Gig Workers Social Security: भारत में Ola, Uber, ऑनलाइन डिलीवरी और दूसरे प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार की तैयारी जारी है। इन कामगारों के लिए बनने वाले सामाजिक सुरक्षा कोष में एग्रीगेटर कंपनियों के योगदान का तरीका क्या होगा, इसे लेकर अब चर्चा तेज हो गई है। सरकार के सामने मुख्य रूप से दो विकल्प हैं—कंपनी के सालाना कारोबार के आधार पर अंशदान लेना या फिर कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के हिसाब से योगदान तय करना।
यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग-अलग प्लेटफॉर्म कंपनियों का बिजनेस मॉडल और लेनदेन का आकार काफी अलग होता है। ऐसे में अंशदान की व्यवस्था का सीधा असर कंपनियों की लागत और अंततः गिग वर्कर्स से जुड़ी सेवाओं पर पड़ सकता है।
गिग वर्कर्स के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह व्यवस्था?
भारत में बड़ी संख्या में लोग कैब बुकिंग, फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए काम कर रहे हैं। इन्हें पारंपरिक नौकरी की तरह नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलता, इसलिए सामाजिक सुरक्षा का सवाल लंबे समय से चर्चा में है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रावधान किया गया है। इसके तहत एग्रीगेटर कंपनियों को सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान करना होगा।
इसका उद्देश्य ऐसे कामगारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाना है, जिससे उन्हें भविष्य में निर्धारित लाभ मिल सकें।
अंशदान तय करने के दो विकल्प
अंशदान की गणना को लेकर फिलहाल दो प्रमुख मॉडल चर्चा में हैं।
पहला मॉडल—कंपनी के कारोबार पर आधारित:
एग्रीगेटर कंपनी के वार्षिक कारोबार का एक निश्चित प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कोष में जमा कराया जा सकता है।
दूसरा मॉडल—कामगारों को किए गए भुगतान पर आधारित:
कंपनी अपने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सालभर में जितना भुगतान करती है, उसके आधार पर अंशदान तय किया जा सकता है।
दोनों मॉडलों का अलग-अलग सेक्टर पर प्रभाव अलग होगा। यही वजह है कि अंतिम व्यवस्था तय करने से पहले इसके आर्थिक असर का आकलन किया जा रहा है।
भुगतान आधारित मॉडल से Ola-Uber पर ज्यादा असर क्यों?
विश्लेषकों के मुताबिक भुगतान आधारित मॉडल का असर राइड-हेलिंग कंपनियों पर अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। कैब, ऑटो और बाइक-टैक्सी सेवाओं में रोजाना बड़ी संख्या में ट्रांजैक्शन होते हैं और बड़ी संख्या में ड्राइवर प्लेटफॉर्म से जुड़े रहते हैं।
ऐसे कारोबार में लेनदेन की संख्या बहुत अधिक होती है, जबकि प्रत्येक ट्रांजैक्शन का मूल्य दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कम हो सकता है। इसलिए यदि अंशदान सीधे कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर तय होता है, तो इन कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ने की संभावना है।
वहीं, ज्यादा मूल्य वाले लेकिन कम लेनदेन वाले प्लेटफॉर्म पर इसी फॉर्मूले का प्रभाव अलग हो सकता है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता में क्या प्रावधान है?
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 114(4) के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान का प्रावधान किया गया है।
मौजूदा प्रावधान के अनुसार एग्रीगेटर को अपने वार्षिक कारोबार का 1 से 2 प्रतिशत तक अंशदान करना होगा। हालांकि, यह अंशदान गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
यानी कारोबार आधारित मॉडल में भी कामगारों को किए जाने वाले भुगतान की सीमा को ध्यान में रखा गया है।
हर साल जमा करना होगा अंशदान
एग्रीगेटर कंपनियों को अपने वार्षिक अंशदान की गणना कर उसे हर साल सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के तहत जमा करना होगा। अब श्रम एवं रोजगार मंत्रालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि अंशदान की गणना के लिए प्रति लेनदेन या कामगारों को किए गए भुगतान को किस तरह मानक बनाया जाए।
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में कैब सेवा, फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स और अन्य डिजिटल सेवाओं के बिजनेस मॉडल एक जैसे नहीं हैं।
किन कामगारों को मिल सकता है फायदा?
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को मिल सकता है जो अपनी कमाई के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं। इनमें कैब और ऑटो ड्राइवर, बाइक राइडर, फूड डिलीवरी पार्टनर और दूसरे प्लेटफॉर्म वर्कर्स शामिल हैं।
नियमों के अनुसार, किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में 90 दिन या कई एग्रीगेटर कंपनियों के साथ कुल 120 दिन काम करने के बाद गिग वर्कर संबंधित योजना के तहत लाभ पाने के पात्र हो सकते हैं।
इससे लंबे समय तक प्लेटफॉर्म से जुड़े रहने वाले कामगारों को सामाजिक सुरक्षा का दायरा मिल सकता है।
सरकार के सामने चुनौती क्या है?
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिससे गिग वर्कर्स को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिले, लेकिन कंपनियों पर इतना अधिक वित्तीय बोझ भी न पड़े कि उसका असर कारोबार और सेवाओं की कीमतों पर दिखाई देने लगे।
अगर अंशदान बहुत ज्यादा होता है, तो कंपनियां इसकी लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं। दूसरी तरफ, योगदान कम रखने पर सामाजिक सुरक्षा कोष के लिए पर्याप्त धन जुटाना मुश्किल हो सकता है।
इसी वजह से कारोबार आधारित और भुगतान आधारित दोनों विकल्पों के असर का आकलन किया जा रहा है।
क्या बढ़ेगी Ola-Uber और डिलीवरी की लागत?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नए योगदान नियम लागू होने के बाद कैब या डिलीवरी सेवाएं महंगी होंगी। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अंतिम रूप से कौन-सा अंशदान मॉडल लागू करती है और कंपनियां उस अतिरिक्त लागत को किस तरह वहन करती हैं।
हालांकि, भुगतान आधारित मॉडल लागू होने की स्थिति में अधिक संख्या में गिग वर्कर्स वाले प्लेटफॉर्म पर लागत बढ़ने की संभावना अधिक हो सकती है।
निष्कर्ष
गिग इकोनॉमी के विस्तार के साथ लाखों कामगार Ola, Uber, डिलीवरी और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा कोष की व्यवस्था उनके लिए अहम बदलाव साबित हो सकती है। सरकार के सामने अब चुनौती यह तय करने की है कि कंपनियों से अंशदान कारोबार के आधार पर लिया जाए या कामगारों को किए गए भुगतान के हिसाब से।
अंतिम नियम आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि इसका कंपनियों, गिग वर्कर्स और ग्राहकों पर वास्तविक आर्थिक असर कितना पड़ेगा।


