञानिकों ने उम्र बढ़ने से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। कोशिकीय क्षति, DNA में बदलाव, प्रोटीन का जमा होना, स्टेम सेल की क्षमता में गिरावट और अन्य जैविक प्रक्रियाओं पर दुनिया भर में रिसर्च चल रही है।
लेकिन लैब में किसी प्रक्रिया को बदल देना और इंसान के शरीर में उसे सुरक्षित तरीके से लागू करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
किसी उपचार से उम्र बढ़ने की एक प्रक्रिया धीमी हो जाए, इसका मतलब यह नहीं है कि इंसान हमेशा जवान रहेगा। इसके अलावा कैंसर, हृदय रोग, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां और शरीर के दूसरे सिस्टम भी उम्र के साथ प्रभावित होते हैं।
यही वजह है कि वैज्ञानिकों के बीच ‘अमरता’ से ज्यादा healthspan शब्द पर जोर दिया जाता है। लक्ष्य यह है कि इंसान जितने साल जिए, उनमें ज्यादा समय स्वस्थ और सक्रिय रह सके।
अरबपतियों की यह दौड़ इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
Longevity Research में अरबपतियों का पैसा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस तरह की रिसर्च बेहद महंगी और लंबी होती है। नई दवा विकसित करने, क्लिनिकल ट्रायल करने और किसी तकनीक को सुरक्षित साबित करने में वर्षों लग सकते हैं।
निजी पूंजी वैज्ञानिकों को ऐसे प्रयोगों पर काम करने का मौका देती है जिनका तत्काल व्यावसायिक फायदा स्पष्ट नहीं होता। Altos Labs और Retro Biosciences जैसे उदाहरण बताते हैं कि इस क्षेत्र में कितना बड़ा निवेश आ चुका है।
लेकिन इसके साथ एक सवाल भी उठता है—अगर भविष्य में उम्र बढ़ाने वाली कोई तकनीक सफल होती है तो क्या वह केवल अरबपतियों तक सीमित रहेगी?
अगर ऐसी तकनीक बेहद महंगी रही तो दुनिया में एक नया असमानता का दौर पैदा हो सकता है, जहां अमीर लोग न केवल ज्यादा पैसा बल्कि ज्यादा स्वस्थ साल भी ‘खरीद’ सकें।
‘अमृत’ अभी दूर है, लेकिन दौड़ शुरू हो चुकी है
एलन मस्क से लेकर जेफ बेजोस और सैम ऑल्टमैन तक टेक दुनिया के बड़े नाम उम्र बढ़ने की समस्या को अब केवल प्राकृतिक प्रक्रिया मानकर छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिखते। कोई बायोटेक कंपनी में अरबों डॉलर लगा रहा है, कोई अपने शरीर पर लाखों डॉलर खर्च कर रहा है और कोई कोशिकाओं को फिर से युवा बनाने की रिसर्च को फंड कर रहा है।
फिर भी अमरता का दावा अभी विज्ञान से बहुत दूर है। मौजूदा शोध की सबसे वास्तविक उम्मीद यह है कि इंसान ज्यादा समय तक स्वस्थ रह सके और उम्र से जुड़ी बीमारियों को देर तक टाला जा सके।
यानी अरबपतियों की यह ‘मौत को मात देने’ की दौड़ फिलहाल अमृत की तलाश से ज्यादा स्वस्थ और लंबी जिंदगी की तलाश है। लेकिन अगर आने वाले दशकों में सेलुलर रीप्रोग्रामिंग, जीन थेरेपी और AI आधारित बायोमेडिकल रिसर्च उम्मीद के मुताबिक आगे बढ़ती है, तो इंसानी उम्र की हमारी मौजूदा समझ जरूर बदल सकती है।


