Middle East Conflict Update: मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने बहरीन स्थित अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के बेस को निशाना बनाया है। ईरान के इस दावे के बाद क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ गया है।
ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को चेतावनी देते हुए कहा है कि खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस का निर्यात या तो सभी देशों के लिए सुरक्षित रहेगा या फिर किसी के लिए भी नहीं होगा। इस बयान ने दुनिया भर के बाजारों में चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि दुनिया की बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है।
हालांकि, इस हमले और जवाबी कार्रवाई से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। दोनों पक्षों की ओर से जारी बयानों में अलग-अलग दावे किए गए हैं।
ईरान का अमेरिकी पांचवें बेड़े पर हमले का दावा
IRGC के मुताबिक, उसने ‘ऑपरेशन नसर-2’ के तहत अमेरिकी नौसेना के ठिकानों को निशाना बनाया। ईरानी सेना ने इस अभियान को ‘मुबारक या अली इब्न अबी तालिब (AS)’ नाम दिया है।
ईरान का दावा है कि बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के बेस पर किए गए हमले में कई महत्वपूर्ण सैन्य सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया गया। इनमें शामिल हैं:
- कमांड और कंट्रोल सेंटर
- सैन्य उपकरणों के भंडार
- ईंधन स्टोरेज सुविधाएं
- लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम
ईरानी सेना ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने हिंद महासागर और खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बनाने की कोशिश की है।
तेहरान का कहना है कि यह कार्रवाई अमेरिका की सैन्य गतिविधियों का जवाब है।
अमेरिका ने ईरान पर जवाबी हमले का किया दावा
ईरान के हमले के दावे के बाद अमेरिका ने भी जवाबी कार्रवाई की बात कही है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ईरानी तटीय इलाकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।
अमेरिकी कार्रवाई में कथित तौर पर इन ठिकानों को निशाना बनाया गया:
- मिसाइल लॉन्च सिस्टम
- ड्रोन ऑपरेशन सेंटर
- नौसैनिक सुविधाएं
- तटीय रक्षा प्रणाली
अमेरिका का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य अपने सैनिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
वहीं, ईरान ने अमेरिकी हमलों की निंदा करते हुए इसे क्षेत्रीय संप्रभुता पर हमला बताया है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
मिडिल ईस्ट संकट में सबसे ज्यादा चर्चा हॉर्मुज जलडमरूमध्य की हो रही है। यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है।
दुनिया के ऊर्जा बाजार के लिए यह रास्ता बेहद अहम है क्योंकि:
- खाड़ी देशों से निकलने वाला भारी मात्रा में कच्चा तेल इसी मार्ग से जाता है।
- सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, कतर और यूएई जैसे देशों की ऊर्जा सप्लाई इससे जुड़ी है।
- यहां किसी भी तरह की सैन्य रुकावट से वैश्विक तेल कीमतों पर असर पड़ सकता है।
अगर इस मार्ग पर लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों पर पड़ सकता है।
ईरान ने दी तेल और गैस सप्लाई रोकने की चेतावनी
IRGC ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर खाड़ी क्षेत्र में तेल और गैस निर्यात को प्रभावित करने की कोशिश की गई तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी।
ईरान का कहना है कि ऊर्जा संसाधनों पर किसी एक देश का नियंत्रण स्वीकार नहीं किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान के पास हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षमता मौजूद है। हालांकि, इसे पूरी तरह बंद करना आसान नहीं होगा क्योंकि इससे खुद ईरान के आर्थिक हित भी प्रभावित हो सकते हैं।
दुनिया के बाजारों पर क्या होगा असर?
मिडिल ईस्ट में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है।
अगर तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो:
- कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
- पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं।
- महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
- वैश्विक शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है।
अमेरिका-ईरान तनाव क्यों बढ़ रहा है?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कई दशकों से चला आ रहा है। इसके पीछे कई मुद्दे हैं:
- ईरान का परमाणु कार्यक्रम
- पश्चिम एशिया में सैन्य प्रभाव की होड़
- खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी
- क्षेत्रीय सहयोगी देशों को लेकर मतभेद
हाल के घटनाक्रम ने इस पुराने तनाव को एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंचा दिया है।
आगे क्या हो सकता है?
मिडिल ईस्ट की स्थिति अब पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गई है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य कार्रवाई बढ़ती है तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा बाजार, व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ी नजर इस बात पर है कि दोनों देश आगे बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या सैन्य टकराव और बढ़ता है।
डिस्क्लेमर: इस रिपोर्ट में शामिल सैन्य दावे संबंधित पक्षों के बयानों पर आधारित हैं। स्वतंत्र रूप से इनकी पुष्टि नहीं की गई है।
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