नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इस प्राकृतिक आपदा के बाद अब उन लोगों की आपबीती सामने आ रही है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने मौत का मंजर देखा और किसी तरह अपनी जान बचाई। रसुवा जिले में हिंदू तीर्थस्थल गोसाइंकुंड जा रही एक बस में सवार बद्री प्रसाद देवकोटा ने बताया कि अचानक तेज रफ्तार से आती मिट्टी और पानी की विशाल लहर ने उनकी बस को अपनी चपेट में ले लिया।
देवकोटा बस में अपनी पत्नी और 34 अन्य तीर्थयात्रियों के साथ यात्रा कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने बाढ़ का पानी और मलबा तेजी से अपनी ओर आते देखा, उन्होंने चलती बस से छलांग लगाने का फैसला किया। उनकी पत्नी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन कुछ ही पलों में हालात इतने भयावह हो गए कि देवकोटा को अपनी जान बचाने के लिए यह कदम उठाना पड़ा।
पत्नी ने कहा- कूदिए मत, लेकिन पति ने नहीं मानी बात
‘द काठमांडू पोस्ट’ से बातचीत में बद्री प्रसाद देवकोटा ने उस खौफनाक पल को याद किया। उन्होंने बताया कि बाढ़ की लहर तेजी से बस की तरफ बढ़ रही थी। उनकी पत्नी ने उनका हाथ पकड़कर कहा कि वे बस से न कूदें।
देवकोटा के मुताबिक, उन्होंने पत्नी से कहा, “हम यहीं मर जाएंगे।” इसके बाद उन्होंने खुद को पत्नी की पकड़ से छुड़ाया और चलती बस से छलांग लगा दी।
बस से नीचे गिरने के बाद बाढ़ का तेज बहाव उन्हें सड़क किनारे बनी नाली में बहाकर ले गया। हालांकि, उन्होंने किसी तरह पहाड़ी की ढलान पर उगी वनस्पतियों को पकड़ लिया। यही पकड़ उनकी जिंदगी बचाने वाली साबित हुई।
कुछ देर बाद जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो बस बाढ़ के पानी में समा चुकी थी। उनकी पत्नी समेत बस में मौजूद कई यात्रियों का कोई पता नहीं चल सका।
दो शव बरामद, 28 लोग अब भी लापता
‘द काठमांडू पोस्ट’ की 31 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह के दो लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 28 लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में बद्री प्रसाद देवकोटा की पत्नी भी शामिल हैं।
26 अगस्त की बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। बड़ी संख्या में परिवार अपने परिजनों से बिछड़ गए। कई लोग अब भी लापता रिश्तेदारों की तलाश कर रहे हैं। आपदा से बचने वाले लोगों की कहानियां बताती हैं कि बाढ़ कितनी अचानक और भयावह तरीके से आई थी।
छह यात्रियों ने बस से कूदकर बचाई जान
बद्री प्रसाद देवकोटा और उनके चचेरे भाई तुलाराम उन छह यात्रियों में शामिल थे, जिन्होंने बस से छलांग लगाकर अपनी जान बचाई। बाढ़ का पानी कम होने के बाद दोनों करीब 20 मीटर ऊपर पहाड़ी की तरफ चढ़े और लगभग दो घंटे तक घास के एक हिस्से में बैठे रहे।
वहां से उन्होंने तबाही का भयावह दृश्य देखा। कुछ लोग घरों की छतों पर फंसे हुए थे, जबकि कई अन्य लोग कीचड़ और मलबे में दबे नजर आ रहे थे।
बाद में दोनों हिलेखर्का गांव पहुंचे। वहां स्थानीय लोगों ने उन्हें चाय और बिस्कुट दिए और प्राथमिक उपचार में मदद की। अगले दिन वे फिर भैंसे इलाके में अपने परिवारों की तलाश करने पहुंचे, लेकिन उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली। आखिरकार दोनों अपने गृह जिले गोरखा लौट गए।
चेतावनी को पहले गंभीरता से नहीं लिया
बेत्रावती में रहने वाले संतमान लामा भी इस आपदा में बाल-बाल बचे। हालांकि, उनकी जान बच गई, लेकिन उन्होंने अपनी लगभग पूरी संपत्ति गंवा दी।
‘ऑनलाइनखबर’ के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह लामा अपने बेटे और बेटी को स्कूल छोड़कर घर लौट रहे थे। इसी दौरान पास की हार्डवेयर दुकान के मालिक ने उन्हें बाढ़ आने की चेतावनी दी और ऊंचाई वाले इलाके में चले जाने की सलाह दी।
शुरुआत में लामा ने चेतावनी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। बेत्रावती में बाढ़ की चेतावनियां पहले भी मिलती रही थीं। हालांकि, उन्होंने घर पहुंचकर अपनी पत्नी को इसकी जानकारी दी और परिवार के साथ ऊंचे स्थान पर चले गए।
कुछ ही समय बाद बाढ़ की पहली लहर ने इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।
आंखों के सामने बह गया घर और दुकान
लामा ने बताया कि बाढ़ के तेज बहाव में उनकी पत्नी भी बहने लगी थीं। उन्होंने किसी तरह पत्नी को पकड़ लिया और उसे ऊंचे स्थान की तरफ धकेला। खुद भी उन्होंने झाड़ियों को पकड़कर अपनी जान बचाई।
इसके बाद उन्होंने जिस मंजर को देखा, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनकी आंखों के सामने बाढ़ का पानी उनका घर बहाकर ले गया। उनकी दुकान और लगभग पूरी संपत्ति भी इस आपदा में नष्ट हो गई।
लामा ने दो पड़ोसियों ईश्वरलाल श्रेष्ठ और बुद्धिलाल डंगोल को भी सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन बाद में दोनों से उनका संपर्क टूट गया।
बच्चे सुरक्षित मिले, लेकिन सब कुछ तबाह
बाढ़ के बाद लामा ने अपने बच्चों के स्कूल से संपर्क किया। राहत की बात यह थी कि उनके दोनों बच्चे सुरक्षित थे। लेकिन जब वह अपने घर और सामान की ओर लौटे तो उनके पास लगभग कुछ भी नहीं बचा था।
लामा ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा, “मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं है। रहने के लिए कोई जगह भी नहीं है। मेरे पास जो कुछ था, वह सब चला गया।”
नेपाल की इस त्रासदी में ऐसे कई परिवार हैं, जिन्होंने अपनों को खोया है या अभी भी उनके लौटने का इंतजार कर रहे हैं। बाढ़ से बच निकले लोगों की ये कहानियां इस बात की भयावह तस्वीर पेश करती हैं कि कुछ ही मिनटों में एक सामान्य दिन कैसे जिंदगी और मौत की जंग में बदल गया।


